भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 1008 में से

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दशमोऽध्यायः नारद उवाच विष्णुपादाग्रसंभूता या गङ्गेत्यभिधीयते । तदुत्पत्तिं वद भ्रातरनुग्राह्योऽस्मि ते यदि ॥१॥ सनक उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि गङ्गोत्पत्तिं तवानघ । वदतां शृण्वतां चैव पुण्यदां पापनाशनीम् ॥२॥ आसीदिन्द्रादिदेवानां जनकः कश्यपो मुनिः । दक्षात्मजे तस्य भार्ये दितिश्चादितिरेव च ॥३॥ अदितिर्देवमातास्ति दैत्यानां जननी दितिः । ते तयोरात्मजा विप्र परस्परजयैषिणः ॥४॥ सदा सपूर्वदेवास्तु यतो दैत्याः प्रकीर्तिताः । आदिदैत्यो दितेः पुत्रो हिरण्यकशिपुर्बली ॥५॥ प्रह्लादस्तस्य पुत्रोऽभूत्सुमहान्दैत्यसत्तमः । विरोचनस्तस्य सुतो बभूव द्विजभक्तिमान् ॥६॥ तस्य पुत्रोऽतितेजस्वी बलिरासीत्प्रतापवान् । स एव वाहिनीपालो दैत्यानामभवन्मुनेः ॥७॥ बलेन महता युक्तो बुभुजे मेदिनीमिमाम् । विजित्य वसुधां सर्वां स्वर्गं जेतुं मनो दधे ॥८॥ गजाश्च यस्यायुतकोटिलाक्षास्तावन्त एवाश्वरथा मुनीन्द्र । गजे गजे पंचशती पदातेः किं वर्ण्यते तस्य चमूर्वरिष्ठा ॥९॥ अध्याय १० राजा बलि से देवताओं की पराजय नारद बोले—भाई ! यदि आप का मेरे ऊपर अनुग्रह है तो कृपा कर विष्णु के चरणों के निकली हुई गंगा नदी की उत्पत्ति कथा कहिए ॥१॥ सनक बोले—निष्पाप ! सुनो । आज तुमसे श्रोता और वक्ता दोनों के पापों को नष्ट करने वाली गंगा की उत्पत्ति कथा कह रहा हूँ । इन्द्र आदि देवताओं को उत्पन्न करने वाले कश्यप नामक एक मुनि थे, उनकी दक्षपुत्री दिति और अदिति नाम की दो भार्याएँ थीं । अदिति देवों की माता और दिति दैत्यों की जननी थी । विप्र ! उनके ये पुत्र परस्पर सर्वदा एक दूसरे को जीतना चाहते थे क्योंकि दैत्य सर्वदा से देवों के अग्रज कहे गए हैं । दिति पुत्र बली हिरण्यकशिपु आदि दैत्य था । उसका दैत्य-प्रवर महातेजस्वी प्रह्लाद नामक पुत्र हुआ । प्रह्लाद का विरोचन नामक परम ब्राह्मण-भक्त पुत्र हुआ । उसका भी महाबलवान्, तेजस्वी बलि नामक पुत्र हुआ, जो स्वयं दैत्य-वाहिनी का एक मात्र पालक और रक्षक था ॥२-७॥ उसने अपने सैन्य बल से इस मेदिनी को वश में किया और पृथ्वी को जीत लेने के बाद स्वर्ग-विजय की भी कामना करने लगा । मुनीन्द्र ! जिसकी सेना में दश सहस्र करोड़ लड़ाकू हाथी उतने ही अश्व और रथ, एवं प्रत्येक हाथी के पीछे पचास पैदल सिपाही थें तब उसकी विशाल वाहिनी का क्या वर्णन किया जाय । उसके मंत्रि-समूह में अग्रगण्य दो मंत्री थे, जिनमें एक का नाम ६—नार०

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