बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७८८ नारदीयपुराणम्
दलाग्रेष्वष्टपीठानि कामरूपाख्यमादिमम् । मलयं कोल्लगिर्याख्यं चौराहाख्यं कुलांतकम् ॥२९॥ जालंधरं तथोन्नासं कोटपीठमथाष्टमम् । भूगृहे दशदिक्ष्वर्चद्धेतुकं त्रिपुरांतकम् ॥३०॥ वैतालमग्निजिह्वं च कमलांतकपालिनौ । एकपादं भीमरूपं विमलं हाटकेश्वरम् ॥३१॥ शक्रांचानायुधैः सार्द्धं स्वस्वदिक्षु समर्चयेत् । तद्बहिर्दिक्षु बटुकं योगिनीं क्षेत्रनायकम् ॥३२॥ गणेशं विदिशास्वर्चेद्वसूनसूर्याञ्छिवांस्तथा । भूताश्चेत्थं भजन्बालामीशः स्याद्धनविद्ययोः ॥३३॥ रक्तांभोजैहुतैनार्यो वश्याः स्युः सर्षपैनृ पाः । नंद्यावर्तै राजवृक्षैः कुन्दैः पाटलचंपकैः ॥३४॥ पुष्पैर्बिल्वफलैरपि होमाल्लक्ष्मीः स्थिरा भवेत् । अपमृत्युं जयेन्मन्त्री गुडूच्या दुग्धयुक्तया ॥३५॥ यथोक्तदूर्वाहोमेन नीरोगार्युः समश्नुते । ज्ञानं कवित्वं लभते चन्द्रागुरुसुरुंहतैः ॥३६॥ पलाशपुष्पैर्वाक्सिद्धिरन्नाप्तिश्चान्नहोमतः । सुरभीक्षीरदध्वक्ताँल्लाजान्हुत्वा रुजो जयेत् ॥३७॥ रक्तचन्दनकर्पूरकचूरगुरुरोचनाः । चन्दनं केशरं मांसी क्रमाद्भागैनियोजयेत् ॥३८॥ भूमिचन्द्रैकनन्दाब्धिविक्सप्तनिगमोन्मितैः । श्मशाने कृष्णभूतस्य निशि नीहारपाथसा ॥३९॥ कुमार्या पेषयेत्तानि मंत्रेणाथाभिमंत्र्य च । विदध्यात्तिलकं तेन दर्शनाद्वशयेज्जनान् ॥४०॥ गजाँसिहादिसत्त्वानि राक्षसाञ्छाकिनीपि । प्रयोजनानां सिद्ध्यै तु देव्याः शापं निवर्त्य च ॥४१॥ विद्यायोत्कीलितां पश्चाज्जपमस्य समाचरेत् । यो जपेदादिमे बीजे वराहभृगुपावकान् ॥४२॥ मध्यामादौ नमो हंसौ मध्यमांते तु पावकम् । आदावंते च तार्तीयक्रमात्स्वं धूम्रकेतनम् ॥४३॥ एवं जप्त्वा शतं विद्या शापहीना फलप्रदा । यद्वाद्ये चरमे बीजे नैव रेफं वियोजयेत् ॥४४॥
चाहिये। पत्रों के अग्रभाग पर कामरूप, मलय, कोल्लगिरि, चौहार, कुलांतक, जालंधर, उन्नास तथा कोट- पीठ—इन आठ पीठों का पूजन करना चाहिये। भूगृह की दशों दिशाओं में हेतुक, त्रिपुरांतक, वैताल, अग्नि- जिह्व, कमलांत, कपाली, एकपाद; भीमरूप, विमल तथा हाटकेश्वर की अर्चना करे। पुनः अपनी-अपनी दिशा में आयुध सहित इन्द्रादि देवों की पूजा करनी चाहिये। उसके बाहर बटुक, योगिनी, क्षेत्रनायक और गणेश को पूजा करे ॥२८-३२॥ विदिशाओं में वसु, सूर्य तथा शिव का पूजन करे। इस प्रकार भूतों का उपासक व्यक्ति वनिताओं का स्वामी, धनवान् तथा विद्यावान् होता है। रक्त कमलों से हवन करने पर स्त्रियां वस में आती हैं और सरसों से होम करने पर राजा वशीभूत होते हैं। नंद्यावर्त (तगर), राजवृक्ष, (सोन्दाल), कुन्द, पाटल, चम्पापुष्प तथा विल्वफलों से हवन करने पर लक्ष्मी अचल होती है। साधक दुग्धयुक्त गुडूच से हवन कर अपमृत्यु को जीतता है ॥३३-३५॥ उसी तरह दूर्वा से हवन करने वाला दीर्घायु होता है। कर्पूर, अगर तथा गुडूच से हवन करने पर ज्ञान एवम् कवित्वशक्ति की प्राप्ति होती है। पलाश पुष्पों से हवन करने पर वाक्सिद्धि तथा अन्न-होम से अन्न की प्राप्ति होती है। गोदुग्ध एवम् दधियुक्त लावा से होम करने से रोग का क्षय होता है। रक्तचन्दन, कर्पूर, कचूर, अगर, गोरोचन, चन्दन, केसर और जटामांसी को क्रमशः एक, एक, एक, नौ, सात, दश, सात और चार भागों में विभक्त कर श्मशान में कृष्णचतुर्दशी की रात नीहार (बर्फ़) के जल से कुमारी कन्या के द्वारा पिसाये ॥३६-३९॥ फिर मन्त्र से अभिमन्त्रित करके उसका तिलक लगाये। तब जिसके ऊपर उसकी दृष्टि पड़ेगी, वह वशीभूत हो जाएगा। यहाँ तक कि हाथी, सिंह, राक्षस, शाकिनी आदि भी वश में आ जायेंगे। कामनासिद्धि के लिये देवी का शापोद्धार करके उनके कील का पाठ करे और पश्चात् जप करे। आदिम बीज में वराह, भृगु तथा पावक का, मध्यमादि में अन्तरिक्ष तथा हंस का, मध्यमान्त में पावक का और आदि-अन्त में तार्तीयक्रम से धूम्रकेतन का सौ बार जप करके फलदायिनी विद्या को शापहीना बनाये। अथवा अंतिम बीज में रेफ को न जोड़े। अथवा शापोद्धार का प्रकारान्तर भी