बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 808, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंषडशीतितमोऽध्यायः ७८६ शापोद्धारप्रकारोऽन्यो यद्वाय॑ कीर्तितो बुधैः । आद्यमाद्यं हि तार्तीयं कामः कामोऽथ वाग्भवम् ॥४५॥ अंत्यमंत्यमनंगश्च नवार्णः कीर्तितो मनुः । जप्तोयं शतधा शापं बालाया विनिवर्तयेत् ॥४६॥ चैतन्याह्लादिनीमन्त्रौ जप्तौ निष्कीलताकरी । विस्वराश्चेतनं मन्त्री धरः शांतिरनुग्रहः ॥५७॥ तारादिहृदयांतः स्यात्काम आह्लादिनोमनुः । तथा त्रयाणां बीजानां दीपनैर्मनुभिस्त्रिभिः ॥४८॥ सुदीप्तानि विधायादौ जपेत्तानीष्टसिद्धये । वद्द्वयुग्मं सदर्घांबु स्मृतिर्भालावनंगतौ ॥४९॥ सत्यः सनेत्रो नस्तादृग्वा वाग्वर्णाद्यदीपिनि । क्लिन्ने क्लेदिनि वैकुण्ठी दीर्घं स्वं सद्यगोंतिमः ॥५०॥ निद्रा सचन्द्रा कुर्वोतं शिवर्णा मध्यदीपिनो । तारो मोक्षं च कुरुते नायं वर्णास्यदीपिनी ॥५१॥ दीपिनीमंतरा बाला साधितापि न सिध्यति । वागंत्यकासान् प्रजपेदरीणां क्षोभहेतवे ॥५२॥ कामवागंत्यबीजानि त्रैलोक्यस्य वशीकृतौ । कामांत्यवाणीबीजानि मुक्तये नियतो जपेत् ॥५३॥ पूजारंभे तु बालायास्त्रिविधानर्चयेद्गुरून् । दिव्यौघश्चैव सिद्धौघा मानवौध इति त्रिधा ॥५४॥ परप्रकाशः परमेशातः परशिवस्तथा। कामेश्वरस्ततो मोक्षः षष्ठः कामोऽमृतोऽन्तिमः ॥५५॥ एते दप्तैव दिव्यौघा आनन्दपदपश्चिमाः । ईशानास्यस्त्वघुरषोऽघोराख्यो वामदेवकः ॥५६॥ सद्योजात इमे पंच सिद्धौघाख्याः स्मृता मुने । मानवौघाः परिज्ञेयाः स्वगुरोः सम्प्रदायतः ॥५७॥ नवयोन्यात्मके यन्त्रे विलिखेन्मध्ययोनितः । प्रदाक्षिण्येन बीजानि त्रिवारं साधकोत्तमः ॥५८॥ त्रींस्त्रीन्वर्णोस्तु गायत्र्या अष्टपत्रेषु सल्लिखेत् । बरिर्मातृकयाऽऽवेष्ट्य तद्बहिर्भू१पुरद्वयम् ॥५९॥ कामबोजलसत्कोण व्यतिभिन्नं परस्परम् । पत्रे त्रैपुरमाख्यातं जपसंपातसाधितम् ॥६०॥ बाहुना विधृते दद्याद्धनं कीर्ति सुखं सुतान् । कामांते त्रिपुरा देवी विद्महे कविशं महिमू ॥६१॥ बकः खङ्गी समारूढः सनेत्रोऽग्निश्च धोमहि । तत्र क्लिन्ने प्रचोदांते यादित्येषा प्रकीर्तिता ॥६२॥ गायत्री त्रैपुरा सर्वसिद्धिदा सुरसेविता । अथ लक्ष्यवतारोऽन्यः कीर्त्यते सिद्धिदो नृणाम् ॥६३॥ विद्वान् लोग बतलाते हैं। आदि में तार्तीय, मध्य में वाग्भव तेवता तथा काम और अन्त में अनंग के जोड़ने से जो मन्त्र बनता है, उसके सौ बार जप करने से देवी का शाप निवृत्त हो जाता है ॥४०-४६॥ साधक इष्टसिद्धि के लिये "चैतन्य........ आह्नादिनी"--इस मन्त्र का तथा तीन बीज मन्त्रों का जप करे। "वद युग्मम्.... दीपिनीम्"--इस मन्त्र को विना जप किये विद्या के साधन करने पर भी वह सिद्ध नहीं होती। शत्रुनाश के लिये वाक्....."--इस मन्त्र का जप करे। त्रैलोक्य को वश में करने के लिये "कामवान्........" और मोक्ष के लिये "कामांत्यत्राणी......" का जप करना चाहिये। देवों के पूजारंभ में तीन प्रकार के गुरुओं की अर्चना करनी चाहिये । दिव्यौघ, सिद्धोध तथा मानवोध-ये त्रिविध गुरु हैं। परप्रकाश, परमेशान, परशिव, कामेश्वर, मोक्ष काम तथा अमृत--ये सात दिव्यौष कहलाते हैं। मुने ! आनंदपद, ईशान, अघोर, वामदेव और सद्योजात-ये पांच सिद्धौघ कहलाते हैं ॥४७-५६॥ मानवौघों को तो अपने गुरु के संप्रदाय से समझना चाहिये । साधकश्रेष्ठ नव योन्यात्मक यन्त्र में मध्ययोनि से आरंभ कर तोन बार बीज मन्त्रों को लिखे। फिर गायत्री के तीन-तीन वर्णों को अष्ट पत्रों पर लिखे । उसके बारह मातृकावर्णों को लिख कर दो भूपुरों का उल्लेख करे। कोने में कामबीज (क्लीं) को लिखे । परन्तु वे परस्पर भिन्न हो। पत्र पर जप, संपात और साधित नामक तीन पुरों का पूजन करे ॥५७-६०॥ फिर उसे बाहु पर धारण करके दान करने से धन, कीर्ति, सुख तथा पुत्रों की प्राप्ति होती है। कामबीज के अन्त में ऐसा सोचे कि हम त्रिपुरा देवी को जान रहे हैं। विष आदि का नाश करने वाली है। हम वक, खङ्गी तथा सवारी पर चढ़े दृग नेत्र सहित अग्नि का ध्यान करते हैं। १. यंत्र बहिः स्थित रेखासन्निवेश युक्त भूम्याकार स्थान ।