बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तशीतितमोऽध्यायः ७६३ मण्डूकवदने न्यस्येतपीतसूत्रेण वेष्टितम् । पूजितं पीतपुष्पैस्तद्वाचं संस्तंभयेद्विषाम् ॥११२॥ यद्भूमो भविता दिव्यं तत्र यंत्रं समालिखेत् । मार्जितं तद्विषां पात्रैर्दिव्यस्तम्भनकृद्भवेत् ॥११३॥ इन्द्रवारुणिकामूलं सप्तशो ह्यनुमंत्रितम् । क्षिप्तं जले दिव्यकृतं जलस्तंभनकारकम् ॥११४॥ किं बहुक्त्या साधकेन मन्त्रः सम्यगुपासितः । शत्रूणां गतिबुद्ध्यादेः स्तंभनो नात्र संशयः ॥११५॥ इति श्री बृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे यक्षिणीमन्त्रसाधननिरूपणं नाम षडशीतितमोऽध्यायः ॥८६॥ सप्ताशीतितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच अवतारत्रयं लक्ष्म्याः कथितं ते द्विजोत्तम । दुर्गायाश्चाभिधास्यामि सर्वलोकोपकारकान् ॥१॥ प्रणवः श्रीः शिवायुग्मं वाणीवैरोचनीपदम् । वज्रायं क्षुधिता सुक्ष्मा मृता स्वाग्नीन्दुसंयुता ॥२॥ प्रतिष्ठाप्य शिवा फट् च स्वाहांतोऽष्टाष्टिवर्णवान् । भैरवोऽस्य मुनिः सम्राट् छन्दो मन्त्रस्य देवता ॥३॥ का गतिस्तम्भन होता है । प्रेत वस्त्र पर अंगार ही से मन्त्र को लिखकर पीत सूत्र से वेष्टित करके मेढक के मुह में रख दे और पीले फूलों से उसकी पूजा करे । ऐसा करने से शत्रुओं का वाक्स्तंभन होता है ॥११०-११२॥ भूमि पर लवंग से यन्त्र लिखे और उसको शत्रु के पात्र से मिटा दे। ऐसा करने से दिव्यस्तंभन होता है। इन्द्रवारुणी की जड़ को सात बार अभिमंत्रित करके जल में फेंक दे। ऐसा करने से जल-स्तंभन होता है। बहुत क्या कहें ? अच्छी तरह मन्त्र की उपासना करने वाला साधक शत्रुओं की गति, बुद्धि आदि का स्तम्भन कर सकता है, इसमें संशय नहीं ॥११३-११५॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में यक्षिणी मन्त्रसाधन निरूपण नामक छियासीवां अध्याय समाप्त ॥८६॥ अध्याय ८७ विधान सहित दुर्गा-मन्त्रों का निरूपण सनत्कुमार बोले-द्विजोत्तम ! लक्ष्मी के तीन अवतारों का वर्णन तो मैंने कर दिया । अब दुर्गा के अखिल लोकोपकारक अवतारों को सुनाऊँगा । 'प्रणवः...........'स्वाहा" यह दुर्गा का मन्त्र है। इसके ऋषि भैरव, छंद सम्राट्, देवता छिन्नमस्ता, बीज रमा और शक्ति स्वाहा कही जाती है। "आं खड्गाय" इत्यादि १०० ना० पु०