बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषडशीतितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच सरस्वत्यवतारास्ते कथिताः सिद्धिदा नृणाम् । अथ लक्ष्म्यवतारांस्ते वक्ष्ये सर्वार्थसिद्धिदान् ॥१॥ वाणीमन्मथशक्त्याख्यं बीजत्रितयमीरितम् । ऋषिः स्याद्दक्षिणामूर्तिः पंक्तिश्छंदः प्रकीर्तितम् ॥२॥ देवता त्रिपुरा बाला मध्यांते शक्तिबीजके । नाभेरथापादमाद्यं तु नाभ्यंतं हृदयात्परम् ॥३॥ मूर्ध्नो हृदंतं तार्तीयं क्रमाद्देहेषु विन्यसेत् । आद्यं वामकरे दक्षकरे तदुभयोः परम् ॥४॥ पुनस्त्रीजत्रयं न्यस्य मूर्ध्नि गुह्ये च वक्षसि । नव योन्याभिधं न्यासे नवकृत्वो मनुं न्यसेत् ॥५॥ कर्णयोश्चिबुके न्यस्येच्छंखयोर्मुखपंकजे । नेत्रयोर्नासिकायां च स्कंधयोरुदरे तथा ॥६॥ न्यसेत्कूर्परयोर्नाभौ जानुनोलिंगमस्तके । पादयोरपि गुह्ये च पार्श्वयोर्हृदये पुनः ॥७॥ स्तनयोः कंठदेशे च वामांगादिषु विन्यसेत् । वाग्भवाद्यां रतिं गुह्ये प्रीतिमत्यादिकां हृदि ॥८॥ कामबीजादिकान्पश्येद्व्रूमध्ये तु मनोभवाम् । पुनर्वागात्ममाद्यास्तिस्र एव च विन्यसेत् ॥६॥ अमृतेशीं च योगेशीं विश्वयोनिं तृतीयकाम् । मूर्ध्नि वक्त्रे हृदि न्यसेद्गुह्ये चरणयोरपि ॥१०॥ कामेशीं पंचबीजाढ्यां स्मरात्पञ्च न्यसेत्क्रमात् । मायाकामो च वाग्लक्ष्मी कामेशी पंचबीजकम् ॥११॥ अध्याय ८६ महालक्ष्मी का अवतार—बगला आदि का मंत्र-साधन सनत्कुमार बोले—मनुष्यों को सिद्धि प्रदान करने वाले सरस्वती-अवतार के बारे में मैंने बता दिया। अब सकलकामनादायक लक्ष्मी अवतार का वर्णन करूंगा। वाणी, मन्मथ, शक्ति (ऐं क्लीं ह्रीं)—ये तीन बीज मन्त्र हैं। इसके ऋषि दक्षिणामूर्ति है, छंद पंक्ति है और देवता त्रिपुरा है। नाभि से चरण तक, पुनः नाभि से हृदय तक और हृदय से मस्तक तक क्रमशः शरीर में अंगन्यास करे ॥१-३३॥ बायें हाथ, दाहिने हाथ, मस्तक, गुह्य स्थान और हृदय में तीन मन्त्र का न्यास करके योनि देश में नौ बार मन्त्र का न्यास करना चाहिये। दोनों कान, ढुड्डी, मुखारविन्द, नेत्र, नासिका, स्कंध, उदर, कुहनी, नाभि, घुटने, लिंग, मस्तक, चरण, गुह्य प्रदेश, पार्श्व, हृदय, स्तन, कंठ देश तथा वाम अंग आदि में भी न्यास करना चाहिये। वाग्भवा आद्या रति का न्यास गुह्य- देश में और प्रीतिमती आदि का न्यास हृदय में करना चाहिये ॥४-८॥ कामबीज आदि का भ्रू मध्य में न्यास करके मनोभवा तथा वागात्मा देवियों का भी न्यास करे। अमृतेश्वरी, योगेश्वरी तथा विश्वयोनि ये तीन वागात्मा देवी कहलाती हैं। मस्तक, मुख, हृदय, गुह्य तथा चरणों में पाँच बीजों से युक्त कामेशी तथा पाँच कामों का क्रमशः न्यास करे। माया, काम, वाक् लक्ष्मी, तथा कामेशी (ह्रीं क्लीं ऐं श्रीं ह्...)—ये पाँच बीज हैं और