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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

६० नारदीयपुराणम् क्षुत्पिपासापरो नित्यमन्तस्तापेन पीडितः । जगत्त्रासकरो नित्यं मांसाशनपरायणः ॥८२॥ गुर्ववज्ञा मनुष्याणां राक्षसत्वप्रदायिनी । मयानुभूतमेतद्धि ततः श्रीमान्न चाचरेत् ॥८३॥ कल्माषपाद उवाच गुरुस्तु कीदृशः प्रोक्तः कस्त्वया श्लाघितः पुरा । तद्वदस्व सखे सर्वं परं कौतूहलं हि मे ॥८४॥ ब्रह्मराक्षस उवाच गुरवः सन्ति बहवः पूज्या वन्द्याश्च सादरम् । तानहं कथयिष्यामि शृणुष्वैकमनाः सखे ॥८५॥ अध्यापकश्च वेदानां वेदार्थद्युतिबोधकः । शास्त्रवक्ता धर्मवक्ता नीतिशास्त्रोपदेशकः ॥८६॥ मन्त्रोपदेशव्याख्याकृद् देसंदेहहृत्तथा । व्रतोपदेशकश्चैव भयत्रातान्नदो हि च ॥८७॥ श्वशुरो मातुलश्चैव ज्येष्ठभ्राता पिता तथा । उपनेता निवेक्ता च संस्कर्ता द्विजसत्तम ॥८८॥ एते हि गुरवः प्रोक्ता पूज्या वन्द्याश्च सादरम् ॥८६॥ कल्माषपाद उवाच गुरवो बहवः प्रोक्ता एतेषां कतमो वरः । तुल्याः सर्वेऽप्युत सखे तद्यथावद्धि ब्रूहि मे ॥६०॥ ब्रह्मराक्षस उवाच साधु साधु महाप्राज्ञ यत्पृष्टं तद्ददामि ते । गुरुमाहात्म्यकथनं श्रवणं चानुमोदनम् ॥६१॥ सर्वेषां श्रेय आधत्ते तस्माद्वक्ष्यामि सांप्रतम् । एते समानपूजार्हाः सर्वदा नात्र संशयः ॥६२॥ रहकर दुःखमय जीवन बिता रहा हूँ। मैंने सैकड़ों हजारों दीन ब्राह्मणों को अपना आहार बना डाला । अतः नित्य प्रति भूखा प्यासा रह कर भूख की ज्वाला से जलता रहता हूँ। नित्य प्रति मांस-भक्षण में ही लगा रहता और संसार को त्रस्त करता रहता हूँ। गुरु का अपमान मनुष्य को राक्षस बना देता है, इसका पूर्ण रूप से अनुभव मुझे हो गया है । इसलिए बुद्धिमान् व्यक्ति कभी भी गुरु का अपमान न करें । ॥७६-८३॥ कल्माषपाद बोला-गुरु किसे कहते हैं ? कौन तुम्हारे गुरु थे, जिसके प्रति पहले पूज्य भावना थी ? मित्र ! सारी बातें मुझसे कहो; मुझे महान् कौतूहल हो रहा है। ब्रह्मराक्षस बोला-सखे ! गुरु बहुत प्रकार के होते हैं जो आदर पूर्वक पूजने और वन्दना करने के योग्य हैं, उनके विषय में मैं कह रहा हूँ सावधान होकर सुनो। वेदों को पढ़ाने वाले, वेदार्थ की अर्थ संगति बताने वाले, शास्त्रोपदेशक, नीतिशास्त्र का उपदेश देने वाले, मन्त्रोपदेशक, भाष्यकार, सन्देह निवारण करने वाले, व्रतोपदेशक, भय से रक्षा करने वाले, अन्नदाता, पत्नी के पिता, मामा, बड़े भाई, पिता (पालक), उपनयन करने वाला, उत्पादक (जन्मदाता), और संस्कार करने वाला इतने गुरु कहे गये हैं जो सर्वथा वन्दनीय और पूजनोय हैं ॥८४-८६॥ कल्माषपाद बोला-गुरु तो बहुत से कहे गए हैं; इनमें कौन श्रेष्ठ हैं ? अथवा सभी समान हैं ? इसको अपनी बुद्धि के अनुसार मुझसे कहो । ब्रह्मराक्षस बोला-महाप्राज्ञ ! तुम धन्य हो ! धन्य हो ! तुमने जो पूछा है उसको अवश्य कहूँगा। गुरु की महिमा का वर्णन करना और उसकी सुनना सब को कल्याण प्रदान करते हैं। इसलिए इस समय गुरु-

