भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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६२ नारदीयपुराणम् तस्यैवाशु प्रणश्यन्ति धीविद्यार्थात्मजैक्रियाः । शुश्रूषां कुरुते यस्तु गुरूणां सादरं नरः ॥१०८॥ तस्य संपद्भवेद्भूष इति प्राहुर्विपश्चितः । तेन शापेन दग्धोऽहमन्तश्चैव क्षुधाग्निना ॥११०॥ मोक्षं कदा प्रयस्यामि न जाने नृपसत्तम । एवं वदति विप्रेन्द्र वटस्थेऽस्मिन्निशाचरे ॥१११॥ धर्मशास्त्रप्रसंगेन तयोः पापं क्षयं गतम् । एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तः कश्चिद्विप Generic्रोऽतिधार्मिकः ॥११२॥ कलिङ्गदेशसंसूतो नाम्ना गर्ग इति स्मृतः । वहन्गङ्गाजलं स्कंधे स्तुवन् विश्वेश्वरं प्रभुम् ॥११३॥ गायन्नामानि तस्यैव मुदा हृष्टतनूरुहः । तमागतं मुनिं दृष्ट्वा पिशाचीराक्षसौ च तौ ॥११४॥ प्राप्ता नः पारणेत्युक्त्वा प्राद्रवन्नूर्ध्वबाहवः । तेन कीर्तितनामानि श्रुत्वा दूरे व्यवस्थिताः । अशक्तास्तं धर्षयितुमिदमूचुश्च राक्षसाः ॥११५॥ अहो विप्र महाभाग नमस्तुभ्यं महात्मने । नामकीर्तनमाहात्म्याद्राक्षसा दूरगा वयम् ॥११६॥ अस्माभिर्भक्षिताः पूर्वं विप्राः कोटिसहस्रशः । नामप्रावरणं विप्र रक्षति त्वां महाभयात् ॥११७॥ नामश्रवणमात्रेण राक्षसा अपि भो वयम् । परां शान्ति समापन्ना महिम्ना ह्यच्युतस्य वै ॥११८॥ सर्वथा त्वं महाभाग रागादिरहितो ह्यसि । गंगाजिलाभिषेकेन पाह्मास्मान्महापातकोच्चयात् ॥११९॥ हरिसेवापरो भूत्वा यश्चात्मानं तु तारयेत् । स तारयेज्जगत्सर्वमिति शंसन्ति सूरयः ॥१२०॥ अपहाय हरेर्नाम घोरसंसारभेषजम् । केनोपायेन लभ्येत मुक्तिः सर्वत्र दुर्लभा ॥१२१॥ लोहोडुपेन प्रतरन्निमज्जत्युदके यथा । तथैवाकृतपुण्यास्तु तारयन्ति कथं परान् ॥१२२॥ अहो चरित्रं महतां सर्वलोकसुखावहम् । यथा हि सर्वलोकानामानन्दाय कलानिधिः ॥१२३॥ नष्ट हो जाती हैं। जो मनुष्य आदर पूर्वक गुरु की शुश्रूषा करता है, भूपाल ! उसको अवश्य सम्पत्ति मिलती है और वह सुखी रहता है, ऐसा विद्वान् कहते हैं। उस शाप से ही मैं नष्ट हो गया और इस प्रकार भूख की ज्वाला से सदा जलता रहता हूँ ॥१०६-११०॥ नृपसत्तम ! कब इस योनि से छुटकारा मिलेगा, मैं नहीं जानता। विप्रेन्द्र ! इस प्रकार वट पर रहने वाले निशाचर से वार्तालाप करने पर धर्मशास्त्र की चर्चा के प्रभाव से उन दोनों के पाप क्षीण हो गए। इसी बीच कलिङ्ग देश का रहने वाला गर्ग नामक अति धार्मिक ब्राह्मण वहाँ आया जो कन्धे पर गंगाजल लिए हुए था और विश्वेश्वर प्रभु की स्तुति कर रहा था । भगवान् के नामों का उच्चारण करता हुआ वह भक्त आनन्दा- तिरेक से पुलकित हो जाता था । उस मुनि को अपनी ओर आते देखकर वे दोनों पिशाची और राक्षस 'आज हम लोगों को भोजन मिल गया, यह कह कर हाथ ऊपर उठाए हुए उस मुनि की ओर दौड़े परन्तु उसके नामो- च्चारण को सुनकर दूर ही ठिठक गए। उस मुनि पर आक्रमण करने में अपने को असमर्थ पाकर उन दोनों राक्षसों ने कहा ॥१११-११५॥ हे महाभाग विप्र ! आप महात्मा को नमस्कार है, आपके नाम संकीर्तन के प्रभाव से हम दोनों राक्षस दूरस्थ ही हैं। पहले हम लोगों ने हजारों करोड़ों ब्राह्मणों को अपना आहार बना डाला परन्तु आज तुमको भगवन्नामोच्चारण रूपी कवच महाभय (मृत्यु) से बचा रहा है। नाम श्रवण मात्र से राक्षस होते हुए भी हम दोनों भगवान् अच्युत की महिमा से परम शान्ति का अनुभव कर रहे हैं ॥११६-११८॥ महाभाग ! तुम तो सर्वथा रागादि दोषों से शून्य हो, अतः गंगाजल के अभिषेक से हमें इस महापाप से बचाओ। जो हरिसेवा में निरत रह कर आत्मोद्धार करता है वह सारे संसार का उद्धार कर सकता है, ऐसा मनीषीजन कहते हैं। हरिनाम को छोड़ कर इस कराल माया से मुक्ति दिलाने वाली कोई दूसरी ओषधि नहीं है। इसको छोड़ कर किसी दूसरे उपाय से नहीं प्राप्त की जा सकती है। वह तो सर्वथा और सर्वदा परम दुर्लभ है। जिस प्रकार लोहे की बनी नौका के सहारे तैरने का साहस करने वाला बीच में डूब जाता है। उसी प्रकार अकृतपुण्य (पापी) कैसे