बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 824, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टाशीतितमोऽध्यायः ८०५ सर्वाद्याया जगन्मातुः श्रीराधायाः समर्चनम् । अवतारकलानां हि पप्रच्छ विनयान्वितः ॥१॥ नारद उवाच धन्योऽस्मि कृतकृत्योऽस्मि जातोऽहं त्वत्प्रसादतः । यज्जगन्मातृमन्त्राणां वैभवं श्रुतवान्मुने ॥२॥ यथा लक्ष्मीमुखानां तु अवताराः प्रकीर्तिताः । तथा राधावताराणां श्रोतुमिच्छामि वैभवम् ॥३॥ यत्संख्याकाश्च यद्रूपा यत्प्रभावा विदांवर । राधावतारास्तान्सत्यं कीर्तयाशेषसिद्धिदान् ॥४॥ एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य नारदस्य विधेः सुतः । सनत्कुमारः प्रोवाच ध्यात्वा राधापदाम्बुजम् ॥६॥ सनत्कुमार उवाच शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि रहस्यातिर रहस्यकम् । राधावतारचरितं भजतामिष्टसिद्धिदम् ॥७॥ चन्द्रावली च ललिता द्वे सख्यौ सुप्रिये सदा । मालावतीमुखाष्टानां चन्द्रावल्याधिया स्मृता ॥८॥ कलावतीमुखाष्टानामीश्वरी ललिता मता । राधाचरणपूजायामुक्ता मालावतीमुखाः ॥६॥ ललिताधीशवरीणां तु नामानि शृणु साम्प्रतम् । कलावती मधुमती विशाखा श्यामलासिधा ॥१०॥ शैव्या वृन्दा श्रीधराख्या सर्वास्तत्तुल्यविग्रहाः । सुशीलाप्रमुखाश्चान्याः सख्यो द्वात्रिंशदीरिताः ॥११॥ ताः शृणुष्व महाभाग नामतः प्रवदामि ते । सुशीला शशिलेखा च यमुना माधवी रतिः ॥१२॥ कदम्बमाला कुन्ती च जाह्नवी च स्वयं प्रभा । चन्द्रानना पद्ममुखी सावित्री च सुधामुषी ॥१३॥ शुभा पद्मा पारिजाता गौरिणी सर्वमंगला । कालिका कमला दुर्गा विरजा भारती सुरा ॥१४॥ गंगा मधुमती चैव सुन्दरी चन्दना सती । अपर्णा मनसानन्दा द्वात्रिंशद्राधिकाप्रियाः ॥१५॥ सुनकर देवतुल्य नारद ने सब की आदि और जगत् की माता श्री राधा को आराधना तथा उनकी अवतार- कलाओं के विषय में विनयपूर्वक प्रश्न किया ॥१-२॥ नारद बोले-- 'मुने ! मैं आपकी कृपा से धन्य एवं कृतकृत्य हुआ तथा जगन्माता के मन्त्रों का वैभव सुन चुका । अब जैसे लक्ष्मी आदि के अवतारों का वर्णन सुनाया है उसी तरह राधा के अवतारों का भी वर्णन सुना दीजिए । वेत्ताओं में श्रेष्ठ ! सकल सिद्धिदायक राधावतारों की जितनी संख्या है, जैसा रूप है और जैसा प्रभाव है, वह सब ठीक ठीक बता दीजिये ॥३-५॥' ब्रह्मपुत्र नारद की यह बात सुनकर सनत्कुमार राधा के चरणारविन्द का ध्यान करके कहने लगे ॥६॥ सनत्कुमार बोले-विप्र ! सुनो, मैं राधावतार का वर्णन करता हूँ, जो अत्यन्त रहस्यपूर्ण तथा उपासकों के लिये सिद्धिदायक है । श्रीराधा की चन्द्रावली तथा ललिता नामक दो अत्यन्त प्रिय सखियां है । जिनमें चन्द्रा- वली मालावती आदि आठ सखियों की अधीश्वरी है और ललिता कलावती आदि आठ सखियों की स्वामिनी हैं । राधाचरण की पूजा के प्रकरण में मालावती आदि के नाम तो बता ही दिये हैं अब कलावती आदि के नामों को सुनो । कलावती, मधुमती, विशाखा, श्यामला, अभिध; शैव्या, वृन्दा और श्रीधरा इन सब के शरीर राधा के ही समान हैं । इनके अतिरिक्त सुशीला आदि अन्य बत्तीस सखियां भी हैं ॥७-११॥ महाभाग ! उन. सब का नाम मैं तुमसे बताता हूँ, सुनो, सुशीला, शशिलेखा, यमुना, माधवी, रति, कदम्बमाला, कुन्ती, जाह्नवी, स्वयंप्रभा, चन्द्रानना, पद्ममुखी, सावित्री, सुधामुषी, शुभा, पद्मा पारिजाता, गौरिणी, सर्वमंगला, कालिका, कमला, दुर्गा, विरजा, भारती, सुरा, गंगा, मधुमती, सुन्दरी, चन्दना, सती, अपर्णा, मनसा और आनन्दा— ये बत्तीसों राधिका की सहेलियां हैं ॥१२-१५॥