बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चाशीतितमोऽध्यायः ७८५ होमांते विविधै रनैः पलैरपि बलिं हरेत् । बलि मंत्रेण विधिवद्बलिमंत्रः प्रकाश्यते ॥१३२॥ तारः पद्धं युमं तंद्री वियद्दीर्घं च लोहितः । अविविध्वमारूढो वदेत्पद्मावतोपदम् ॥१३३॥ झिटीशाढ्योऽनिलस्वाहा षोडशार्णो बलेर्मनुः । ततो निशीथे च बलिं पूर्वोक्तमनुना हरेत् ॥१३४॥ एवं कृते पंडितानां स जयो कविराड् भवेत् । निवासो भारती लक्ष्म्योर्जनतारञ्जनक्षमः ॥१३५॥ शताभिजप्त्या यो मंत्री रोचनां मस्तके धरेत् । यं यं पश्यति तस्यासो दास्रवज्जायते क्षणात् ॥१३६॥ श्मशानांगारमाश्रित्य पूर्वाषां कुजवासरे । तेन मंत्रेण संवेष्टय निबद्धं रक्ततंतुभिः ॥१३७॥ शताभिजप्तं मतेन निक्षिपेदरिवेश्मनि । उच्चाटयति सप्ताहात्सकुटुम्बाविरोधिमः ॥१३८॥ क्षीराढ्यया निशामंत्रं लिखित्वा पौरुषेऽस्थनि । रविवारे निशीथिन्यां सहस्त्रमभिमंत्रयेत् ॥१३९॥ तत्क्षिप्तं शत्रुसदने मंडलाद्भ्रंशकं भवेत् । क्षेत्रे क्षिप्तं सस्यहान्योजवहत्तुरमा लयेत् ॥१४०॥ षट्कोणांतर्लिखेन्मूलं साध्यार्णं केशरे स्वरैः । बाह्येऽष्टवर्गयुक्त्वं पद्मम्भूमिपरावृतम् ॥१४१॥ यंत्रं भूर्जे जतुरसैर्लिखेत्पीताम्बरावृतम् । पट्टसूत्रेण सन्नद्धं शिशुकंठगतं ध्रुवम् ॥१४२॥ भूतमीतिहरं वामबाहौ स्त्रीणां च पुत्रदम् । नृणां दक्षिणबाहुस्थं निर्धनानां धनप्रदम् ॥१४३॥ ज्ञानदं ज्ञातमिच्छूनां राज्ञां तु विजयप्रदम् ॥१४४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे यक्षिणीमन्त्रभेदनिरूपणं नाम पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥८५॥ गोदुग्ध एवम् जल से धोये सहस्र रक्त कमलों से हवन करे । होमान्त में विविध रत्न तथा मांस-खंडों की बलि चढ़ाये । “तारः ० ० ० ० स्वाहा" इस मन्त्र से बलि समर्पण करना चाहिये । रात्रि में भी पूर्वोक्त मन्त्र से बलि दे । ॥१२६-१३४॥ ऐसा करने वाला व्यक्ति पंडित विजयो, कविराट्, सरस्वती ओर लक्ष्मी का निवास तथा जनप्रिय होता है । जो व्यक्ति गोरोचन को उपर्युक्त मन्त्र से सो बार अभिमन्त्रित करके मस्तक पर उसे धारण करेगा, वह जिसकी ओर दृष्टिपात करेगा, वह तत्क्षण उसका दासत्तुल्य हो जाएगा । मंगल दिन पूर्वाषाढ नक्षत्र में जो श्मशान से अंगार लाकर उस मन्त्र से उसे संवेष्टित कर लाल डोरे में बांधकर पुनः मूलमन्त्र से सो बार अभि- मन्त्रित करके शत्रु के घर पर फेंकता है, उसके शत्रु का एक सप्ताह के भीतर ही सपरिवार उच्चाटन हो जाता है ॥१३५-१३८॥ पुरुष की हड्डी पर दुग्धयुक्त शलाका से निशामन्त्र को लिख कर रविवार को रात्रि में सहस्र बार उसे अभिमन्त्रित करके जिस शत्रु के घर पर इसे फेंका जाएगा, वह शीघ्र गृहविहीन हो जाएगा । खेत में उसे फेंकने से सस्य की क्षति होगी । भोजपत्र पर अलक्त (अलता) से षट् ० ० ० ० वृतम्" इस मन्त्र को लिख कर उसे पीत वस्त्र में लपेट दे । फिर उसे रेशम के धागे शिशु के कंठ में बांध दे । ऐसा करने से निश्चय ही शिशुका अरिष्ट दूर हो जाता है । स्त्रियों की बायीं भुजा में बांधने से पुत्र होता है, निर्धन मनुष्यों की दाहिनी भुजा में बांधने से धन होता है, ज्ञान के इच्छुकों को ज्ञान की प्राप्ति और राजाओं को विजय की प्राप्ति होती है ॥१३९-१४४॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीय पाद में यक्षिणी मन्त्रभेद निरूपण नामक पचासीवाँ अध्याय समाप्त ॥८५॥ ९९-ना० पु०