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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 816, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 816

An accurate representation of the Hindi and Sanskrit text in the image:

सप्तशीतितमोऽध्यायः [Right aligned: ७८७] प्रन्यसेद्यथापूर्वं भृगुव्योमाग्निसंस्थितः । सप्तादिपञ्चह्रस्वाद्या बीजमेषां प्रकीर्तितम् ॥५१॥ षड्दीर्घयुक्तेनाद्येन बीजेनांगक्रिया मता । पञ्चबाणांस्ततो न्यस्येन्मन्त्री त्रैलोक्यमोहनान् ॥५२॥ द्रामाद्यां द्राविणीं मूर्ध्नि द्रामाद्यां क्षोभणी पदे । क्लींवशीकरणीं वक्त्रे गुह्ये ब्लूं बीजपूविकांम् ॥५३॥ आकर्षणीं हृदि पुनः सर्वान्तभृगुसंस्थिताम् । संमोहनीं क्रमादेवं बाणन्यासोऽयमीरितः ॥५४॥ भालभ्रू मध्यवक्तेषु घंटिकाकण्ठहृत्सु च । नाभ्यधिष्ठानयोः पञ्च ताराद्याः सुभगादिकाः ॥५५॥ मस्तकावधि नाभेस्च संन्त्रिणा सुभगा भगा । भगसर्पिण्यथ परा भगमालिन्यनंतरम् ॥५६॥ अनंगानंगकुसुमा भूयश्चानंगमेखला । अनंगमदना सर्वा मदविभ्रममंथरा ॥५७॥ प्रधानदेवता वर्णभूषणाद्यैरंलकृताः । अक्षस्रक्पुस्तकाभीतिवरदाढ्यकरांबुजाः ॥५८॥ वाष्कामब्लूं स्त्रीं सरांते ताराः पंच प्रकीर्तिताः । ततः कुर्याद्भूषणाह्यं न्यासमुक्तदिशा मुने ॥५६॥ एवं न्यस्तशरीरोऽसौ ध्यायेत्त्रिपुरभैरवीम् । सहस्रभानुसंकाशामरुणक्षौमवासतीम् ॥६०॥ शिरोमालामसृग्लिप्तस्तनीं जपवटीं करैः । विद्यामभीतिं च वरं दधतीं तीक्ष्णाननाम् ॥६१॥ दीक्षां प्राप्य जपेन्मत्रं तत्त्वलक्षं जितेंद्रियः । पुष्पैर्धानुतसहस्राणि जुहुयाद्ब्रह्मवृक्षजैः ॥६२॥ त्रिमध्वक्तैः प्रसूनैर्वा करवीरसमुद्भवैः । पद्मं वसुदलोपेतं नवयोन्यष्टकर्णिकम् ॥६३॥ इच्छाविशक्तिभिर्युक्तं भैरव्याः पीठमर्चयेत् । इच्छा ज्ञाना क्रिया पश्चात्कामिनी कामदायिनी ॥६४॥ रतिप्रिया मदानन्दा नवमी स्यान्मनोन्मनी । वरदाभयधारिण्यः संप्रोक्ता नव शक्तयः ॥६५॥


"भृगुः......" -यह इनका बीजमन्त्र है। छह दीर्घ वर्णों से युक्त आद्य बीजमन्त्र से अंगक्रिया करनी चाहिये ।।४७-५१३॥ तदनन्तर मंत्री तीनों लोक को मोहने वाले पंच बाणों का न्यास करे। द्रामाद्या द्रावणी का घिर में, द्रामाद्या क्षोभणी का चरण में, 'क्लीं' पूर्वंक वशीकरणी का मुख में, ब्लूं पूर्वक आकर्षणी का गुह्य में और सर्वान्तभृगु संस्थिता संमोहनी का हृदय में न्यास करना चाहिये । इसी का नाम बाणन्यास है। ललाट, भौं के मध्य, मुख, घंटिका, कंठ, हृदय, नाभि तथा अधिष्ठान में सुभगा आदि पांच ताराओं का तथा अन्य देवियों का न्यास करे। सुभगा, भगा, भगसर्पिणी, परा तथा भगमालिनी-ये पाँच तारायें हैं। पुनः मस्तक से नाभि पर्यन्त अनंगा, अनंगकुसुमा, अनंगमेखला और अनंग-मदना की पूजा करनी चाहिये । ये प्रधान देवता हैं, वर्ण तथा भूषण आदि से अलंकृत है, मद से इनकी गति मंथर हो गई है, इनके हाथों में रुद्राक्ष की माला, पुस्तक तथा अभयास्त्र सुशोभित है, करकमल वरदायक है। मुने ! तदुपदान्त निर्दिष्ट प्रकार से भूषण नामक न्यास को करना चाहिये ।।५२-५३।। इस प्रकार सम्पूर्ण शरीर में न्यास करके त्रिपुर भैरवी का ध्यान करे -देवी की कान्ति सहस्र सूर्यों के समान हैं। वह लाल रंग का रेशमी वस्त्र पहने हुई हैं, मस्तक पर माला सुशोभित है, स्तन शोणित से लिप्त है, हाथों में जपमाला, विद्या, अभीति, एवम् वरबल विद्यमान हैं और वदन तीन नेत्रों से सुशोभित है। जितेन्द्रिय व्यक्ति दीक्षा लेकर एक लाख मंत्र का जप करे और पलाश-पुष्पों से दस हजार हवन करे। अथवा त्रिमधुयुक्त करवीर के पुष्पों से होम करे। तदनन्तर अष्टदल कमल, नवयोनि, अष्ट कणिका एवम् इच्छा आदि शक्तियों से युक्त भैरवी-पीठ की अर्चना करनी चाहिये । इच्छा, ज्ञाना, क्रिया,