नवमोऽध्यायः ६१ तथापि शृणु वक्ष्यामि शास्त्राणां सारनिश्चयम् । अध्यापकश्च वेदानां मन्त्रव्याख्याकृतस्तथा ॥६३॥ पिता च धर्मवक्ता च विशेषगुरवः स्मृताः । एतेषामपि भूपाल शृणुष्व प्रवरं गुरुम् ॥६४॥ सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञैर्भाषितं प्रवदामि ते । यः पुराणानि वदति धर्मयुक्तानि पण्डितः ॥६५॥ संसारपाशविच्छेदकरणानि स उत्तमः । देवपूजार्हकर्माणि देवतापूजने फलम् ॥६६॥ जायते च पुराणेभ्यस्तस्मात्तानीह देवताः । सर्ववेदार्थसाराणि पुराणानीति भूपते ॥६७॥ वदन्ति मुनयश्चैव तद्वक्ता परमो गुरुः । यः संसारार्णवं तर्तुमुद्योगं कुरुते नरः ॥६८॥ शृणुयात्स पुराणानि इति शास्त्रविभागकृत् । प्रोक्तान्सर्वधर्मांश्च पुराणेषु महीपते ॥६९॥ तर्कस्तु वादहेतुः स्यान्नीतिस्त्वैहिकसाधनम् । पुराणानि महाबुद्धे इहामुत्र सुखाय हि ॥१००॥ यः शृणोति पुराणानि सततं भक्तिसंयुतः । तस्य स्यान्निर्मला बुद्धर्भूयो धर्मपरायणः ॥१०१॥ पुराणश्रवणाद्भक्तिर्जायते श्रीपतौ शुभा । विष्णुभक्तनृणां भूप धर्मबुद्धिः प्रवर्तते ॥१०२॥ धर्मात्पापानि नश्यन्ति ज्ञानं शुद्धं च जायते । धर्मार्थकाममोक्षाणां ये फलान्यभिलिप्सवः ॥१०३॥ शृणुयुस्ते पुराणानि प्राहुरित्थं पुराविदः । अहं तु गौतममुनेः सर्वज्ञब्रह्मवादिनः ॥१०४॥ श्रुतवान्सर्वधर्मार्थं गङ्गातीरे मनोरमे । कदाचित्परमेशस्य पूजां कर्तुमहं गतः ॥१०५॥ उपस्थितायापि तस्मै प्रणामं न ह्यकारिषम् । स तु शान्तो महाबुद्धिर्गौतमस्तेजसां निधिः ॥१०६॥ मन्त्रोदितानि कर्माणि करोतीति मुदं ययौ । यस्त्वर्चितो मया देवः शिवः सर्वजगद्गुरुः ॥१०७॥ गुर्ववज्ञा कृता येन राक्षसत्वे नियुक्तवान् । ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि योऽवज्ञां कुरुते गुरोः ॥१०८॥ महिमा कह रहा हूँ । ये सभी गुरु समान भाव से पूज्य हैं, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । फिर भी शास्त्रों में जो कुछ तत्त्व-निर्णय किया गया है उसको कह रहा हूँ, सुनो । वेद पढ़ाने वाले, मन्त्र की व्याख्या करने वाले, पिता और धर्मोपदेशक विशेष (उत्तम) गुरु कहे गये हैं । इनमें भी जो परमोत्तम गुरु है उनको सुनो ॥६०-६४॥ सब शास्त्रों के तत्त्वों के ज्ञाता पण्डितों ने इस विषय में जो कुछ कहा है उसको तुमसे बता रहा हूँ । पुराणों से संसार के बन्धनों से मुक्ति दिलाने वाली विधियाँ, देव-पूजन प्रकार, उनके फल आदि जाने जाते हैं अतः वे पुराण देवता हैं और इन धार्मिक पुराणों के प्रवक्ता पण्डित ही उत्तम गुरु हैं । भूपते ! पुराण सब वेदों के सारभूत हैं और उनके वक्ता परम गुरु हैं ऐसा मुनिगण कहते हैं । जो इस संसार सागर से पार पाने का उद्योग करते हैं वे पुराणों को अवश्य सुनें; ऐसा शास्त्रों के विभाग करने वाले पण्डितों ने कहा है । राजन् ! पुराणों में सब प्रकार के धर्म कहे गए हैं । तर्क शास्त्र केवल विवाद में सहायक होता है, नीतिशास्त्र केवल सांसारिक सुख प्रदान करता है; परन्तु हे महाबुद्धि मान् ! पुराण लौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार के कल्याण देने वाले हैं ॥६५-१००॥ जो सर्वदा भक्ति पूर्वक पुराणों का श्रवण करता है उसकी बुद्धि निर्मल होती है और वह परम धार्मिक हो जाता है । पुराणों के सुनने से श्रीपति विष्णु में अचल भक्ति होती है । भूप ! विष्णुभक्तों की धर्माचरण में रुचि बढ़ती है । धर्म से पाप नष्ट हो जाते हैं और शुद्ध ज्ञान प्राप्त हो जाता है । धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का फल जो प्राप्त करना चाहते हैं उनको अवश्य पुराण श्रवण करना चाहिए, ऐसा पुराणविद् कहते हैं । गंगा के मनोरम तट पर मैंने सर्वज्ञ, ब्रह्म- वादी गौतम मुनि से सब धर्मों का सार सुना था । एक दिन मैं परम प्रभु (शिव) की पूजा करने के लिए गया । ॥१०१-१०५॥ उपस्थित होते हुए भी गौतम मुनि को मैंने प्रणाम नहीं किया; परन्तु वे परम तेजस्वी शान्त मुनि यह सोचकर कि यह मन्त्रानुकूल कर्म को कर रहा है, प्रसन्न होकर चले गए । परन्तु मैं जिन देवेश जगद् गुरु शंकर की पूजा कर रहा था उन्होंने गुरु-अपमान के कारण मुझको इस राक्षस-योनि में भेज दिया । जान- बूझ कर या अनजान रूप से भी जो गुरु का तिरस्कार करता है उसकी बुद्धि, विद्या, धन, पुत्र तथा सारी क्रियायें

६२ नारदीयपुराणम् तस्यैवाशु प्रणश्यन्ति धीविद्यार्थात्मजैक्रियाः । शुश्रूषां कुरुते यस्तु गुरूणां सादरं नरः ॥१०८॥ तस्य संपद्भवेद्भूष इति प्राहुर्विपश्चितः । तेन शापेन दग्धोऽहमन्तश्चैव क्षुधाग्निना ॥११०॥ मोक्षं कदा प्रयस्यामि न जाने नृपसत्तम । एवं वदति विप्रेन्द्र वटस्थेऽस्मिन्निशाचरे ॥१११॥ धर्मशास्त्रप्रसंगेन तयोः पापं क्षयं गतम् । एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तः कश्चिद्विप Generic्रोऽतिधार्मिकः ॥११२॥ कलिङ्गदेशसंसूतो नाम्ना गर्ग इति स्मृतः । वहन्गङ्गाजलं स्कंधे स्तुवन् विश्वेश्वरं प्रभुम् ॥११३॥ गायन्नामानि तस्यैव मुदा हृष्टतनूरुहः । तमागतं मुनिं दृष्ट्वा पिशाचीराक्षसौ च तौ ॥११४॥ प्राप्ता नः पारणेत्युक्त्वा प्राद्रवन्नूर्ध्वबाहवः । तेन कीर्तितनामानि श्रुत्वा दूरे व्यवस्थिताः । अशक्तास्तं धर्षयितुमिदमूचुश्च राक्षसाः ॥११५॥ अहो विप्र महाभाग नमस्तुभ्यं महात्मने । नामकीर्तनमाहात्म्याद्राक्षसा दूरगा वयम् ॥११६॥ अस्माभिर्भक्षिताः पूर्वं विप्राः कोटिसहस्रशः । नामप्रावरणं विप्र रक्षति त्वां महाभयात् ॥११७॥ नामश्रवणमात्रेण राक्षसा अपि भो वयम् । परां शान्ति समापन्ना महिम्ना ह्यच्युतस्य वै ॥११८॥ सर्वथा त्वं महाभाग रागादिरहितो ह्यसि । गंगाजिलाभिषेकेन पाह्मास्मान्महापातकोच्चयात् ॥११९॥ हरिसेवापरो भूत्वा यश्चात्मानं तु तारयेत् । स तारयेज्जगत्सर्वमिति शंसन्ति सूरयः ॥१२०॥ अपहाय हरेर्नाम घोरसंसारभेषजम् । केनोपायेन लभ्येत मुक्तिः सर्वत्र दुर्लभा ॥१२१॥ लोहोडुपेन प्रतरन्निमज्जत्युदके यथा । तथैवाकृतपुण्यास्तु तारयन्ति कथं परान् ॥१२२॥ अहो चरित्रं महतां सर्वलोकसुखावहम् । यथा हि सर्वलोकानामानन्दाय कलानिधिः ॥१२३॥ नष्ट हो जाती हैं। जो मनुष्य आदर पूर्वक गुरु की शुश्रूषा करता है, भूपाल ! उसको अवश्य सम्पत्ति मिलती है और वह सुखी रहता है, ऐसा विद्वान् कहते हैं। उस शाप से ही मैं नष्ट हो गया और इस प्रकार भूख की ज्वाला से सदा जलता रहता हूँ ॥१०६-११०॥ नृपसत्तम ! कब इस योनि से छुटकारा मिलेगा, मैं नहीं जानता। विप्रेन्द्र ! इस प्रकार वट पर रहने वाले निशाचर से वार्तालाप करने पर धर्मशास्त्र की चर्चा के प्रभाव से उन दोनों के पाप क्षीण हो गए। इसी बीच कलिङ्ग देश का रहने वाला गर्ग नामक अति धार्मिक ब्राह्मण वहाँ आया जो कन्धे पर गंगाजल लिए हुए था और विश्वेश्वर प्रभु की स्तुति कर रहा था । भगवान् के नामों का उच्चारण करता हुआ वह भक्त आनन्दा- तिरेक से पुलकित हो जाता था । उस मुनि को अपनी ओर आते देखकर वे दोनों पिशाची और राक्षस 'आज हम लोगों को भोजन मिल गया, यह कह कर हाथ ऊपर उठाए हुए उस मुनि की ओर दौड़े परन्तु उसके नामो- च्चारण को सुनकर दूर ही ठिठक गए। उस मुनि पर आक्रमण करने में अपने को असमर्थ पाकर उन दोनों राक्षसों ने कहा ॥१११-११५॥ हे महाभाग विप्र ! आप महात्मा को नमस्कार है, आपके नाम संकीर्तन के प्रभाव से हम दोनों राक्षस दूरस्थ ही हैं। पहले हम लोगों ने हजारों करोड़ों ब्राह्मणों को अपना आहार बना डाला परन्तु आज तुमको भगवन्नामोच्चारण रूपी कवच महाभय (मृत्यु) से बचा रहा है। नाम श्रवण मात्र से राक्षस होते हुए भी हम दोनों भगवान् अच्युत की महिमा से परम शान्ति का अनुभव कर रहे हैं ॥११६-११८॥ महाभाग ! तुम तो सर्वथा रागादि दोषों से शून्य हो, अतः गंगाजल के अभिषेक से हमें इस महापाप से बचाओ। जो हरिसेवा में निरत रह कर आत्मोद्धार करता है वह सारे संसार का उद्धार कर सकता है, ऐसा मनीषीजन कहते हैं। हरिनाम को छोड़ कर इस कराल माया से मुक्ति दिलाने वाली कोई दूसरी ओषधि नहीं है। इसको छोड़ कर किसी दूसरे उपाय से नहीं प्राप्त की जा सकती है। वह तो सर्वथा और सर्वदा परम दुर्लभ है। जिस प्रकार लोहे की बनी नौका के सहारे तैरने का साहस करने वाला बीच में डूब जाता है। उसी प्रकार अकृतपुण्य (पापी) कैसे

