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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 823, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 823

८०४ नारदीयपुराणम् सोष्णीषकंचुको विद्वान्कृष्णे भूते दिवानिशम् । उपवासी श्मशाने वा विविने शून्यमंदिरे ॥१६२॥ मंत्रस्य सिद्धये यतवाग्ध्यायेद्देवी निरंतरम् । सहस्रादूर्ध्वतः शत्रुर्ज्वरेण परिगृह्यते ॥१६३॥ पंचगव्येन शांतिः स्याज्ज्वरस्य पयसापि वा । मंत्राद्याक्षरमालिख्य शत्रूनाम ततः परम् ॥१६४॥ द्वितीयं मनुवर्णं च शत्रुनामैवमालिखेत् । सर्वं मनुदिक्सहस्रजपाच्छत्रोर्मृतिर्भवेत् ॥१६५॥ दग्ध्वा क्रौंच श्मशानाग्नौ तद्भस्मादाय मन्त्रवित् । विरोधिनाम्नाऽष्टशतं जपेदुच्चाटनं रिपोः ॥१६६॥ श्मशानभस्मना कृत्वा शवं तस्योपरि न्यसेत् । विरोधिनामसंशुद्धं कृष्णे पक्षे समुच्चरेत् ॥१६७॥ महिषीक्षीरधूपं च दद्याच्छत्रुविपत्करम् । एवं संक्षेपतः प्रोक्तं अवतारचतुष्टयम् ॥१६८॥ दुर्गाया जगदंबायाः किं पुनः प्रष्टुमिच्छसि ॥१६८॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे दुर्गामन्त्रचतुष्टयवर्णनं नाम सप्ताशीतितमोऽध्यायः

अष्टाशीतितमोऽध्यायः

सूत उवाच श्रुत्वेत्थं यजनं विप्रा मन्त्रध्यानपुरःसरम् । सर्वांसामवताराणां नारदो देवदर्शनः ॥१॥

को पगडी तथा कंचुक (कुर्ता) धारण कर दिन रात जप करते रहे । जप श्मशान या वन या शून्य मन्दिर में उपवास पूर्वक करना चाहिये ॥१५७-१६२॥ मंत्र सिद्धि के लिये वाक्संयम तथा देवी का निरंतर ध्यान आवश्यक है ! एक हजार से ऊपर जप करते ही शत्रु को दाहपीड़ा होने लगती है, उस दाह की शान्ति पंचगव्य या दूध से की जा सकती है । मन्त्र के आद्य तथा द्वितीय अक्षर को लिखकर पश्चात् शत्रु का नाम लिखना चाहिये । अनन्तर चौबीस हजार मंत्र जप करने से शत्रु की मृत्यु हो जाती है । क्रौंचपक्षी को श्मशान की अग्नि में जलाकर उसके भस्म के ऊपर एक सौ आठ बार विरोधी का नाम जप देने से उसका उच्चाटन हो जाता है । कृष्ण पक्ष में श्मशान के भस्म के ऊपर शव को रखकर शत्रु का नाम उच्चारण करे और भैंस का दूध तथा धूप चढाये ऐसा करने से शत्रु विपत्ति में पड़ जाता है। इस तरह संक्षेप में मैंने जगदम्बा दुर्गा के चारों अव- तारों का वर्णन कर दिया । अब क्या पूछना चाहते हो ? ॥१६३-१६८॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में दुर्गामन्त्रचतुष्टयवर्णन नामक सतासीवां अध्याय समाप्त ।।८७।।

अध्याय ८८ राधावतार—सोलह देवताओं के मंत्र, यंत्र तथा पूजन की विधि सूत बोले—विप्रवृन्द ! इस प्रकार देवियों के समस्त अवतारों के पूजन, मन्त्र तथा ध्यान का वर्णन