भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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६३ नवमोऽध्यायः पृथिव्यां यानि तीर्थानि पवित्राणि द्विजोत्तम । तानि सर्वाणि गङ्गायाः कणस्यापि समानि न ॥१२४॥ तुलसीदलसंमिश्रमपि सर्षपमात्रकम् । गङ्गाजलं पुनात्येव कुलानामेकविंशतिम् ॥१२५॥ तस्माद्विप्र महाभाग सर्वशास्त्रार्थकोविद । गङ्गाजलप्रदानेन पाह्मास्मान्पापकर्मिणः ॥१२६॥ इत्याख्यातं राक्षसैस्तैर्गङ्गामाहात्म्यमुत्तमम् । निशम्य विस्मयाविष्टो बभूव द्विजसत्तमः ॥१२७॥ एषामपीदृशी भक्तिर्गङ्गायां लोकमातरि । किमु ज्ञानप्रभावाणां महतां पुण्यशालिनाम् ॥१२८॥ अथासौ मनसा धर्मं विनिश्चित्य द्विजोत्तमः । सर्वभूतहितो भक्तः प्राप्नोतीति परं पदम् ॥१२९॥ ततो विप्रः कृपाविष्टो गङ्गाजलमनुत्तमम् । तुलसीदलसंमिश्रं तेषु रक्षःस्वसेचयत् ॥१३०॥ राक्षसास्तेन सिक्तास्तु सर्षपोपमर्बिदुना । विसृज्य राक्षसं भावमभवन्देवतोपमाः ॥१३१॥ ब्राह्मणी पुत्रसंयुक्ता सोमदत्तस्तथैव च । कोटिसूर्यप्रतीकाशा बभूवुर्विबुधर्षभाः ॥१३२॥ शंखचक्रगदाचिह्ना हरिसारूप्यमागताः । स्तुवन्तो ब्राह्मणं सम्यक्ते जग्मुर्हरिमन्दिरम् ॥१३३॥ राजा कल्मषपादस्तु निजरूपं समास्थितः । जगाम महतीं चिन्तां दृष्ट्वा तान्मुक्तिगानधान् ॥१३४॥ तस्मिन् राज्ञि सुदुःखार्त गूढरूपा सरस्वती । धर्ममूलं महावाक्यं बभाषेऽगाधया गिरा ॥१३५॥ भो भो राजन्महाभाग न दुःखं गन्तुमर्हसि । राजंस्तवापि भोगान्ते महच्छ्रेयो भविष्यति ॥१३६॥ सत्कर्मधूतपापा ये हरिभक्तिपरायणाः । प्रयान्ति नात्र सन्देहस्तद्विष्णोः परमं पदम् ॥१३७॥ सर्वभूतदयायुक्ता धर्ममार्गप्रवर्तिनः । प्रयान्ति परमं स्थानं गुरुपूजापरायणाः ॥१३८॥ दूसरों का उद्धार कर सकते हैं ? अहो ! महान् व्यक्तियों का चरित्र उसी प्रकार सब लोगों के लिए सुख दायक होता है जिस प्रकार चन्द्रमा का उदय सब प्राणियों के लिए आनन्ददायक होता है। द्विजवर्य ! इस भूतल के जितने पवित्र तीर्थ हैं वे सभी गंगाजल के क्षुद्र अंश की भी समानता नहीं कर सकते ॥११६-१२४॥ तुलसी दल से मिला गंगाजल का एक सरसों के बराबर बिन्दु भी इक्कीस कुल परम्परा का उद्धार करता है । इसलिए हे सब शास्त्रों के तत्त्वज्ञ ! महाभाग विप्र ! गंगाजल को देकर हम पापियों का उद्धार करो । इस प्रकार उन राक्षसों ने गंगा का उत्तम माहात्म्य कह कर सुनाया ॥१२५-१२७॥ इस बातों को सुनकर वह द्विज आश्चर्य चकित हो गया कि जब इन पाप परायण जनों की भी लोक-माता गंगा में यह श्रद्धा है तब तो ज्ञानी महात्माओं के विषय में क्या कहा जाय ? द्विजोत्तम ! इसके अनन्तर उस भद्र पुरुष ने विचार पूर्वक अपना कर्त्तव्य निश्चित किया कि सब प्राणियों की हित कामना में रत रहने वाला भक्त अवश्यमेव परम पद को प्राप्त करता है । तदन्तर उस विप्र ने कृपा करके तुलसीदल मिश्रित गंगा जल उन राक्षसों पर छिड़का । केवल सरसों के बराबर गंगाजल-विन्दु के अभिषेक मात्र से वे सब राक्षस शरीर को छोड़कर देवता के समान हो गए । ।१२८-१३१॥ पुत्र के सहित वह ब्राह्मणी और सोमदत्त कोटि सूर्य के समान तेजोमय शरीर वाले देवता हो गए ओर शंख, चक्र, गदा धारी हरि के समान रूप पा गए। वे उस ब्राह्मण की भलीभांति स्तुति करने के बाद भगवान् के मन्दिर में गए। राजा कल्माषपाद अभी अपने को राक्षस रूप में ही पाकर और उन पापी सहयोगियों को मुक्त देखकर घोर चिन्ता करने लगा । राजा को इस प्रकार चिन्तातुरदे खकर सरस्वती ने अप्रत्यक्ष रूप से गम्भीर स्वर में धर्म-सम्मत बातें कहीं । हे राजन् ! महाभाग ! दुःखी होने की आवश्यकता नहीं, राजन् तुम भी कर्म-भोग के अनन्तर महान् श्रेय प्राप्त करोगे ॥१३२-१३६॥ जिन्होंने सत्कर्मों के द्वारा अपने पापों को विनष्ट कर दिया है और हरि पूजा में जो सर्वथा लीन हैं वे अवश्यमेव परम पद को प्राप्त करते हैं । निखिल प्राणिसमूह पर दया करने वाले धर्म की प्रतिष्ठा करने वाले और गुरुपूजा में निरत रहने वाले परम स्थान को प्राप्त करते हैं । सरस्वती की इन