६३ नवमोऽध्यायः पृथिव्यां यानि तीर्थानि पवित्राणि द्विजोत्तम । तानि सर्वाणि गङ्गायाः कणस्यापि समानि न ॥१२४॥ तुलसीदलसंमिश्रमपि सर्षपमात्रकम् । गङ्गाजलं पुनात्येव कुलानामेकविंशतिम् ॥१२५॥ तस्माद्विप्र महाभाग सर्वशास्त्रार्थकोविद । गङ्गाजलप्रदानेन पाह्मास्मान्पापकर्मिणः ॥१२६॥ इत्याख्यातं राक्षसैस्तैर्गङ्गामाहात्म्यमुत्तमम् । निशम्य विस्मयाविष्टो बभूव द्विजसत्तमः ॥१२७॥ एषामपीदृशी भक्तिर्गङ्गायां लोकमातरि । किमु ज्ञानप्रभावाणां महतां पुण्यशालिनाम् ॥१२८॥ अथासौ मनसा धर्मं विनिश्चित्य द्विजोत्तमः । सर्वभूतहितो भक्तः प्राप्नोतीति परं पदम् ॥१२९॥ ततो विप्रः कृपाविष्टो गङ्गाजलमनुत्तमम् । तुलसीदलसंमिश्रं तेषु रक्षःस्वसेचयत् ॥१३०॥ राक्षसास्तेन सिक्तास्तु सर्षपोपमर्बिदुना । विसृज्य राक्षसं भावमभवन्देवतोपमाः ॥१३१॥ ब्राह्मणी पुत्रसंयुक्ता सोमदत्तस्तथैव च । कोटिसूर्यप्रतीकाशा बभूवुर्विबुधर्षभाः ॥१३२॥ शंखचक्रगदाचिह्ना हरिसारूप्यमागताः । स्तुवन्तो ब्राह्मणं सम्यक्ते जग्मुर्हरिमन्दिरम् ॥१३३॥ राजा कल्मषपादस्तु निजरूपं समास्थितः । जगाम महतीं चिन्तां दृष्ट्वा तान्मुक्तिगानधान् ॥१३४॥ तस्मिन् राज्ञि सुदुःखार्त गूढरूपा सरस्वती । धर्ममूलं महावाक्यं बभाषेऽगाधया गिरा ॥१३५॥ भो भो राजन्महाभाग न दुःखं गन्तुमर्हसि । राजंस्तवापि भोगान्ते महच्छ्रेयो भविष्यति ॥१३६॥ सत्कर्मधूतपापा ये हरिभक्तिपरायणाः । प्रयान्ति नात्र सन्देहस्तद्विष्णोः परमं पदम् ॥१३७॥ सर्वभूतदयायुक्ता धर्ममार्गप्रवर्तिनः । प्रयान्ति परमं स्थानं गुरुपूजापरायणाः ॥१३८॥ दूसरों का उद्धार कर सकते हैं ? अहो ! महान् व्यक्तियों का चरित्र उसी प्रकार सब लोगों के लिए सुख दायक होता है जिस प्रकार चन्द्रमा का उदय सब प्राणियों के लिए आनन्ददायक होता है। द्विजवर्य ! इस भूतल के जितने पवित्र तीर्थ हैं वे सभी गंगाजल के क्षुद्र अंश की भी समानता नहीं कर सकते ॥११६-१२४॥ तुलसी दल से मिला गंगाजल का एक सरसों के बराबर बिन्दु भी इक्कीस कुल परम्परा का उद्धार करता है । इसलिए हे सब शास्त्रों के तत्त्वज्ञ ! महाभाग विप्र ! गंगाजल को देकर हम पापियों का उद्धार करो । इस प्रकार उन राक्षसों ने गंगा का उत्तम माहात्म्य कह कर सुनाया ॥१२५-१२७॥ इस बातों को सुनकर वह द्विज आश्चर्य चकित हो गया कि जब इन पाप परायण जनों की भी लोक-माता गंगा में यह श्रद्धा है तब तो ज्ञानी महात्माओं के विषय में क्या कहा जाय ? द्विजोत्तम ! इसके अनन्तर उस भद्र पुरुष ने विचार पूर्वक अपना कर्त्तव्य निश्चित किया कि सब प्राणियों की हित कामना में रत रहने वाला भक्त अवश्यमेव परम पद को प्राप्त करता है । तदन्तर उस विप्र ने कृपा करके तुलसीदल मिश्रित गंगा जल उन राक्षसों पर छिड़का । केवल सरसों के बराबर गंगाजल-विन्दु के अभिषेक मात्र से वे सब राक्षस शरीर को छोड़कर देवता के समान हो गए । ।१२८-१३१॥ पुत्र के सहित वह ब्राह्मणी और सोमदत्त कोटि सूर्य के समान तेजोमय शरीर वाले देवता हो गए ओर शंख, चक्र, गदा धारी हरि के समान रूप पा गए। वे उस ब्राह्मण की भलीभांति स्तुति करने के बाद भगवान् के मन्दिर में गए। राजा कल्माषपाद अभी अपने को राक्षस रूप में ही पाकर और उन पापी सहयोगियों को मुक्त देखकर घोर चिन्ता करने लगा । राजा को इस प्रकार चिन्तातुरदे खकर सरस्वती ने अप्रत्यक्ष रूप से गम्भीर स्वर में धर्म-सम्मत बातें कहीं । हे राजन् ! महाभाग ! दुःखी होने की आवश्यकता नहीं, राजन् तुम भी कर्म-भोग के अनन्तर महान् श्रेय प्राप्त करोगे ॥१३२-१३६॥ जिन्होंने सत्कर्मों के द्वारा अपने पापों को विनष्ट कर दिया है और हरि पूजा में जो सर्वथा लीन हैं वे अवश्यमेव परम पद को प्राप्त करते हैं । निखिल प्राणिसमूह पर दया करने वाले धर्म की प्रतिष्ठा करने वाले और गुरुपूजा में निरत रहने वाले परम स्थान को प्राप्त करते हैं । सरस्वती की इन

