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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 813, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 813

७६४ नारदीयपुराणम्

छिन्नमस्ता रमा बीजं स्वाहा शक्तिरुदीरिता । आं खङ्गाय हृदयाख्यातमों खङ्गाय शिरः स्मृतम् ॥१४॥ ऊँ वज्राय शिखा प्रोक्ता ऐं पाशाय तनुच्छदम् । ओमंकुशाय नेत्रं स्याद्विसर्गो वसुरक्षयुक् ॥१५॥ मायायुग्मं चास्त्रमंगम् मनवः प्रणवादिकाः । स्वाहांताश्चैवमंगानि कृत्वा ध्यायेदथांबिकाम् ॥१६॥ भानुमंडलसंस्थानां प्रविकीणालकं शिरः । छिन्नं स्वकं स्फारमुखं स्वरक्तं प्रपिबद्गलात् ॥१७॥ उपरिस्थां रतासक्तरतिमन्मथयोर्निजे । डाकिनीवर्णनीसख्यौ दृष्ट्वा मोदभराकुलाम् ॥१८॥ ध्यात्वैवं प्रजपेल्लक्षचतुष्कं तद्दशांशतः । पालाशैर्बिल्वजैर्वापि जुहुयात्कुसुमैः फलैः ॥१९॥ आधारशक्तिमारभ्य परतत्त्वांतपूजिते । पीठे जयाख्या विजया जिता चापि पराजिता ॥२०॥ नित्या विलासिनी षष्ठी दोग्ध्र्यघोरा च मंगला । दिक्षु मध्ये च संपूज्या नव पीठस्य शक्तयः ॥२१॥ सर्वबुद्धिप्रदे वर्णनीये सर्वभृगुः सदृक् । सिद्धिप्रदे डाकिनीये तारो वज्रः सभौतिकः ॥२२॥ खङ्गीशो रोचनीयंते भगं धेहि नमोन्तकः । तारादिपीठमन्त्रोऽयं वेदरामाक्षरो मतः ॥२३॥ समर्प्यसनमेतेन तत्र संपूजयेच्छिवाम् । त्रिकोणमध्यषट्कोणपद्मभूपुरमध्यतः ॥२४॥ बाह्यावरणमारभ्य पूजयेत्प्रतिलोमतः । भूपुरे बाह्यमार्गेषु वज्रादीनि प्रपूजयेत् ॥२५॥ तदंतः सुरराजादीन्पूजयेद्धरितां पतीन् । भूपुरस्य चतुर्द्वार्वु द्वारपालान्यजेदथ ॥२६॥ करालविकरालाख्यावर्तिकालस्तृतीयकः । महाकालश्चतुर्थः स्यादाथ पद्मेऽष्टशक्तयः ॥२७॥ एकलिंगा योगिनी च डाकिनी भैरवी तथा । महाभैरवकैंद्राक्षी त्वसितांगी तु सप्तमी ॥२८॥ संहारिण्यष्टमी चेति षट्कोणेष्वंगमूर्तयः । त्रिकोणगा छिन्नमस्ता पार्श्वयोस्तु सखीद्वयम् ॥२९॥ डाकिनीवर्णनीसंज्ञं तारावाग्भ्यां प्रपूजयेत् । एवं पूजादिभिः सिद्धे मन्त्रे मंत्री मनोरथान् ॥३०॥

मन्त्र से अंगन्यास करके अंबिका का इस प्रकार ध्यान करे-“देवी सूर्यमंडल में स्थित हैं, शिर के बाल बिखरे हुए हैं, अपने आप शिर को काट लिया है, मुख फैला हुआ है, अपने बहते हुए रक्त को पी रही हैं, रतिक्रीड़ा में आसक्त रति और कामदेव के ऊपर अवस्थित हैं, अपनी डाकिनी और वर्णिनी नामक सखियों को देखकर वे आमोद विह्वल हो रही हैं ॥१-८॥ इस प्रकार ध्यान करके एक लाख मन्त्र का जप करे और उसका दशांश पलाश या बिल्व के फूल-फलों से पीठ पर हवन करे, जो आधार शक्ति से लेकर परतत्त्व के अंत तक पूजित हो । जया, विजया, जिता, अपरा- जिता, नित्या, विलासिनी, दोग्धी, अघोरा, मंगला-इन नौ पीठ शक्तियों को दिशाओं के मध्य में पूजा करे । “सर्व बुद्धिप्रदे・・・・・・” यह पीठमन्त्र कहलाता है । इस मन्त्र से आसन समर्पित कर उस पर शिवा का पूजन करे । त्रिकोण, षट्कोण और पद्मभूपुर के मध्य में बाह्यावरण से लेकर प्रतिलोमभाव से पूजा करनी चाहिये ॥९-१४१/२॥ भूपुर के बाह्य भाग में वज्र आदि का पूजन करे । उसके भीतर देवराज आदि दिक्पालों की पूजा करके भूपुर के चारों द्वारों पर द्वारपालों की अर्चना करनी चाहिये । कराल, विकराल, अतिकाल और महाकाल--ये चार द्वारपाल कहलाते हैं । इसके बाद एकलिंगा, योगिनी डाकिनी, भैरवी, महाभैरवी इंद्राक्षी, असितांगी और संहारिणी नामक आठ पद्मेष्ट शक्तियों की पूजा करके षट्कोण में त्रिकोणगा, छिन्नमस्ता आदि अंगमूर्तियों की अर्चना करे । दोनों बगल में डाकिनी और वर्णिनी नामक दो सखियों का तारक अथवा बीज मन्त्र से पूजा करनी चाहिये । इस प्रकार पूजा आदि से मंत्र सिद्ध हो जाने पर मंत्री उसके प्रभाव से तुरन्त सकल दुर्लभ मनोरथों को