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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 815, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 815

७६६ नारदीयपुराणम् बलिं दत्त्वा निशां नीत्वा संप्रेष्य धनतोषिताम् । भोजयेद्विविधैरन्नैर्ब्राह्मणान्भोजनादिना ॥३५॥ अनेन विधिना लक्ष्मीं पुत्रान्पौत्रान्धनं यशः । नारीमायुः सुखं धर्ममिष्टं च समवाप्नुयात् ॥३६॥ तस्यां रात्रौव्रतं कार्यं विद्याकामेन मन्त्रिणा । मनोरथेषु चान्येषु गच्छेत्तां प्रजपन्मनुम् ॥३७॥ उषस्युत्थाय शय्यायामुपविष्टो जपेच्छतम् । षण्मासाभ्यन्तरे मन्त्री कवित्वेन जयेत्कविम् ॥३८॥ शिवेन कीलिता चेयं तदुत्कीलनमुच्यते । मायां तारपुटां मंत्री जपेदष्टोत्तरं शतम् ॥३९॥ मन्त्रस्यादौ तथैवांते भवेत्सिद्धिप्रदा तु सा । उदिता छिन्नमस्तेयं कलौ शीघ्रमभीष्टदा ॥४०॥ अवतारांतरं देव्या वच्मि ते मुनिसत्तम । ज्ञानामृतारुणा श्वेता क्रोधिनी ढुंसमन्विता ॥४१॥ शांतिस्तथाविधा चापि नीच सर्वान्वितास्तयः । वाग्भवं कामराजाख्यं शक्तिबीजाह्वयं तथा ॥४२॥ त्रिभिर्बीजैः पंचकूटात्मिका त्रिपुरभैरवी । ऋषिः स्याद्दक्षिणामूर्त्तिश्छन्दः पंक्तिरुदीरिता ॥४३॥ देवता देशिकैरुक्ता देवी त्रिपुरभैरवी । नाभेरधश्चरणं न्यस्य वाग्भवं मन्त्रवित्पुनः ॥४४॥ हृदयान्नाभिपर्यंतं कामबीजं प्रविन्द्वसेत् । शिरसो हृत्प्रदेशांतं तार्तीयं विन्यसेत्ततः ॥४५॥ आद्यं द्वितीयं करयोस्तार्तीयमुभयं न्यसेत् । मूलाधारे हृदि न्यस्य भूयो बीजत्रयं क्रमात् ॥४६॥ नवयोन्यात्मकं न्यासं कुर्याद्वीजैस्त्रिभिः पुनः । बालोदितप्रकारेण मूर्तिन्यासमथाचरेत् ॥४७॥ स्वस्वबीजादिकं पूर्वं मूर्द्धीशानमनोभवम् । न्यसेद्दक्षौ तत्पुरुषं मकरध्वजमात्मवित् ॥४८॥ हृद्यघोरकुमारादिकंदर्पं तदनंतरम् । गुह्यदेशे प्रविन्त्यस्येद्वामदेवादिमन्मथम् ॥४९॥ सद्योजातं कामदेवं पादयोर्विन्यसेत्ततः । ऊर्ध्वं प्राग्दक्षिणोदीच्यपश्चिमेषु मुखेषु तान् ॥५०॥ संतुष्ट करके लौटा दे ॥३१-३४॥ पश्चात् विविध प्रकार की भोज्य-सामग्रियों से ब्राह्मणों को भोजन कराये । ऐसा करने से लक्ष्मी, पुत्र, पौत्र, धन, यश, नारी, आयु, सुख, धर्म और कल्याण की प्राप्ति होती है। विद्या के इच्छुक साधक उस रात्रि में व्रत करे। अन्य मनोरथों की सिद्धि के लिये उस रात्रि में मंत्र का जप करे और प्रातःकाल उठकर शय्या पर ही सौ बार मन्त्र को जपे । ऐसा करने वाला साधक छह मास के भीतर ही अपनी कवित्वशक्ति से कवियों को पराजित कर देता है ॥३५-३८॥ शिव ने छिन्नमस्ता को कीलित (बद्ध) किया था। इसलिये उनका उत्कीलन भी कहा जाता है। अर्थात माया (ह्रीं) को तार (ओं) से संपुटित करके मंत्र के आदि तथा अन्त में एक सौ आठ बार जप करे। ऐसा करने से देवी सिद्धि प्रदान करती हैं। कलियुग में तो छिन्नमस्ता शीघ्र ही कामना को पूर्ण कर देती हैं ॥३९-४०॥ मुनिश्रेष्ठ ! अब मैं देवी के अन्य अवतार का वर्णन करता हूँ। "ज्ञानामृता....." यह त्रिपुर भैरवी का मंत्र है । इसके ऋषि दक्षिणामूत्ति, छंद पंक्ति और देवता-देशिकों के कथनानुसार-त्रिपुर भैरवी हैं। मंत्रवेत्ता व्यक्ति नाभि में वाग्भव आचरण का न्यास करके हृदय से नाभि पर्यंत कामबीज का न्यास कर शिर से हृदय पर्यन्त तार्तीय बीज का न्यास करना चाहिये । आद्य, द्वितीय और तृतीय बीज का दोनों हाथों में न्यास करे। पुनः मूलाधार हृदय में क्रमशः तीनों बीजों का न्यास करके बीजत्रय से नवयोन्यात्मक न्यास भी करे ॥४१-४६॥ अनन्तर देवी के कथनानुसार मूर्तिन्यास करे । आत्मज्ञानी व्यक्ति मस्तक तथा मुख में अपने- अपने बीज आदि के साथ क्रमशः शिव तथा कन्दर्प का न्यास करे । हृदय में अघोर, कुमार तथा काम का न्यास करके गुह्य देश में वामदेव आदि मदन का न्यास करना चाहिये । सद्यः उत्पन्न कामदेव का दोनों चरणों में न्यास करे । ऊपर, पूरब, दक्षिण, उत्तर और पश्चिम दिशा में पूर्वोक्त देवों का ही न्यास करे