६४ नारदीयपुराणम् इतीरितं समाकर्ण्य भारत्या नृपसत्तमः । मनसा निर्वृतिं प्राप्य सस्मार च गुरोर्वचः ॥१३९॥ स्तुवन्गुरुं च तं विप्रं हरिं चैवातिहर्षितः । पूर्ववृत्तं च विप्राय सर्वं तस्मै न्यवेदयत् ॥१४०॥ ततो नृपस्तु कालिङ्गं प्रणम्य विधिवन्मुने । नामानि व्याहरन्विष्णोः सद्यो वाराणसीं ययौ ॥१४१॥ षण्मासं तत्र गङ्गायां स्नात्वा दृष्ट्वा सदाशिवम् । ब्राह्मणीदत्तशापात्तु मुक्तो मित्रसहोऽभवत् ॥१४२॥ ततस्तु स्वपुरीं प्राप्तो वसिष्ठेन महात्मना । अभिषिक्तो मुनिश्रेष्ठ स्वकं राज्यमपालयत् ॥१४३॥ पालयित्वा महीं कृत्स्नां भुक्त्वा भोगान्स्त्रियं विना । वसिष्ठात्प्राप्य सन्तानं गतो मोक्षं नृपोत्तमः ॥१४४॥ नैतच्चित्रं द्विजश्रेष्ठ विष्णोर्वाराणसीगुणान् । गृणञ्छृण्वन्स्मरन्गङ्गां पीत्वा मुक्तो भवेन्नरः ॥१४५॥ तस्मान्महिम्नो विप्रेन्द्र गङ्गायाः शक्यते नहि । पारं गन्तुं सुराधीशैर्ब्रह्मविष्णुशिवैरपि ॥१४६॥ यन्नामस्मरणादेव महापातककोटिभिः । विमुक्तो ब्रह्मसदनं नरो याति न संशयः ॥१४७॥ गङ्गा गङ्गेति यन्नाम सकृदप्युच्यते यदा । तदैव पापान्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते ॥१४८॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे गङ्गामाहात्म्ये नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥


बातों को सुनकर नृप को कुछ मन में संतोष हुआ और गुरु के कथन का स्मरण किया । बड़ी प्रसन्नता से अपने गुरु की, उस ब्राह्मण की और भगवान् की स्तुति करने लगा और उस विप्र से अपने जीवन की पूर्वकालीन सारी घटना कह सुनाई ॥१३७-१४०॥ मुनिश्रेष्ठ ! स्तुति के बाद राजा ने विधि पूर्वक उस कलिङ्ग देश वासी ब्राह्मण को प्रणाम किया और हरिनाम का उच्चारण करता हुआ शीघ्र वाराणसी चला गया । वहाँ छह महीने तक गंगा स्नान और सदाशिव का दर्शन कर वह मित्रसह राजा ब्राह्मणी के शाप से मुक्त हुआ । इस प्रकार पाप-मुक्त होकर वह अपनी राजधानी में गया और महात्मा वशिष्ठ से पुनः अभिषिक्त होकर अपने राज्य का पालन करने लगा । ॥१४१-१४३॥ उस नृपवर्य ने सम्पूर्ण पृथ्वी का पालन और भोगों का भोग किया परन्तु शाप-भय से स्त्री-भोग से अपने को बचाये रहा । वसिष्ठ द्वारा क्षेत्रज पुत्रों को उत्पन्न करा कर अन्त में वह मोक्ष का भी अधिकारी हुआ । द्विजश्रेष्ठ ! इसमें आश्चर्य करने की आवश्यकता नहीं, मनुष्य भगवान् विष्णु और गंगा की महिमा का वर्णन और श्रवणकर एवं गंगाजल का पान कर अवश्य मुक्त हो जाता है । विप्रेन्द्र ! इसलिए गंगा की महिमा के वर्णन करने में देवेन्द्र ब्रह्मा, विष्णु और शंकर भी सफल नहीं हो सकते हैं। गंगा के नाम स्मरण मात्र से मनुष्य अपने करोड़ों पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को चला जाता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । जो एक बार भी 'गंगा, गंगा, ऐसा उच्चारण करता है वह तत्काल पाप मुक्त होकर ब्रह्मलोक में पूजित होता है ॥१४४-१४८॥ श्री नारदीय पुराण में गंगा-महात्म्य-वर्णन नामक नवां अध्याय समाप्त ॥६॥

दशमोऽध्यायः नारद उवाच विष्णुपादाग्रसंभूता या गङ्गेत्यभिधीयते । तदुत्पत्तिं वद भ्रातरनुग्राह्योऽस्मि ते यदि ॥१॥ सनक उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि गङ्गोत्पत्तिं तवानघ । वदतां शृण्वतां चैव पुण्यदां पापनाशनीम् ॥२॥ आसीदिन्द्रादिदेवानां जनकः कश्यपो मुनिः । दक्षात्मजे तस्य भार्ये दितिश्चादितिरेव च ॥३॥ अदितिर्देवमातास्ति दैत्यानां जननी दितिः । ते तयोरात्मजा विप्र परस्परजयैषिणः ॥४॥ सदा सपूर्वदेवास्तु यतो दैत्याः प्रकीर्तिताः । आदिदैत्यो दितेः पुत्रो हिरण्यकशिपुर्बली ॥५॥ प्रह्लादस्तस्य पुत्रोऽभूत्सुमहान्दैत्यसत्तमः । विरोचनस्तस्य सुतो बभूव द्विजभक्तिमान् ॥६॥ तस्य पुत्रोऽतितेजस्वी बलिरासीत्प्रतापवान् । स एव वाहिनीपालो दैत्यानामभवन्मुनेः ॥७॥ बलेन महता युक्तो बुभुजे मेदिनीमिमाम् । विजित्य वसुधां सर्वां स्वर्गं जेतुं मनो दधे ॥८॥ गजाश्च यस्यायुतकोटिलाक्षास्तावन्त एवाश्वरथा मुनीन्द्र । गजे गजे पंचशती पदातेः किं वर्ण्यते तस्य चमूर्वरिष्ठा ॥९॥ अध्याय १० राजा बलि से देवताओं की पराजय नारद बोले—भाई ! यदि आप का मेरे ऊपर अनुग्रह है तो कृपा कर विष्णु के चरणों के निकली हुई गंगा नदी की उत्पत्ति कथा कहिए ॥१॥ सनक बोले—निष्पाप ! सुनो । आज तुमसे श्रोता और वक्ता दोनों के पापों को नष्ट करने वाली गंगा की उत्पत्ति कथा कह रहा हूँ । इन्द्र आदि देवताओं को उत्पन्न करने वाले कश्यप नामक एक मुनि थे, उनकी दक्षपुत्री दिति और अदिति नाम की दो भार्याएँ थीं । अदिति देवों की माता और दिति दैत्यों की जननी थी । विप्र ! उनके ये पुत्र परस्पर सर्वदा एक दूसरे को जीतना चाहते थे क्योंकि दैत्य सर्वदा से देवों के अग्रज कहे गए हैं । दिति पुत्र बली हिरण्यकशिपु आदि दैत्य था । उसका दैत्य-प्रवर महातेजस्वी प्रह्लाद नामक पुत्र हुआ । प्रह्लाद का विरोचन नामक परम ब्राह्मण-भक्त पुत्र हुआ । उसका भी महाबलवान्, तेजस्वी बलि नामक पुत्र हुआ, जो स्वयं दैत्य-वाहिनी का एक मात्र पालक और रक्षक था ॥२-७॥ उसने अपने सैन्य बल से इस मेदिनी को वश में किया और पृथ्वी को जीत लेने के बाद स्वर्ग-विजय की भी कामना करने लगा । मुनीन्द्र ! जिसकी सेना में दश सहस्र करोड़ लड़ाकू हाथी उतने ही अश्व और रथ, एवं प्रत्येक हाथी के पीछे पचास पैदल सिपाही थें तब उसकी विशाल वाहिनी का क्या वर्णन किया जाय । उसके मंत्रि-समूह में अग्रगण्य दो मंत्री थे, जिनमें एक का नाम ६—नार०

