बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६० नारदीयपुराणम् क्षुत्पिपासापरो नित्यमन्तस्तापेन पीडितः । जगत्त्रासकरो नित्यं मांसाशनपरायणः ॥८२॥ गुर्ववज्ञा मनुष्याणां राक्षसत्वप्रदायिनी । मयानुभूतमेतद्धि ततः श्रीमान्न चाचरेत् ॥८३॥ कल्माषपाद उवाच गुरुस्तु कीदृशः प्रोक्तः कस्त्वया श्लाघितः पुरा । तद्वदस्व सखे सर्वं परं कौतूहलं हि मे ॥८४॥ ब्रह्मराक्षस उवाच गुरवः सन्ति बहवः पूज्या वन्द्याश्च सादरम् । तानहं कथयिष्यामि शृणुष्वैकमनाः सखे ॥८५॥ अध्यापकश्च वेदानां वेदार्थद्युतिबोधकः । शास्त्रवक्ता धर्मवक्ता नीतिशास्त्रोपदेशकः ॥८६॥ मन्त्रोपदेशव्याख्याकृद् देसंदेहहृत्तथा । व्रतोपदेशकश्चैव भयत्रातान्नदो हि च ॥८७॥ श्वशुरो मातुलश्चैव ज्येष्ठभ्राता पिता तथा । उपनेता निवेक्ता च संस्कर्ता द्विजसत्तम ॥८८॥ एते हि गुरवः प्रोक्ता पूज्या वन्द्याश्च सादरम् ॥८६॥ कल्माषपाद उवाच गुरवो बहवः प्रोक्ता एतेषां कतमो वरः । तुल्याः सर्वेऽप्युत सखे तद्यथावद्धि ब्रूहि मे ॥६०॥ ब्रह्मराक्षस उवाच साधु साधु महाप्राज्ञ यत्पृष्टं तद्ददामि ते । गुरुमाहात्म्यकथनं श्रवणं चानुमोदनम् ॥६१॥ सर्वेषां श्रेय आधत्ते तस्माद्वक्ष्यामि सांप्रतम् । एते समानपूजार्हाः सर्वदा नात्र संशयः ॥६२॥ रहकर दुःखमय जीवन बिता रहा हूँ। मैंने सैकड़ों हजारों दीन ब्राह्मणों को अपना आहार बना डाला । अतः नित्य प्रति भूखा प्यासा रह कर भूख की ज्वाला से जलता रहता हूँ। नित्य प्रति मांस-भक्षण में ही लगा रहता और संसार को त्रस्त करता रहता हूँ। गुरु का अपमान मनुष्य को राक्षस बना देता है, इसका पूर्ण रूप से अनुभव मुझे हो गया है । इसलिए बुद्धिमान् व्यक्ति कभी भी गुरु का अपमान न करें । ॥७६-८३॥ कल्माषपाद बोला-गुरु किसे कहते हैं ? कौन तुम्हारे गुरु थे, जिसके प्रति पहले पूज्य भावना थी ? मित्र ! सारी बातें मुझसे कहो; मुझे महान् कौतूहल हो रहा है। ब्रह्मराक्षस बोला-सखे ! गुरु बहुत प्रकार के होते हैं जो आदर पूर्वक पूजने और वन्दना करने के योग्य हैं, उनके विषय में मैं कह रहा हूँ सावधान होकर सुनो। वेदों को पढ़ाने वाले, वेदार्थ की अर्थ संगति बताने वाले, शास्त्रोपदेशक, नीतिशास्त्र का उपदेश देने वाले, मन्त्रोपदेशक, भाष्यकार, सन्देह निवारण करने वाले, व्रतोपदेशक, भय से रक्षा करने वाले, अन्नदाता, पत्नी के पिता, मामा, बड़े भाई, पिता (पालक), उपनयन करने वाला, उत्पादक (जन्मदाता), और संस्कार करने वाला इतने गुरु कहे गये हैं जो सर्वथा वन्दनीय और पूजनोय हैं ॥८४-८६॥ कल्माषपाद बोला-गुरु तो बहुत से कहे गए हैं; इनमें कौन श्रेष्ठ हैं ? अथवा सभी समान हैं ? इसको अपनी बुद्धि के अनुसार मुझसे कहो । ब्रह्मराक्षस बोला-महाप्राज्ञ ! तुम धन्य हो ! धन्य हो ! तुमने जो पूछा है उसको अवश्य कहूँगा। गुरु की महिमा का वर्णन करना और उसकी सुनना सब को कल्याण प्रदान करते हैं। इसलिए इस समय गुरु-