बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्वयूथवेष्टितं रम्यं बटुकं दक्षिणेऽर्चयेत् । असिशूलकपालानि डमरुं दधतं करैः ॥११३॥ कृष्णं दिगंबरं क्रूरं क्षेत्रपालं च पश्चिमे । कपालं डमरुं पाशं लिंगं संबिभ्रतीं करैः ॥११४॥ अध्र्याकन्यां रक्तवस्त्रां योगिनीमुत्तरे यजेत् । अक्षोभ्यं प्रयजेन्मूर्ध्नि देव्या मंत्रमृषिं शुभम् ॥११५॥ अक्षोभ्यं वस्त्रपुष्पं च प्रतीच्छानलवल्लभा । अक्षोभ्यपूजने मंत्रः षट्कोणेषु षडंगकम् ॥११६॥ वैरोचनं चामिताभं पद्मनामाभिधं तथा । शंखं पांडुरसंज्ञं च दिग्दलेषु प्रपूजयेत् ॥११७॥ लामकां मानकां चैव पांडुरां तारकां तथा । विदिक्पत्रानब्जपत्रेषु पूजयेदिष्टसिद्धये ॥११८॥ बिंदुनामादिवर्णाद्याः संबुद्ध्य तास्तथाभिधाः । व्रजपुष्पं प्रतीच्छाग्निप्रियांताः प्रणवादिकाः ॥११९॥ वैरोचनादिपूजायां मनवः परिकीर्तिताः । भूधरश्च चतुर्द्वार्विषु पद्मांतकयमांतकौ ॥१२०॥ विद्यांतकाभिधः पश्चान्नरांतक इमान्यजेत् । शक्रादींश्चैव वज्रादीन्प्रजपेत्तदनंतरम् ॥१२१॥ एवं संResource/पूजयन्देवी पांडित्यं धनमद्भूतम् । पुत्रान्पौत्राञ्छुभां कीर्ति लभते जनवश्यताम् ॥१२२॥ तारो माया श्रीमदेकजटे नीलसरस्वती । महोग्रतारे देवासः सनेत्रो गदियुग्मकम् ॥१२३॥ सर्वदेवपिशाकर्मो दीर्घोग्निमंसुसान्द्रस । अभ्रगुर्धम जाड्यं च छेदयद्वितयं रमा ॥१२४॥ मायास्त्राग्निप्रियांतोऽयं द्विपंचाशल्लिपिमंतुः । अनेन नित्यं पूजांतेऽन्वहं देव्यै बलिं हरेत् ॥१२५॥ एवं सिद्धे मनौ मंत्री प्रयोगान्विदधाति च । जातमात्रस्य बालस्य दिवसत्रितयावधः ॥१२६॥ जिह्वायां विलिखेन्मंत्रं मध्वाज्याभ्यां शलाकया । सुवर्णकृतया यद्वा मंत्री धवलदूर्वया ॥१२७॥ गतेऽष्टमेऽब्दे बालोऽपि जायते कविरद्भूतम् । तथापरैरजेयोऽपि भूपसंघैर्र्चार्चितः ॥१२८॥ उपरागे वतानीव नरदारुस्ररोजले । निर्माय कीलकं तेन तैलमध्वमृतैर्लिखेत् ॥१२६॥ सरोजिनीदले मंत्रं वेष्टयेन्मातृकाक्षरैः । निधाय तदलं कुंडे चतुरस्रे समेखले ॥१३०॥ संस्थाप्य पावकं तत्र जुहुयान्मनुनामुना । सहस्रं रक्तपद्मानां धेनुदुग्धजलाप्लुतम् ॥१३१॥ करों में कपाल, डमरू, पाश तथा लिंग धारण करनेवाली, अर्धकन्या रूपवाली और रक्तवस्त्र पहननेवाली योगिनी की उत्तर दिशा में पूजा करे। देवी के अक्षोभ्य नामक पवित्र मन्त्रऋषि की मस्तक पर पूजा करे। "अक्षोभ्य••••वल्लभा" इस मन्त्र से अक्षोभ्य की पूजा कर षट्कोण में षडंग देवता का पूजन करे ॥११२-११६॥ इष्ट सिद्ध्यर्थ दिक् पद्मपत्रों पर वैरोचन, अमिताभ, पद्मनाभ, पांडुर संज्ञक, शंख, लाभका, मानका, पांडुरा तथा तारका की अर्चना करनी चाहिये। "बिंदुनाम••••प्रणवादिकाः"-यह मन्त्र वैरोचनादि पूजन का कहा गया है। चारों द्वारों पर भूधर, पद्मांतक, यमांतक, विद्यांतक तथा नरांतक की पूजा करनी चाहिये। पश्चात् शक्र आदि की पूजा करके उनके वज्र आदि अस्त्रों का भी पूजन करे। इस प्रकार देवी की पूजा करने से उद्- भुत पांडित्य, पुत्र, पौत्र, निर्मल यश, तथा जनवश्यता (लोगों को अपने अधीन करना) की प्राप्ति होती है। "तारो••••स्वाहा" इस मन्त्र से पूजा के अन्त में प्रतिदिन देवी को बलि चढ़ावे ॥११७-१२५॥ इस प्रकार मन्त्र सिद्ध कर लेने पर मन्त्री उसका प्रयोग करे। सुवर्ण की शलाका या उज्ज्वल दूर्वा में मधु और घी लगाकर उससे सद्योजात बालक, जिसे तीन दिन भी न हुए हों, की जिह्वा पर यह मन्त्र लिख दे। ऐसा करने से आठ वर्ष होते-होते वह बालक महाकवि, दूसरों से अजेय तथा राजाओं से पूजित होगा। "उपरागे••••सरोजने" इस मन्त्र से एक कील बनाकर उससे कमलिनी पत्र पर तेल, मधु और अमृत (जल) से उपर्युक्त मन्त्र को लिखकर उसे मातृका अक्षरों से वेष्टित करे। तत्पश्चात् मेखला सहित चतुरस्र कुण्ड खोदकर उसमें अग्नि स्थापना करके