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६६ नारदीयपुराणम् अमात्यकोद्वयप्रसरावमात्यौ कुम्भाण्डनामाथ च कूपकर्णः । पित्रा समं शौर्यपराक्रमाभ्यां बाणो बलेः पुत्रशताग्रजोऽभूत् ॥१०॥ बलिः सुराञ्जेतुमनोः प्रवृत्तः सैन्येन युक्तो महता प्रतस्थे । ध्वजातपत्रैगगनाम्बुराशेस्तरङ्गविद्युत्स्मरणं प्रकुर्वन् ॥११॥ अवाप्यवृत्रारिपुरं सुरारी रुरोध दैत्यैर्मृगराजगाढैः । सुराश्च युद्धाय पुरात्तथैव विनिर्ययुर्वज्रकरादयश्च ॥१२॥ ततः प्रवृत्ते युद्धं घोरं गीर्वाणदैत्ययोः । कल्पांतमेघनिर्घोषं डिंडिमध्वानसंभ्रमम् ॥१३॥ मुमुचुः शरजालानि दैत्याः सुमनसां बले । देवांश्च दैत्यसेनासु संग्रामेऽत्यन्तदारुणे ॥१४॥ जहि दारय भिंधीति छिंधि मारय ताडय । इत्येवं सुमहाग्घोषो वदतां सेनयोरभूत् ॥१५॥ शरदुन्दुभिनिध्वाणैः सिंहनादैः सुरद्विषाम् । भाङ्कारैः स्यन्दनानां च बाणक्रङ्कारनिःस्वनैः ॥१६॥ अश्वानां हेषितैश्चैव गजानां बृंहितैस्तथा । टङ्कारैर्धनुषां चैव लोकः शब्दमयोऽभवत् ॥१७॥ सुरासुरविनिर्मुक्तबाणनिष्पेषजानले । अकालप्रलयं मेने निरीक्ष्य सकलं जगत् ॥१८॥ बभौ देवद्विषां सेना स्फुरच्छस्त्रौधधारिणी । चलविद्युन्निभा रात्रिश्च्छादिता जलदैरिव ॥१९॥ तस्मिन्युद्धे महागौरैर्गीरीन् क्षिप्तान् सुरारिभिः । नाराचैश्चूर्णयामासुर्देवास्ते लघुविक्रमाः ॥२०॥ केचित्संताडयामासुर्गजैर्गजांस्तथारथैः । अश्वैरश्वांश्च केचित्तु गदादण्डैरथाऽर्दयन् ॥२१॥ परिघैस्ताडिताः केचित्पेतूः शोणितकर्द्दमे । समुत्क्रांतासवः केचिद्विमानानि समाश्रिताः ॥२२॥ ये दैत्या निहता देवैः प्रसह्य सङ्गरे तदा । ते देवभावमापन्ना दैत्यान्त्समुपादवन् ॥२३॥

कुंभाण्ड और दूसरे का नाम कूपकर्ण था । शूरता और पराक्रम में पिता के ही समान बलि का सौ भाइयों में ज्येष्ठ बाण नामक पुत्र भी था ॥८-१०॥ जब बलि के मन में देवों को जीतने की इच्छा हुई तब वह अपनी महा सैन्य शक्ति के साथ रणाभियान के लिए स्वर्ग की ओर प्रस्थित हुआ । उसकी सेना की असंख्य ध्वजाओं और छत्रों की चमक ऐसी प्रतीत होती थी मानों आकाशवर्ती मेघों के बीच चमचमाती हुई विद्युत् की रेखा हो । इन्द्र पुर के पास जाकर उस असुर ने अपने सिंह सदृश पराक्रमी राक्षस सैनिकों से घेरा डाल दिया । यह देख कर देवता भी, वज्र आदि अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर नगर से निकल गये । क्षण भर में देवों और दैत्यों में तुमुल युद्ध छिड़ गया, प्रलय कालीन मेघ के समान भयङ्कर घोष करने वाले युद्ध-वाद्य बजने लगे ॥११-१३॥ दैत्यों ने देवताओं की सेना पर भयङ्कर शस्त्र-समूहों की वर्षा की । देवता भी असुर सैनिकों को अपने अस्त्र प्रहार से भूनने लगे । परस्पर लड़न वाले सैनिकों के मारो, फाड़ डालो, तोड़ दो, टूक-टूक कर दो, मारो, पटको, आदि कोलाहल से तुमुल घोष होने लगा । धनुष और दुन्दुभियों की ध्वनि से, राक्षसों की गर्जना से, रथों की भनभनाहट से, बाणों की कड़कड़ाहट से, घोड़ों की हिनहिनाहट से, हाथियों के चिग्घाड़ से और धनुष की टंकारों से आकाश-पाताल गूंज उठा ॥१४-१७॥ देव-दानवों के छोड़े गए वाणों के संघर्ष से भयङ्कर अग्नि-ज्वाला निकलने लगी जिसको देखकर सारा संसार अकाल प्रलय की कल्पना करने लगा । चमचमाते अस्त्र-शस्त्रों को धारण करते वाली राक्षसों की सेना ऐसी जान पड़ती थी मानों बादलों से घिरी रात्रि चंचल बिजली की चमक से सुशोभित है । उस घोर संग्राम में दुर्दम राक्षसों से फेंके हुए पर्वतों को वे फुर्तीले देव अपने नाराचों से चूर-चूर कर देते थे ॥१८-२०॥ कुछ देवों ने अपने हाथियों द्वारा हाथियों को, रथों से रथों को और अश्वों से शत्रु के अश्वों की क्षति पहुँचाई । दूसरों ने अपनी गदाओं की मार से शत्रुओं को आहत किया । कुछ असुर परिघों की मार से रक्त के कीचड़ में गिर पड़ते थे और कुछ मर कर शीघ्र देव रूप धारण कर विमानों पर विहार करने लगते थे । उस

