सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 819, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 819

६०० नारदीयपुराणम् सिंहव्याघ्रमहासर्पिन्भूतवेतालराक्षसान् । दर्शनादेव वशयेत्तिलकं धारयेन्नरः ॥९६॥ इत्येषा भैरवी प्रोक्ता ह्यवतारांतरं शृणु । वाङ्‌माया कमला तारो नमोते भगवत्यथ ॥१००॥ श्रीमातंगेश्वरि वदेत्सर्वजनमनोहरि । सर्वांदिसुखराज्यंते सर्वांदिसुखरंजनी ॥१०१॥ सर्वराजवशं पश्चात्करिसर्वपदं वदेत् । स्त्रीपुरुषवशं सृष्टिद्विद्याक्रोधिक्रोधितिकान्विता ॥१०२॥ सर्वं दुष्टमृगवशं करिसर्वपदं ततः । सर्वतत्त्ववशंकंरि सर्वलोकं ततः परम् ॥१०३॥ अमुकं मे वशं पश्चादानयानतसुन्दरी । अष्टाशीत्यक्षरो मन्त्रो श्रुत्याद्या भैरवीगताः ॥१०४॥ न्यासान्मंत्री तनौ कुर्याद्वक्ष्यमाणान्यथाक्रमम् । शिरोललाटभ्रू मध्ये तालुकण्ठगलोरसि ॥१०५॥ अनाहते भुजद्वंद्वे जठरे नाभिमण्डले । स्वाधिष्ठाने गुप्तदेशे पादयोर्दक्षवामयोः ॥१०६॥ मूलाधारे गुदे न्यस्येत्पदान्यष्टादश क्रमात् । गुणैकद्विचतुःषडिभवंसपर्वनवाष्टभिः ॥१०७॥ नंदपंक्त्यष्टवेदाग्निचन्द्रयुग्मगुणाक्षिभिः । यदुकॢप्तिरियं प्रोक्ता मंत्रवर्णैर्यथाक्रमम् ॥१०८॥ रत्याद्या मूलहृदयभ्रू मध्येषु विचक्षणः । वाक्शक्तिलक्ष्मीबीजाद्या मातंग्यंताः प्रविन्धसेत् ॥१०६॥ शिरोवदनहृद्गुह्यपादेषु विधिना न्यसेत् । हृल्लेखां गगनां रक्तां भूयो मन्त्री करालिकाम् ॥११०॥ महोच्छुष्माँ स्वनामादिवर्णबीजपुरःसराः । मातंग्यताः षडंगानि ततः कुर्वीत साधकः ॥१११॥ वर्णैश्चतुर्विंशतिभिर्हृत्त्रयोदशभिः शिरः । शिखाष्टादशभिः प्रोक्ता वर्म तावद्भि॒िरक्षरैः ॥११२॥ स्यात्त्रयोदशभिर्नेत्रं द्वाभ्यामस्त्रं प्रकीतितम् । बाणन्यास ततः कुर्याद्भैरवीप्रोक्तवर्त्मना ॥११३॥ मातंगोपदयोश्चान्यं मन्मथान्वदनांशयोः । पार्श्वकटनाभिदेशे कटिपार्श्वांशके पुनः ॥११४॥ बीजत्रयादिकान्मंत्री मन्मथं मकरध्वजम् । मदनं पुष्पधन्वानं पंचमं कुसुमायुधम् ॥११५॥


गोरोचन तथा कुंकुम, चार भाग चंदन और नव भाग अगर को हिमजल के साथ पीसकर भाल पर तिलक लगाने से राजा, मदगर्वित ललना, मदोन्मत्त गज, सिंह, बाघ, महासर्प, भूत, बेताल तथा राक्षस देखते ही वश में आ जाते हैं ॥९३-९९॥ इतना तो भैरवी के विषय में मैंने कहा, अब इनके अन्य अवतारों की भी बात सुन लो । "वाङ्‌माया" .... अनलसुन्दरी" - यह अठासी अक्षरों का भैरवी-मंत्र है । इसका साधक पहले वक्ष्यमाण प्रकार से शरीर में न्यास करे । शिर, ललाट, भ्रूमध्य, तालु, कंठ, ग्रीवा, वक्षःस्थल, हृदय, भुजद्वय, उदर, नाभिमंडल, शरीर, गुप्तदेश, दक्षिण और वाम पाद, मूलाधार तथा गुदा में क्रमशः अठारह पदों का न्यास करे । शरीर में ३१२४६८९८९१०८४३१२ मंत्र वर्णों का यथाक्रम न्यास करना चाहिये ? इसका नाम यदुकॢप्ति है । विद्वान व्यक्ति मूल, हृदय तथा भ्रूमध्य में रति, वाक्शक्ति, मातंगी एवम् लक्ष्मी बीज आदि का न्यास करे । ॥१००-१०६॥ शिर, मुख, हृदय, गुह्य तथा चरणों में अपने नाम के आदि अक्षर तथा बीजपूर्वक हृल्लेखा, गगना, रक्ता, करालिका और महोच्छुष्मा का पुनः सविधि न्यास करे । तदनन्तर साधक मातंगी आदि का छह अंगों में न्यास करे । चौबीस वर्षों से हृदय में, तेरह वर्णों से शिर पर, अठारह अक्षरों से शिखा पर और उतने ही वर्षों से त्वचा पर न्यास करना चाहिये । तेरह अक्षरों से नेत्रन्यास और दो अक्षरों से अस्त्रन्यास करना चाहिये । तत्पश्चात् भैरवी के बतलाये हुए मार्ग से बाणन्यास करे ॥११०-११३॥ मातंगी के दोनों चरणों में मन्मथों का और मुख, स्कंध, पार्श्व, नाभि और कटिपार्श्व में पुनः बीजत्रय का न्यास करे । मन्त्री मन्मथ, मकरध्वज, मदन, पुष्पधन्वा, कुसुमायुध, कन्दर्प, मनोभव, तथा रतिप्रिय इन नामों का स्थानविशेषों में