बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 80, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः ६१ तथापि शृणु वक्ष्यामि शास्त्राणां सारनिश्चयम् । अध्यापकश्च वेदानां मन्त्रव्याख्याकृतस्तथा ॥६३॥ पिता च धर्मवक्ता च विशेषगुरवः स्मृताः । एतेषामपि भूपाल शृणुष्व प्रवरं गुरुम् ॥६४॥ सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञैर्भाषितं प्रवदामि ते । यः पुराणानि वदति धर्मयुक्तानि पण्डितः ॥६५॥ संसारपाशविच्छेदकरणानि स उत्तमः । देवपूजार्हकर्माणि देवतापूजने फलम् ॥६६॥ जायते च पुराणेभ्यस्तस्मात्तानीह देवताः । सर्ववेदार्थसाराणि पुराणानीति भूपते ॥६७॥ वदन्ति मुनयश्चैव तद्वक्ता परमो गुरुः । यः संसारार्णवं तर्तुमुद्योगं कुरुते नरः ॥६८॥ शृणुयात्स पुराणानि इति शास्त्रविभागकृत् । प्रोक्तान्सर्वधर्मांश्च पुराणेषु महीपते ॥६९॥ तर्कस्तु वादहेतुः स्यान्नीतिस्त्वैहिकसाधनम् । पुराणानि महाबुद्धे इहामुत्र सुखाय हि ॥१००॥ यः शृणोति पुराणानि सततं भक्तिसंयुतः । तस्य स्यान्निर्मला बुद्धर्भूयो धर्मपरायणः ॥१०१॥ पुराणश्रवणाद्भक्तिर्जायते श्रीपतौ शुभा । विष्णुभक्तनृणां भूप धर्मबुद्धिः प्रवर्तते ॥१०२॥ धर्मात्पापानि नश्यन्ति ज्ञानं शुद्धं च जायते । धर्मार्थकाममोक्षाणां ये फलान्यभिलिप्सवः ॥१०३॥ शृणुयुस्ते पुराणानि प्राहुरित्थं पुराविदः । अहं तु गौतममुनेः सर्वज्ञब्रह्मवादिनः ॥१०४॥ श्रुतवान्सर्वधर्मार्थं गङ्गातीरे मनोरमे । कदाचित्परमेशस्य पूजां कर्तुमहं गतः ॥१०५॥ उपस्थितायापि तस्मै प्रणामं न ह्यकारिषम् । स तु शान्तो महाबुद्धिर्गौतमस्तेजसां निधिः ॥१०६॥ मन्त्रोदितानि कर्माणि करोतीति मुदं ययौ । यस्त्वर्चितो मया देवः शिवः सर्वजगद्गुरुः ॥१०७॥ गुर्ववज्ञा कृता येन राक्षसत्वे नियुक्तवान् । ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि योऽवज्ञां कुरुते गुरोः ॥१०८॥ महिमा कह रहा हूँ । ये सभी गुरु समान भाव से पूज्य हैं, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । फिर भी शास्त्रों में जो कुछ तत्त्व-निर्णय किया गया है उसको कह रहा हूँ, सुनो । वेद पढ़ाने वाले, मन्त्र की व्याख्या करने वाले, पिता और धर्मोपदेशक विशेष (उत्तम) गुरु कहे गये हैं । इनमें भी जो परमोत्तम गुरु है उनको सुनो ॥६०-६४॥ सब शास्त्रों के तत्त्वों के ज्ञाता पण्डितों ने इस विषय में जो कुछ कहा है उसको तुमसे बता रहा हूँ । पुराणों से संसार के बन्धनों से मुक्ति दिलाने वाली विधियाँ, देव-पूजन प्रकार, उनके फल आदि जाने जाते हैं अतः वे पुराण देवता हैं और इन धार्मिक पुराणों के प्रवक्ता पण्डित ही उत्तम गुरु हैं । भूपते ! पुराण सब वेदों के सारभूत हैं और उनके वक्ता परम गुरु हैं ऐसा मुनिगण कहते हैं । जो इस संसार सागर से पार पाने का उद्योग करते हैं वे पुराणों को अवश्य सुनें; ऐसा शास्त्रों के विभाग करने वाले पण्डितों ने कहा है । राजन् ! पुराणों में सब प्रकार के धर्म कहे गए हैं । तर्क शास्त्र केवल विवाद में सहायक होता है, नीतिशास्त्र केवल सांसारिक सुख प्रदान करता है; परन्तु हे महाबुद्धि मान् ! पुराण लौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार के कल्याण देने वाले हैं ॥६५-१००॥ जो सर्वदा भक्ति पूर्वक पुराणों का श्रवण करता है उसकी बुद्धि निर्मल होती है और वह परम धार्मिक हो जाता है । पुराणों के सुनने से श्रीपति विष्णु में अचल भक्ति होती है । भूप ! विष्णुभक्तों की धर्माचरण में रुचि बढ़ती है । धर्म से पाप नष्ट हो जाते हैं और शुद्ध ज्ञान प्राप्त हो जाता है । धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का फल जो प्राप्त करना चाहते हैं उनको अवश्य पुराण श्रवण करना चाहिए, ऐसा पुराणविद् कहते हैं । गंगा के मनोरम तट पर मैंने सर्वज्ञ, ब्रह्म- वादी गौतम मुनि से सब धर्मों का सार सुना था । एक दिन मैं परम प्रभु (शिव) की पूजा करने के लिए गया । ॥१०१-१०५॥ उपस्थित होते हुए भी गौतम मुनि को मैंने प्रणाम नहीं किया; परन्तु वे परम तेजस्वी शान्त मुनि यह सोचकर कि यह मन्त्रानुकूल कर्म को कर रहा है, प्रसन्न होकर चले गए । परन्तु मैं जिन देवेश जगद् गुरु शंकर की पूजा कर रहा था उन्होंने गुरु-अपमान के कारण मुझको इस राक्षस-योनि में भेज दिया । जान- बूझ कर या अनजान रूप से भी जो गुरु का तिरस्कार करता है उसकी बुद्धि, विद्या, धन, पुत्र तथा सारी क्रियायें