बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्ताशीतितमोऽध्यायः ८०३
राजपुत्रस्य राज्याप्तिः पंकजैः श्रियमाप्नुयात् । उत्पलैर्वशयेद्विश्वं क्षारेर्मध्वाश्रितैः स्त्रियम् ॥१४७॥ वंजुलस्य समिद्धोमा वृष्टिं वितनुतेऽचिरात् । क्षीराक्तैरमृताखंडैर्होमान्नाशयति ज्वरम् ॥१४८॥ दूर्वाभिरायुराप्नोति तन्दुलैर्धनवान् भवेत् । कदंबैवश्यमाप्नोति सर्वं त्रिमधुरुप्लुतम् ॥१४८॥ नंद्यावर्तशवैः पुष्पैर्होमो वाक्सिद्धिदायकः । निबप्रसूनैर्जुहुयादीप्सितश्रोसमुद्द्ये ॥१५०॥ पलाशकुसुमैर्होमात्तेजस्वी जायते नरः । चन्दनागुरुकस्तूरीचन्द्रकुंकुमरोचनाः ॥१५१॥ वश्याय च प्रियत्वाय हुताश्च तिलकीकृताः । निर्गुण्डीमूलहोमेन निगड़ान्मुच्यते नरः ॥१५२॥ निंबतैलांस्तितैलैर्णिर्होमः शत्रुविनाशनः । हरिद्राचूर्णसंमिश्रैर्लवणैः स्तंभयेज्जगत् ॥१५३॥ मातंगीसिद्धिविद्यैषा प्रोक्ता ते द्विजसत्तम । अवतारांतरं भूयो वर्णयामि निशामय ॥१५४॥ दीपिकामीतिचन्द्राढ्या द्विधा चेद्रज्जितापुनः । वतिवह्निप्रियामंत्रो धूमावत्या गजाक्षरः ॥१५५॥ पिप्पलादो मुनिश्चंक्षो निवृतूधूमावतीश्वरी । बीजेन षड्दीर्घजातियुक्तेन परिकल्पयेत् ॥१५६॥ ततो धूमावती ध्यायेच्छत्रुनिग्रहकारिणीम् । विवर्णा चंचलां दुष्टां दीर्घां च मलिनांबराम् ॥१५७॥ विमुक्तकुंतजां सूक्ष्मां विधवां विरलद्विजाम् । ककध्वजरथारूढां प्रलंबितपयोधराम् ॥१५८॥ सूर्यहस्तां निरुक्षांक्षधृतहस्तांवरात्विताम् । प्रवृद्धलोमां तु भृशं कुटिलाकुटिलेक्षणाम् ॥१५८॥ क्षुत्पिपासादितां नित्यं भयदां कलहप्रियाम् । एवंविधां तु संचित्य नमः स्वाहा फडंतकम् ॥१६०॥ बीजं साध्योपरि न्यस्य तस्मिन्स्थाप्य शवं जपेत् । अवष्टभ्य शवं शत्रुतामनाथ प्रजपेन्मनुम् ॥१६१॥
वाला शीघ्र वर्षा करा देता है। दुग्ध युक्त गुडूच के खंड से होम करने वाला ज्वर को दूर कर देता है। दूर्वा से हवन करने से आयु की प्राप्ति होती है। तन्दुल से हवन करने वाला व्यक्ति धनवान् होता है। ॥१४५-१४८॥ त्रिमधुयुक्त कदम्ब से होम करने वाला सबको वशीभूत करता है। तगर के पुष्पों से होम करने से वाणी सिद्ध होती है। निंब के पुष्पों से हवन करने से वांछित धन मिलता है। पलाश के कुसुमों से होम करने से मनुष्य तेजस्वी होता है। चन्दन, अगर, कस्तूरी, कपूर, कुंकुम तथा गोरोचन से हवन करके तिलक लगाने से अखिल प्राणी वशीभूत होते हैं। निर्गुण्डी के मूल से होम करने से बन्धन से मुक्ति मिलती है। निब, तेल तथा लवण से होम करने से शत्रु का नाश होता है ॥१४९-१५२॥ हल्दी के चूर्ण में मिलाये लवण से होम करने से साधक संसार का स्तंभन कर सकता है। द्विजश्रेष्ठ ! सिद्ध विद्या मातंगी के बारे में मैंने इतना कहा है। अब मैं उनके अन्य अवतार का वर्णन करता हूँ, सुनो ! "दीपिका..." -यह उनका मंत्र है। इस मंत्र के ऋषि पिप्पलाद हैं, छंद निवृत् है और देवता धूमावती हैं। इसको छह दीर्घजातियुक्त बीज मन्त्र से परि- कल्पित करे। ॥१५३-१५६॥ तदनन्तर इस प्रकार धूमावतों का ध्यान करे कि ये शत्रु को विपत्ति में फंसाती हैं, इनका वर्ण विकृत है, ये चंचला, दुष्टा, लम्बी, मलिनवस्त्रा, सूक्ष्मा तथा विधवा हैं, इनके बाल बिखरे हुए हैं। दाँत विरले ही हैं, इनके रथ पर क्रौंच (करांकुल) पक्षी की पताका है, पयोधर लटके हुए हैं, सूर्य (पं?), ऋषभ ओषधि तथ अड़हुल के फूल को हाथों में धारण किये हुई हैं, रोएं सघन एवम् बड़े-बड़े हैं, नेत्र सीधे एवम् टेढ़े भी हैं, इनको नित्य भूख प्यास लगी रहती है। ये भय देने वालो तथा झगड़ालू हैं। इस प्रकार ध्यान करके "नमः स्वाहा...." इस बीज मंत्र को साध्य वस्तु के ऊपर न्यस्त करे। फिर वहाँ शव की स्थापना करके जप करे। शव के ऊपर शत्रु का नाम लिखकर मंत्र को जपना चाहिये। विद्वान् व्यक्ति कृष्ण पक्ष का चतुर्दशी