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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 809, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 809

७६० नारदीयपुराणम् वेदादिगिरिजा पद्मा मन्मथो हृदयं भृगुः । भगवति माहेश्वरी ङेन्तेऽन्नपूर्णे दहनांगना ॥६४॥ प्रोक्ता विंशतिवर्णेयं विद्या स्याद्द्द्रुहिणो मुनिः । धृतिश्छंदोऽन्नपूर्णेशी देवता परिकीर्तिता ॥६५॥ षड्दीर्घाढ्येन हृल्लेखाबीजेन स्यात्षडंगकम् । मुखनासार्क्षिकर्णा सपुटेषु नवसु न्यसेत् ॥६६॥ पदानि नव तद्वर्णसंख्येदानोमुदीर्यते । भूमिवन्द्रधरेकाक्षिवेदबिधुयुगवाहुभिः ॥६७॥ पदसंख्यामिता वर्णैस्ततो ध्यायेत्सुरेश्वरीम् । स्वर्णाभांगीं त्रिनयनां वस्त्रालंकारशोभिताम् ॥६८॥ धूरमासं युतां देवीं स्वर्णाभित्रकरांबुजाम् । लक्षं जपोऽयुतं होमो घृताक्तचरण तथा ॥६६॥ जयादिनवशक्त्याढ्ये पीठे पूजा समीरिता । त्रिकोणा वेदपत्राष्टपत्रषोडशपत्रके ॥७०॥ भूपुरेण युते यन्त्रे प्रदद्यान्मायया मनुम् । अग्न्यादिकोणत्रितये शिववाराहमाधवान् ॥७१॥ अर्चयेत्स्वस्वमंत्रैस्तु प्रोच्यते मनवस्तु ते । प्रणवो मनुचंद्राढ्यं गगनं हृदयं शिवा ॥७२॥ मारुतः शिवमन्त्रोऽयं सप्ताण्र्णः शिवपूजने । वाराहनारायणयोर्मन्त्रौ पूर्वं मुदोरयेत् ॥७३॥ षडंगानि ततोऽभ्यर्च्य वामे दक्षे धरा रमाम् । यजेत्स्वस्वमनुभ्यां तु तावुच्येते मुनीश्वर ॥७४॥ अन्नं महान्नमित्युक्त्वा मे देह्यन्नाधिपोर्णकाः । नयेन्मन्त्रं प्राणान्ते दापयानन्तसुन्दरी ॥७५॥ द्वाविंशत्यक्षरो मंत्रो भूमोष्टौ भूमिसंपुटः । लक्ष्म्योष्टौ श्रीपुटो विप्र स्मृतिलंमनुचंद्रयुक्त ॥७६॥ भुवो बीजमिति प्रोक्तं श्रीबीजं प्रागुदाहृतम् । मंत्रादिस्थचतुर्बीजपूर्विकाः परिपूजयेत् ॥७७॥ शक्तीश्चतस्रो वेदास्त्रे परा च भुवनेश्वरी । कमला सुभग चेति बाह्ययाथ्या अष्टपत्राः ॥७८॥ षोडशारे स्मृते चैव मानदातुष्टिपुष्टयः । प्रीती रतिर्ह्रीः श्रीश्चापि स्वधा स्वाहा दशम्यथ ॥७६॥ कल्पांत में वही त्रिपुरा देवी अदिति नाम से पुकारी जाती हैं त्रिपुरा गायत्री समस्त सिद्धियों को देने वाली है। देवगण उनकी सेवा करते हैं । इसके बाद मनुष्यों को सिद्धि प्रदान करने वाले लक्ष्मी के अन्य अवतारों का वर्णन करता हूँ । “वेदादि ......... अंगना” यह है । द्रुहिण इसके ऋषि हैं । धृति छंद है और पूर्णेशी देवता है ॥६४-६५॥ छह दीर्घों से युक्त हृल्लेखा नामक बीज मन्त्र से मुख, नासिका, नेत्र, कर्ण स्कन्ध और मुदा में षडंग न्यास करना चाहिये । तदनन्तर नौ पदों का भी न्यास करे, जिनकी वर्णसंख्या १११२४७२२ हैं । उसके बाद भुवनेश्वरी का ध्यान करे, जिनके तीन नेत्र हैं, अंगों की आभा सुवर्ण के समान हैं, करकमल सोने की अंगूठी से सुशो- भित है, पृथ्वी और लक्ष्मी साथ में रहती हैं, वस्त्र तथा अलंकार शोभा बढ़ाते है । तत्पश्चात् एक लाख मन्त्र का जप करके दश हजार घृतमिश्रित चरु से उसका हवन करे । जया आदि नौ शक्तियों से युक्त पीठ पर पूजा करनी चाहिये ॥६६-६९॥ भूपुर से युक्त, त्रिकोण तथा चतुष्पत्र, अष्टपत्र एवम् षोडश पत्रात्मक यन्त्र पर माया (ह्रीं) सहित मंत्र को लिखे । अग्नि आदिति न कोण में शिव, वाराह तथा माधव के अपने-अपने मन्त्र से पूजन करना चाहिये । अब मंत्र बताया जा रहा है-“प्रणवा मारुतः”-यह शिव पूजन का मन्त्र है । वाराह और नारायण का मन्त्र पहले पढ़ना चाहिये । मुनीश्वर ! तदन्तर षडंगों का पूजन करके वाम और दक्षिण भाग में धरा और रमा की अपने-अपने मन्त्रों से पूजा करना चाहिये । "अन्नम् सुन्दरी"- यह भूमि का मन्त्र है और "लक्ष्मी बीजम्"- यह लक्ष्मी का मन्त्र है । मत्रादिस्थ चतुर्बीज पूर्वक इनकी पूजा करनी चाहिये ॥७०-७७॥ चार शक्तियां, वेदाश्रा, परा भुवनेश्वरी, कमला, सुभगा ब्राह्मी और-इनको अष्टपत्र पर अर्चना करनी चाहिये । षोडश पत्र मानदा, तुष्टि, पुष्टि, प्रीति, रति, ह्री, श्री स्वधा, स्वाहा,