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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 814, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 814

Here is the complete textual transcription of the provided page:

सप्ताशीतितमोऽध्यायः $\quad$ ७९५ प्राप्नुयान्निखिलान्सद्यो दुर्लभंस्तत्प्रसादतः । श्रीपुष्पैर्लभते लक्ष्मीं तत्फलैश्च समीहितम् ॥२१॥ वाक्सिद्धिं मालतीपुष्पैश्चम्पकैर्हवनात्सुखम् । घृताक्तं छागमांसं यो जुहुयात्प्रत्यहं शतम् ॥२२॥ मासमेकं तु वशगास्तस्य स्युः सर्वपार्थिवाः । करवीरसुमैः श्वेर्तैर्लक्षसंख्यैर्जुहोति यः ॥२३॥ रोगजालं पराभूय सुखी जीवेच्छतं समाः । रक्तैस्तत्संख्यया हुत्वा वशयेन्मन्त्रिणो नृपान् ॥२४॥ फलैर्हुत्वाप्नुयाल्लक्ष्मीमुदुंबरपलाशजैः । गोमायुमांसैस्तामेव कवितां पायसांधसा ॥२५॥ बंधूककुसुमैर्भाग्यं कर्णिकारैः समीहितम् । तिलतंडुलहोमेन वशयेन्निखिलाञ्जनान् ॥२६॥ नारीरजोमिश्राकृष्टैमृगमांसैः समीहितम् । स्तंभनं माहिषैर्मांसैः पंकजैः सघृतैरपि ॥२७॥ चिताग्नौ परभृत्पक्षैर्जुहुयादरिमृत्यवे । उन्मत्तकाष्ठदीप्तेऽग्नौ तत्फलं वायसच्छदैः ॥२८॥ द्यूते वने नृपद्वारे समरे वैरिसंकटे । विजयं लभते मंत्री ध्यायन्देवी जपन्मनुम् ॥२९॥ भुक्तये मुक्तये सितां ध्यायेदुच्चाटे नीलरुचिषम् । रक्तां वश्ये मृतौ धूम्नां स्तंभने कनकप्रभाम् ॥३०॥ निशि दद्याद्बलिं तस्यै सिद्धये मदिरादिना । गोपनीयः प्रयोगोऽयं प्रोच्यते सर्वसिद्धिदः ॥३१॥ भूताहे कृष्णपक्षस्य मध्यरात्रे तमोधने । स्नात्वा रक्ताम्बरधरो रक्तमाल्यानुलेपनः ॥३२॥ आनीय पूजयेन्नारीं छिन्नमस्तास्वरूपिणीम् । सुन्दरीं यौवनाक्रांतां नरपञ्चकगामिनीम् ॥३३॥ सुस्मितां मुक्तकबरीं भूषावानप्रतोषिताम् । विवस्त्रां पूजयित्वैनमयुतं प्रजपेन्मनुम् ॥३४॥

प्राप्त कर लेता है ॥१५-२०$\frac{१}{२}$॥ श्रीपुष्पों से हवन करने से लक्ष्मी, श्रीफलों से मनःकामना, मालती पुष्पों से वाक्सिद्धि और चंपा से सुख की प्राप्ति होती है। जो एक मास तक प्रतिदिन घृतमिश्रित छाग के मांस से हवन करता है, उसके वश में समस्त नृपगण आ जाते हैं। जो श्वेत करवीर के पुष्पों से एक लाख होम करता है, वह रोग-समूह को जीत कर सौ वर्षों तक सुख से जीता है। उतनी ही संख्या में रक्त करवीर के पुष्पों से हवन करनेवाला व्यक्ति मंत्रियों तथा राजाओं को वश में करता है। गूलर और पलाश के फलों से होम करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है ॥२१-२४$\frac{१}{२}$॥ बन्धूक (दोपहरिया फूल) कुसुमों से हवन करने पर सौभाग्य की प्राप्ति होती है और कर्णिकार (कनेल) से होम करने से मनः-कामना पूर्ण होती है॥ तिल और तंडुल से हवन करने वाला व्यक्ति अखिल जनों को वश में करता है। नारी के रज से संमिश्रित मृगमांस से हवन करने पर अभिलाषा की पूर्ति होती है। महिष के मांस तथा घृत मिश्रित कमलों से होम करने पर स्तंभन सिद्ध होता है। शत्रु को मारने के लिए चिता की अग्नि में कौए के पंख से हवन करे । धतूरे की लकड़ी से जलाये गए अग्नि में भी कौए के पंख से वही फल मिलता है। द्यूतक्रीड़ा, वन, नृपद्वार, समर तथा शत्रुसंकट में देवी का ध्यान तथा मंत्रजप करने वाला साधक जन-विजय लाभ करता है। भुक्ति-मुक्ति प्राप्त करने के लिये शुक्लवर्णा देवी का ध्यान करे और उच्चाटन के लिये नीलवर्णा का। वशीकरण के लिये रक्तवर्णा, मृत्यु के लिये धूम्रवर्णा और स्तम्भन के लिये स्वर्णवर्णा का ध्यान करना चाहिये ॥२५-३०॥ सिद्धि के निमित्त रात्रि में उन्हें मद्य आदि की बलि चढ़ाये । इस सर्व सिद्धिदायक प्रयोग को गुप्त ही रखना चाहिये । कृष्णपक्ष की चतुर्दशी की घोर अन्धकारपूर्ण मध्यरात्रि में छिन्नमस्ता देवी की-सी आकृति वाली, सुन्दरी, पूर्ण यौवना, पांच पुरुषों से गमन करने वाली, सुन्दर मुसकान करने वाली, खुली वेणी वाली और आभूषणों से विभूषित ललना को विवस्त्र करके उसकी पूजा करे। फिर दश हजार मंत्र का जप करके बलि समर्पित करे। इस तरह रात्रि व्यतीत कर वनिता को धन से