६७ दशमोऽध्यायः ॥२४॥ अथ दैत्याणाः क्रुद्धास्ताड्यमानाः सरैर्भृशम् । शस्त्रैर्बहुविधैर्दैवान्निजघ्नुरतिदारुणाः ॥२४॥ दृषद्भिर्भिन्दिपालैश्च खड्गैः परशुतोमरैः । परिघैश्छुरिकाभिश्च कुन्तैश्चक्रैश्च शङ्कुभिः ॥२५॥ मुसलैरङ्कुशैश्चैव लाङ्गलैः पट्टिशैस्तथा । शक्त्योपलैः शतघ्नीभिः पाशैश्च तलमुष्टिभिः ॥२६॥ शूलैर्नालीकनाराचैः क्षेपणीयैस्समुद्गरैः । रथाश्वनागपद्गैः सङ्कुलो ववृधे रणः ॥२७॥ देवाश्च विविधास्त्राणि दैतेयेभ्यः समाक्षिपन् । एवमब्दसहस्राणि युद्धमासीत्सुदारुणम् ॥२८॥ अथ दैत्यबले वृद्धे पराभूता दिवौकसः । सुरलोकं परित्यज्य सर्वे भीताः प्रदुद्रुवुः ॥२९॥ नररूपपरिच्छन्ना विचेरुरवनीतले । वैरोचनिस्तुभुवनं नारायणपरायणः ॥३०॥ बुभुजेऽव्याहतैश्वर्यप्रवृद्धश्रीर्महाबलः । इयाज चाश्वमेधैः स विष्णुप्रीणनतत्परः ॥३१॥ इन्द्रत्वं चाकरोत्स्वर्गे दिक्पालत्वं तथैव च । देवानां प्रीणनार्थाय यैः क्रियन्ते द्विजैर्मखाः ॥३२॥ तेषु यज्ञेषु सर्वेषु हविर्भुङ्क्ते स दैत्यराट् । अदितिः स्वात्मजान्वीक्ष्य देवमातातिदुःखिता ॥३३॥ वृथात्र निवसामीति मत्वागाद्धिमवद्गिरिम् । शक्रस्यैश्वर्यमिच्छन्ती दैत्यानां च पराजयम् ॥३४॥ हरिध्यानपरा भूत्वा तपस्तेपेऽतिदुष्करम् । किंचित्कालं समासीना तिष्ठंती च ततः परम् ॥३५॥ पादेनैकेन सुचिरं ततः पादाग्रमात्रतः । कंचित्कालं फलाहारा ततः शीर्णदलाशना ॥३६॥ ततो जलाशना वायुभोजनाहारवर्जिता । सच्चिदानन्दसन्दोहं ध्यायत्यात्मानमात्मना ॥३७॥ दिव्याब्दानां सहस्रं सा तपोऽतप्यत नारद । दुरन्तं तत्तपः श्रुत्वा दैतेया मथिनोऽदितिम् ॥३८॥

समय युद्ध में देवताओं से जो राक्षस मारे जाते थे वे स्वयं देवता बनकर राक्षसों पर आक्रमण करते थे । जब असुर गण इस प्रकार देवों से बुरी तरह आहत होने लगे तब क्रुद्ध हो गए और बड़ी निष्ठुरता से विभिन्न शस्त्रों से देवों पर प्रहार करने लगे ।२१-२४॥ वह देवासुर-संग्राम पत्थरों की वर्षा से, भिन्दिपाल, खड्ग, परशु, तोमर, परिध, छुरिका, भालों, चक्र, शंकु, मुशल, अंकुश, लांगूल, पट्टिश, वेग से पत्थरों की वर्षा करने वाले यन्त्रों, शतघ्नी (तोप) पाश, तलमुष्टि, (?), शूल, नाराच, और फेंके जाने वाले मुद्गरों के प्रहार से रथ, अश्व, हाथी और पैदल सैनिकों की घोर, भयङ्कर मार-काट से अत्यन्त भयानक हो गया । देवों ने भी विविध अस्त्रों के प्रहार से राक्षसों को व्याकुल कर दिया । इस प्रकार वह महाभयङ्कर संग्राम एक हजार वर्षों तक चलता रहा ॥२५-२८॥ अन्त में दैत्यों की सेना प्रबल हो गई, देवगण पराजित हो गए, सभी देवता देवलोक छोड़कर इधर-उधर डर कर भाग निकले, मनुष्यों का रूप धारण कर पृथ्वी पर भटकने लगे । नारायण भक्त वैरोचन बलि अपने अमित ऐश्वर्य और सतत श्री वृद्धि का उपयोग करने लगा । विष्णु की उपासना में सर्वदा सचेष्ट रहने वाले उस असुर ने अनेक अश्वमेध यज्ञ किए । उसने स्वर्ग में इन्द्र का अधिकार इसी प्रकार दिक्पालों का भी अधिकार भी प्राप्त कर लिया । ब्राह्मण गण देवों की प्रीति के लिए जिन-जिन यज्ञों को करते थे उनमें वह स्वयं जाकर हवि ग्रहण करता था । देव माता अदिति अपने पुत्रों को अति दीन-दशा देख कर अति दुःखी हो गई ॥२९-३३॥ मैं व्यर्थ ही यहाँ दिन बिता रही हूँ, यह सोचकर वह हिमालय पर्वत की ओर चली गई । वहाँ जाकर अपने पुत्र इन्द्र की विभव कामना और दैत्यों के पराजय की इच्छा से भगवान् की सेवा में तल्लीन हो कठोर तप करने लगी । कुछ समय तक बैठकर पुनः खड़ी होकर, कुछ समय तक एक पैर पर स्थित होकर और कुछ समय पैर की अंगुलियों के सहारे खड़ी होकर तपस्या की । इसी प्रकार कुछ समय तक फलाहार कर तत्पश्चात् गिरी हुई सूखी पत्तियों पुनः जल और केवल वायु का ही आहार कर अपनी तपस्या को और कठिन कर दिया । नारद ! आनन्दमय सच्चिदानन्द का अपने अन्तःकरण में ध्यान करती हुई उस देव-जननी ने एक सहस्र दिव्य वर्ष बिता दिये । अदिति के उस घोर तप का पता पाकर मायावी दैत्यों ने देवता का रूप बनाकर बलि के कहे हुए शब्दों

