भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 83

६४ नारदीयपुराणम् इतीरितं समाकर्ण्य भारत्या नृपसत्तमः । मनसा निर्वृतिं प्राप्य सस्मार च गुरोर्वचः ॥१३९॥ स्तुवन्गुरुं च तं विप्रं हरिं चैवातिहर्षितः । पूर्ववृत्तं च विप्राय सर्वं तस्मै न्यवेदयत् ॥१४०॥ ततो नृपस्तु कालिङ्गं प्रणम्य विधिवन्मुने । नामानि व्याहरन्विष्णोः सद्यो वाराणसीं ययौ ॥१४१॥ षण्मासं तत्र गङ्गायां स्नात्वा दृष्ट्वा सदाशिवम् । ब्राह्मणीदत्तशापात्तु मुक्तो मित्रसहोऽभवत् ॥१४२॥ ततस्तु स्वपुरीं प्राप्तो वसिष्ठेन महात्मना । अभिषिक्तो मुनिश्रेष्ठ स्वकं राज्यमपालयत् ॥१४३॥ पालयित्वा महीं कृत्स्नां भुक्त्वा भोगान्स्त्रियं विना । वसिष्ठात्प्राप्य सन्तानं गतो मोक्षं नृपोत्तमः ॥१४४॥ नैतच्चित्रं द्विजश्रेष्ठ विष्णोर्वाराणसीगुणान् । गृणञ्छृण्वन्स्मरन्गङ्गां पीत्वा मुक्तो भवेन्नरः ॥१४५॥ तस्मान्महिम्नो विप्रेन्द्र गङ्गायाः शक्यते नहि । पारं गन्तुं सुराधीशैर्ब्रह्मविष्णुशिवैरपि ॥१४६॥ यन्नामस्मरणादेव महापातककोटिभिः । विमुक्तो ब्रह्मसदनं नरो याति न संशयः ॥१४७॥ गङ्गा गङ्गेति यन्नाम सकृदप्युच्यते यदा । तदैव पापान्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते ॥१४८॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे गङ्गामाहात्म्ये नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥


बातों को सुनकर नृप को कुछ मन में संतोष हुआ और गुरु के कथन का स्मरण किया । बड़ी प्रसन्नता से अपने गुरु की, उस ब्राह्मण की और भगवान् की स्तुति करने लगा और उस विप्र से अपने जीवन की पूर्वकालीन सारी घटना कह सुनाई ॥१३७-१४०॥ मुनिश्रेष्ठ ! स्तुति के बाद राजा ने विधि पूर्वक उस कलिङ्ग देश वासी ब्राह्मण को प्रणाम किया और हरिनाम का उच्चारण करता हुआ शीघ्र वाराणसी चला गया । वहाँ छह महीने तक गंगा स्नान और सदाशिव का दर्शन कर वह मित्रसह राजा ब्राह्मणी के शाप से मुक्त हुआ । इस प्रकार पाप-मुक्त होकर वह अपनी राजधानी में गया और महात्मा वशिष्ठ से पुनः अभिषिक्त होकर अपने राज्य का पालन करने लगा । ॥१४१-१४३॥ उस नृपवर्य ने सम्पूर्ण पृथ्वी का पालन और भोगों का भोग किया परन्तु शाप-भय से स्त्री-भोग से अपने को बचाये रहा । वसिष्ठ द्वारा क्षेत्रज पुत्रों को उत्पन्न करा कर अन्त में वह मोक्ष का भी अधिकारी हुआ । द्विजश्रेष्ठ ! इसमें आश्चर्य करने की आवश्यकता नहीं, मनुष्य भगवान् विष्णु और गंगा की महिमा का वर्णन और श्रवणकर एवं गंगाजल का पान कर अवश्य मुक्त हो जाता है । विप्रेन्द्र ! इसलिए गंगा की महिमा के वर्णन करने में देवेन्द्र ब्रह्मा, विष्णु और शंकर भी सफल नहीं हो सकते हैं। गंगा के नाम स्मरण मात्र से मनुष्य अपने करोड़ों पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को चला जाता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । जो एक बार भी 'गंगा, गंगा, ऐसा उच्चारण करता है वह तत्काल पाप मुक्त होकर ब्रह्मलोक में पूजित होता है ॥१४४-१४८॥ श्री नारदीय पुराण में गंगा-महात्म्य-वर्णन नामक नवां अध्याय समाप्त ॥६॥

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