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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 825, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 825

८०६ नारदीयपुराणम् कदाचित्ललिता देवी पुंरूपा कृष्णविग्रहा । ससर्ज षोडशकलास्ताः सर्वास्तत्समप्रभाः ॥१६॥ तासां मन्त्रं तथा ध्यानं यन्त्राचादिकं तथा । वर्णये सर्वतन्त्रेषु रहस्यं मुनिसत्तम ॥१७॥ वातो मरुच्चाग्निवह्नी धराक्षे जलचारिणी । विमुखं चरशुचिविभू वनस्वशक्तयः स्वराः ॥१८॥ प्राणस्तेजः स्थिरा वायुरायुश्चापि प्रभा तथा । व्यकुमध्यं तथा नादो दावकः पाय इत्यय ॥१९॥ व्योमरयः शिखी गोत्रा तोयं शून्यजवी द्युतिः । भूमी रसो नभो व्याप्तं दाहषच्चापि रसांबु च ॥२०॥ वियत्स्पर्शश्च हृद्धंसहलाग्नासो हलास्त्रिकाः । चन्द्रावली च ललिता हंगेला नायके मते ॥२१॥ ग्रासस्थिता स्वयं राधा स्वयं शक्तिस्वरूपिणी । शेषास्तु षोडशकला द्वात्रिंशत्कलाः स्मृताः ॥२२॥ वाङ्मयं निखिलं व्याप्तमाभिरेव मुनीश्वर । ललिताप्रमुखानां तु षोडशीत्वमुपागता ॥२३॥ श्रीराधा सुन्दरी देवी तान्त्रिकैः परिकीर्त्यते । कुरुकुल्ला च वाराही चन्द्रालिललिते उभे ॥२४॥ संभूते मन्त्रवर्गं तेऽभिधास्येऽहं यथातथम् । हृत्प्राणेलाहंसदाहवह्विस्तैर्वल्ललितेरिता ॥२५॥ त्रिविधा हंसभेदेन शृणु तां च यथाक्रमम् । हंसाद्ययाऽञ्चा मध्या स्यादादिमध्यस्थहंसया ॥२६॥ तृतीया प्रकृतिः सैव तुर्या तैरंत्यमायया । आसु तुर्याभवन्मुक्त्यै तिस्रोऽन्याःस्युश्च संपदे ॥२७॥ इति त्रिपुरसुन्दर्या विद्या सम्यक्समीरिता । दाहम्भीरसाक्ष्मास्वैर्वशिनीबीजमीरितम् ॥२८॥ प्राणो रसाक्षियुतः कामेश्वर्यक्षरं महत् । शून्यमंबुरसावह्निख्वयोगान्मोहनीमनुः ॥२९॥ व्याप्तं रसाक्ष्मास्वयुतं विमलाबीजमीरितम् । ज्यानभोदाहवह्निख्वयोगैः स्यादरुणामनुः ॥३०॥ जपिन्यास्तु समुद्दिष्टः सर्वत्र जयदायकः । कं नभो दाहसहितं व्याप्तक्ष्मास्वयुतं मनुः ॥३१॥ सर्वेश्वर्याः समाख्यातः सर्वसिद्धिकरः परः । ग्रासो नभोदाहवह्निख्वैर्युक्तः कौलिनीमनुः ॥३२॥ एतैर्मनुभिरष्टाभिः शक्तिभिर्वर्गसंयुतैः । वाग्देवतांतैर्न्यासः स्याद्येन देव्यात्मको भवेत् ॥३३॥ रंध्रे भाले तथाज्ञायां गले हृदि तथा न्यसेत् । नामावाधारके पादद्वये मूलाग्रकावधि ॥३४॥ षड्दीर्घाढचेन बीजेन कुर्यात्तथैव षडंगकम् । लोहितां ललितां बाणचापपाशांकुशौः करैः ॥३५॥ एक समय ललिता देवी ने पुरुषरूप में कृष्ण के समान शरीर वाली सोलह कलाओं का सृजन किया । उन सबकी कान्ति एक जैसी थी। मुनिश्रेष्ठ ! अखिल तंत्रों में उन सब के मन्त्र, ध्यान, यंत्र तथा पूजनादि क्रम जैसे वर्णित हैं, वैसे मैं सुना देता हूँ। "वातो मरुत् ...... शक्तिस्वरूपिणी"- यह मंत्र है। उपर्युक्त सोलह कलाओं के अतिरिक्त अन्य भी सोलह कलायें हैं, जिन्हें मिला देने से बत्तीस कलायें होती हैं। मुनीश्वर ! निखिल वाङ्मय जगत् को इन देवियों ने ही व्याप्त कर रखा है। ललिता आदि देवियाँ षोडशी कहलाती हैं ॥१६-२३॥ तांत्रिक लोग श्री राधा को सुन्दरी देवी कहते हैं। कुरुकुल्ला, वाराही, चन्द्रालि और ललिता ये उनकी सखियाँ हैं। अब मैं मंत्रसमूह को यथार्थतः बता रहा हूँ। "हृत्प्राण......"- यह ललिता का "हंसाद्यया......"- यह त्रिपुर सुन्दरी का मंत्र । "दाह......"- यह वशिनी का मंत्र है। "प्राणो" .. यह कामेश्वरी का मंत्र है। शून्यम् ......"-यह मोहनी का मंत्र है। "व्याप्तम् ....."-यह यह विमला का मंत्र है। "ज्यान....."-यह अरुणा का मन्त्र है। "ग्रासो......"-यह कौलिनी का मन्त्र है। वाग्देवता तथा अष्ट शक्तियों के साथ इन मन्त्रों का न्यास करने से देवी को आत्मोयता प्राप्त होती है । ॥२४-३३॥ ब्रह्मरंध्र, ललाट, कंठ, हृदय, नाभि, मूलाधार, चरणद्वय, और मूलाग्र में न्यास करना चाहिये । छह दीर्घ मात्राओं से युक्त बीजमन्त्र से षडंग न्यास करना चाहिये । अनन्तर हाथों में बाण, धनुष, पाश तथा