६८ नारदीयपुराणम् देवतारूपमास्थाय संप्रोचुर्बलिनोदिताः । किमर्थं तप्यते मातः शरीरपरिशोषणम् ॥३८॥ यदि जानन्ति दैतेया महद्दुःखं ततो भवेत् । त्यजेदं दुःखबहुलं कायशोषणकारणम् ॥३९॥ प्रयाससाध्यं सुकृतं न प्रशंसन्ति पण्डिताः । शरीरं यत्नतो रक्ष्यं धर्मसाधनतत्परैः ॥४०॥ ये शरीरमुपेक्षन्ते ते स्युरात्मविघातिनः । सुखं त्वं तिष्ठ सुभगे पुत्रानस्मान्न खेदय ॥४१॥ मात्रा हीना जना मातर्मृतप्राया न संशयः । गावो वा पशवो वापि यत्र गावो महीरुहाः ॥४२॥ न लभन्ते सुखं किंचिन्मात्रा हीना मृतोपमाः । दरिद्रो वापि रोगी वा देशान्तरगतोऽपि वा ॥४३॥ मातृदर्शनमात्रेण लभते परमां मुदम् । अन्ने वा सलिले वापि धनादौ वा प्रियासु च ॥४४॥ कदाचिद्विमुखो याति जनो मातरि कोऽपि न । यस्य माता गृहे नास्ति यत्न धर्मपरायणा साध्वी च स्त्री पतिप्राणा गन्तव्यं तेन वै वनम् ॥४६॥ धर्मश्च नारायणभक्तिहीनो धनं च सद्भोगविवर्जितं हि । गृहं च भार्यातनयैर्विहीनं यथा तथा मातर्विहीनमर्त्यः ॥४७॥ तस्माद्देवि परित्राहि दुःखार्तानात्मजांस्तव । इत्युक्ताप्यदितिर्दैत्यैर्न चचाल समाधितः ॥४८॥ एवमुक्तवासुराः सर्वे हरिध्यानपरायणाम् । निरीक्ष्य क्रोधसंयुक्ता हन्तुं चक्रुर्मनोरथम् ॥४९॥ कल्पान्तमेघनिर्घोषाः क्रोधसंरक्तलोचनाः । दंष्ट्राग्रैरसृजन्वह्निं सोऽदहत्काननं क्षणात् ॥५०॥ शतयोजनविस्तीर्णं नानाजीवसमाकुलम् । तेनैव दग्धा दैतेया ये प्रधर्षयितुं गताः ॥५१॥ में कहा--हे माता ! शरीर को सुखा देने वाले इस तप को क्यों कर रही हो ॥३४-३६॥ यदि दैत्य इस रहस्य को जान जायेंगे तब तो और अधिक कष्ट होगा। इस कष्टसाध्य और काय को क्लेश पहुँचाने वाले दुःखकर तप को छोड़ दो। पण्डित जन कष्टसाध्य पुण्य कर्म की प्रशंसा नहीं करते । धर्म साधना में तत्पर रहने वाले मनुष्यों को इस शरीर को बड़े यत्न से रक्षा करनी चाहिए ॥४०-४१॥ जो अपने शरीर को इस प्रकार कष्ट देते हैं वे आत्मघाती कहे जाते हैं। सुशीले ! तुम सुख पूर्वक रहो अपने पुत्रों को इस घोर तपस्या से खिन्न मत करो । माता ! मातृ हीन मनुष्य मरे हुए के समान है इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । गायें हों या पशु हों वे पशुओं तथा घास से युक्त स्थान में रह कर भी मातृ हीन होने पर मृतक तुल्य हैं तथा कुछ भी सुख नहीं पाते हैं । दरिद्र, रोगी अथवा विदेश गया हुआ पुत्र केवल अपनी माता का दर्शन पाकर ही परम आनन्द प्राप्त करता है । कदाचित् कोई मनुष्य अन्न, जल, धन आदि अथवा स्त्री की ओर से भी विमुख हो जाता है ॥४२-४५॥ परन्तु माता से विमुख होने वाला सम्भवतः कोई भी नहीं देखा जाता । जिसके घर में धर्म परायण माता और पतिव्रता साध्वी स्त्री न हो उसको घर छोड़कर वन चला जाना चाहिए । नारायण की भक्ति के बिना धर्म, सत्कार्य में न व्यय किये गये धन और स्त्री पुत्र से रहित घर की जो मर्यादा है वही मातृहीन व्यक्ति की है । देवि ! इसलिए अपने शोक और दुःख से व्याकुल पुत्रों की रक्षा करो, दैत्यों के इस कूट वचन को सुनकर भी अदिति अपनी समाधि से विचलित नहीं हुई ॥४६-४८॥ अपने को विफल देखकर वे राक्षस क्रुद्ध हो गए, और विष्णु के ध्यान में मग्न अदिति को मारने के लिए उद्यत हो गए । उनके लोचन क्रोध से रक्त हो गए और प्रलय कालीन मेघ के समान वे भयङ्कर चीत्कार करने लगे, उनके भयङ्कर दांतों से अग्नि की ज्वाला निकल पड़ी जिससे वह सारा शत-योजन विस्तीर्ण और अनेक जीवों से व्याप्त कानन क्षणभर में जलकर भस्म हो गया । उसी अग्नि से वे दैत्य भी, जो कि अदिति को हानि पहुँचाने आये हुए थे, जलकर भस्म हो गए । सौ देव वर्षों से अच्युत के ध्यान

वर्णनन्नाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥

एकादशोऽध्यायः ६१ सैवावशिष्टा जननी सुराणामन्वाच्छतादच्युतसक्तचित्ता । संरक्षिता विष्णुसुदर्शनेन दैत्यान्तकेन स्वजनानुकम्पिना ॥५२॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे गङ्गोत्पत्तौ बलिकृतदेवपराजय- वर्णनन्नाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥

एकादशोऽध्यायः नारद उवाच अहो ह्यत्यद्भुतं प्रोक्तं त्वया भ्रातरिहं मम । स वह्निरदितिं मुक्त्वा कथं तानदहत्क्षणात् ॥१॥ वदादितेर्महासत्त्वं विशेषाश्चर्यकारणम् । परोपदेशनिरताः सज्जना हि मुनीश्वराः ॥२॥ सनक उवाच शृणु नारद माहात्म्यं हरिभक्तिरतात्मनाम् । हरिध्यानपरान्साधूनकः समर्थः प्रबाधितुम् ॥३॥ हरिभक्तिपरो यत्र तत्र ब्रह्मा हरिः शिवः । देवाः सिद्धा मुनेशाश्च नित्यं तिष्ठन्ति सत्तमाः ॥४॥ हरिरास्ते महाभाग हृदये शान्तचेतसाम् । हरिनाम्पराणां च किमु ध्यानरतात्मनाम् ॥५॥ शिवपूजारतो वाऽपि विष्णुपूजापरोऽपि वा । यत्र तिष्ठति तत्रैव लक्ष्मीः सर्वाश्च देवताः ॥६॥

में लगी रहने वाली केवल जननी अदिति ही केवल, अपने भक्तों पर कृपा दृष्टि रखने वाले, दैत्य संहारक विष्णु के सुदर्शन की कृपा से रक्षित होने के कारण बच गई ॥४६-५२॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वभाग- प्रथम पाद में गंगोत्पत्ति के प्रसंग में बलि-कृत देव-पराजय वर्णन नामक दसवाँ अध्याय समाप्त ॥१०॥

