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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 806, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 806

षडशीतितमोऽध्यायः ७८७ मनोभवश्च मकरध्वजकंदर्पमन्मथाः। कामदेवः स्मरः पंच कीर्तिता न्याससिद्धिदाः ॥१२॥ शिरःपन्मुखगुह्येषु हृदये बाणदेवताः । द्राविणाद्याः क्रमान्न्यस्येद्बाणेशीबीजपूर्वकाः ॥१३॥ द्रांत्रीं क्लीं जूस इति वै बाणेशीबीजकं च कम् । द्राविणी क्षोभिणी वशीकरण्याकर्षणी तथा ॥१४॥ संमोहनी च बाणानां देवताः पञ्च कीर्तिताः । तार्तीयवाग्मध्यगेन कामेन स्यात्षडंगकम् ॥१५॥ षड्दीर्घस्वरयुक्तेन ततो देवीं विचिंतयेत् । ध्यायेद्रक्तरसरोजस्थां रक्तवस्त्रां त्रिलोचनाम् ॥१६॥ उद्यदर्कनिभां विद्यां मालाभयवरोद्दहाम् । लक्षत्रयं जपेन्मंत्रं दशांशं किंशुकैर्द्भवैः ॥१७॥ पुष्पैह्र्यारिजैर्वापि जुहुयान्मधुरान्वितैः । नवयोन्यात्मकं यंत्रं बहिरष्टदलावृतम् ॥१८॥ केशरेषु स्वरान्न्यस्येद्वर्गानष्टोदलेष्वपि । दलाग्रेषु त्रिशूलानि पद्मं तु मातृकावृतम् ॥१९॥ एवं विलिखिते यंत्रे पीठशक्तीः प्रपूजयेत् । इच्छा ज्ञाना क्रिया चैव कामिनी कामदायिनी ॥२०॥ रती रतिप्रिया नंदा मनोन्मन्यपि चोदिताः । पीठशक्तीरिमा इष्ट्वा पीठं तन्मनुना दिशेत् ॥२१॥ व्योमपूर्वे तु तार्तीयं सदाशिवमहापदम् । प्रेत पद्मासनं डेंतं नमोतः पीठमन्त्रकः ॥२२॥ षोडशार्णस्ततो मूर्ती कॢप्तायां मूलमंत्रतः । आवाह्य प्रजपेद्देवीमुपचारैः पृथग्विधैः ॥२३॥ देवीमिष्ट्वा मध्ययोनौ त्रिकोणे रतिपूर्वकाम् । वामकोणे रति दक्षे प्रीतिमग्रे मनोभवम् ॥२४॥ योन्यन्तर्वह्निकोणाद्वंगान्यग्रेर्विदिक्ष्वपि । मध्ययोनेर्बहिः पूर्वादिसु चाग्रे स्मरानपि ॥२५॥ बाणदेवीस्तद्वदेव शक्त्तीरष्टसु योनिषु । सुभगाख्या भगा पश्चात्तुतीया भगसर्पिणी ॥२६॥ भगमाला तथानंगा नगाद्या कुसुमापरा । अनंगमेखलानंगमदनेत्यष्टशक्तयः ॥२७॥ पद्मकैशरगा ब्राह्मी मुखाः पत्रेषु भैरवाः । दीर्घाद्या मातरः पूज्या ह्रस्वाद्याश्चाष्टभैरवाः ॥२८॥ मनोभव, मकरध्वज, कन्दर्प, मन्मथ, तथा कामदेव--ये पाँच स्मर कहलाते हैं। इनके न्यास करने से सिद्धि मिलती है ॥९-१२॥ शिर, चरण, मुख, गुह्य, हृदय में बाणेशीबीज के साथ बाणदेवता द्राविणी आदि का क्रमशः न्यास करे । "द्रांद्रीं क्लीं जूस:" यह बाणेशीबीज है और द्राविणी, क्षोभिणी, वशीकरणी, आकर्षणी तथा संमोहिनी-ये पांच बाणदेवता हैं। तृतीयवाक् के मध्य में संचरण करने वाले छह दीर्घ स्वरों से युक्त काम से षडंगन्यास करना चाहिये ॥१३-१५½॥ तदनन्तर रक्तकमल पर अवस्थित, रक्तवस्त्रधारिणी, त्रिलोचना, उदीय- मान सूर्य के समान कान्तिवाली और माला तथा अभयास्त्र धारण करने वाली विद्या का ध्यान करके तीन लाख मन्त्र का जप करे और उसका दशांश मधुर मिश्रित पलाश तथा करवीर के पुष्पों से हवन करे। नवयोन्यात्मक यन्त्र का निर्माण करके उनके अष्टदल (कमल) से आवृत करे । फिर केसरों तथा अष्टदलों पर वर्गीय स्वरों का न्यास करके दलों पर त्रिशूल तथा मातृकावृत पद्म का उल्लेख करे । इस प्रकार मन्त्र को लिख- कर उस पर पीठशक्तियों का पूजन करे । इच्छा, ज्ञाना, क्रिया, कामिनी, कामदायिनी, रति, रतिप्रिया, आनंदा, मनोन्मनी-ये पीठशक्तियां कहलाती हैं। इनका पूजन करके पीठ को अभिमंत्रित करे ॥१६-२१॥ "व्योमपूर्वे ........ नमः" यह पीठ का मन्त्र है । तत्पश्चात् देवी की प्रतिमा बनाकर मूलमन्त्र से आवाहन करके नानाविध उपचारों से उनका पूजन करे । त्रिकोण योन्याकृति का निर्माण कर उसके मध्य में पहले रति पश्चात् देवी की पूजा करे । फिर वाम कोण में रति, दक्षिण कोण में प्रीति और अग्र भाग में मनो- भवा देवो की अर्चना करनी चाहिये । योनि के भीतर अग्निकोण में तथा मध्य योनि के बाहर पूर्व आदि दिशाओं में कामों का पूजन करना चाहिये । उसी तरह अष्टयोनियों में अष्ट शक्तियों की पूजा करे। सुभगा, भगसर्पिणी भगमाला, अनंगा, नगाद्या, कुसुमा, अनंगमेखला, अनंगमदना ये आठ शक्तियां हैं ॥२२-२७॥ पत्रों के ऊपर पद्मकेंसरस्थित ब्राह्मीमुख भैरवों को, दीर्घा आदि माताओं की और ह्रस्व आदि आठ भैरवों की पूजा करनी

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