अध्याय ११ गङ्गोत्पत्ति-वर्णन नारद बोले- भाई ! तुमने तो अत्यन्त आश्चर्यजनक यह आख्यान सुनाया। उस अग्नि ने कैसे अदिति को छोड़कर सब को क्षण भर में जला दिया ? अदिति के आश्चर्य चकित कर देने वाले उस महा तेज और प्रभाव का वर्णन करो, क्योंकि मुनीश्वर सर्वदा दूसरों को उपदेश देने में ही निरत होते हैं ॥१॥ सनक बोले- नारद ! हरि-भक्ति में सर्वदा लीन रहने वाले भक्तों की महिमा सुनो। हरि के ध्यान में मग्न रहने वाले साधुओं को कौन कष्ट देने का साहस कर सकता है ? जहाँ हरिभक्त रहते हैं वहाँ ब्रह्मा, विष्णु, शिव, देवगण, सिद्ध मुनीश्वर, श्रेष्ठ जीव सर्वदा विराजमान रहते हैं। महाभाग ! परमशान्त, हरिनास-परायण भक्तों के हृदय में भगवान् सर्वदा विराजमान रहते हैं, तो पुनः हरि ध्यान में निमग्न रहने वाले योगो भक्तों के विषय में तो कुछ कहना ही नहीं। शिवपूजन में रत रहने वाले विष्णु की पूजा में लीन रहने वाले भक्त जहाँ निवास करते हैं वहाँ साक्षात् लक्ष्मी और सब देवता सर्वदा निवास करते हैं ॥२-६॥ जहाँ विष्णु पूजा में तल्लीन

७० नारदीयपुराणम् यत्र पूजापरो विष्णोर्वह्निस्तत्र न बाधते । राजा वा तस्करो वापि व्याधयश्च न सन्ति हि ॥७॥ प्रेताः पिशाचाः कूष्माण्डग्रहा बालग्रहास्तथा । डाकिन्यो राक्षसाश्चैव न बाधन्तेऽच्युतार्चकम् ॥८॥ परपीडारता ये तु भूतवेतालकादयः । नश्यन्ति यत्र सद्‌भक्तो हरिलक्ष्म्यर्चने रतः ॥६॥ जितेन्द्रियः सर्वहितो धर्मकर्मपरायणः । यत्र तिष्ठति तत्रैव सर्वतीर्थानि देवताः ॥१०॥ निमिषं निमिषार्द्धं वा यत्र तिष्ठन्ति योगिनः । तत्रैव सर्वश्रेयांसि तत्तीर्थं तत्तपोवनम् ॥११॥ यन्नामोच्चारणादेव सर्वे नश्यन्त्युपद्रवाः । स्तोत्रैर्वाप्यर्हणाभिर्वा किमु ध्यानेन कथ्यते ॥१२॥ एवं तेनाग्निना विप्र दग्धं सासुरकाननम् । सादितिर्नैव दग्धाभूद्विष्णुचक्राभिरक्षिता ॥१३॥ ततः प्रसन्नवदनः पद्मपत्रायतेक्षणः । प्रादुरासीत्समीपेऽस्याः शङ्खचक्रगदाधरः ॥१४॥ ईषद्धास्यस्फुरद्दन्तप्रभाभासितदिङ्मुखः । स्पृशन्करेण पुण्येन प्राह कश्यपवल्लभाम् ॥१५॥ श्रीभगवानुवाच देवमातः प्रसन्नोऽस्मि तपसाराधितस्त्वया । चिरं श्रान्तासि भद्रं ते भविष्यति न संशयः ॥१६॥ वरं वरय दास्यामि यत्ते मनसि रोचते । मा भैर्भद्रे महाभागे ध्रुवं श्रेयो भविष्यति ॥१७॥ इत्युक्ता देवमाता सा देवदेवेन चक्रिणा । तुष्टाव प्रणिपत्यैनं सर्वलोकसुखावहम् ॥१८॥ अदितिरुवाच नमस्ते देवदेवेश सर्वव्यापिञ्जनार्दन । सत्त्वादिगुणभेदेन लोकव्यापारकारण ॥१९॥ रहने वाले भक्त रहते हैं वहाँ अग्नि किसी प्रकार की बाधा नहीं पहुँचा सकते । राजा, चोर अथवा व्याधियाँ उसका बाल भी बाँका नहीं कर सकते; प्रेत, पिशाच, डाकिनी, कूष्माण्डग्रह (दुष्टग्रह) बाल ग्रह और राक्षस आदि उस विष्णु भक्त की छाया का भी स्पर्श नहीं कर सकते । पर पीड़ा में आसक्त रहने वाले भूत, वेताल आदि वहाँ जाकर स्वयं भस्म हो जाते हैं जहाँ विष्णु भक्ति में तत्पर रहने वाले भक्त विद्यमान रहते हैं । जितेन्द्रिय सबका मङ्गल करने वाले और धर्म, सत्कर्म आदि में लीन रहने वाले महात्मा जहाँ रहते हैं वहाँ सब देवता और तीर्थ स्वयं आकर निवास करते हैं ॥३-११॥ एक पल अथवा उसके आधे समय तक जहाँ योगीजन निवास करते हैं वहीं सभी तीर्थ और अखिल कल्याण आ जाते हैं एवं वही पुनीत तपोवन हो जाता है । जिसके मात्र नामोच्चारण स्तोत्र पाठ अथवा पूजादिसे सभी उपद्रव नष्ट हो जाते हैं, उसके ध्यान की महिमा का क्या वर्णन किया जाय ? इस कारण उस अग्नि से असुरों के सहित सारा कानन भस्महो गया, परन्तु वह अदिति पूर्णतया सुरक्षित रही । क्योंकि विष्णु का सुदर्शन उसकी रक्षा के लिए उद्यत था ॥१२-१३॥ उसकी घोर तपस्या को देखकर पद्मलोचन शङ्ख-चक्र-गदाधारी भगवान् प्रसन्नता पूर्वक वहाँ उस जननी अदिति के सम्मुख प्रत्यक्ष हुए । उनके मन्द हास्य से खुली दन्तपंक्ति की प्रभा से सारा दिङ्मण्डल प्रकाशित हो गया, अपने पुनीत करों से देवमाता कश्यपपत्नी का स्पर्श करते हुए बोले ॥१४-१५॥ श्री भगवान् बोले-देवमाता ! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ, तुम बहुत श्रान्त हो गई हो, निःसन्देह तुम्हारा कल्याण होगा । तुम्हारी जो इच्छा हो, माँगो । भद्रे ! डरो मत, महाभागे ! निश्चित रूप से तुम्हारा कल्याण होगा । देवाधिदेव, चक्री विष्णु की इतनी सान्त्वना पाकर अदिति अखिल लोक को सुखो करने वाले भगवान् के चरणों में गिर पड़ी और स्तुति करने लगी ॥१४-१८॥ अदिति बोली-देवदेवेश ! सर्वव्यापी ! जनार्दन ! आपको नमस्कार है, सत्त्व आदि त्रिगुण भेद से लोक

७१ एकादशोऽध्यायः नमस्ते बहुरूपायारूपाय च महात्मने । सर्वैकरूपरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने ॥२०॥ नमस्ते लोकनाथाय परमज्ञानरूपिणे । सद्‌भक्तजनवात्सल्यशालिने मङ्गलात्मने ॥२१॥ यस्यावताररूपाणि ह्यर्चयन्ति मुनीश्वराः । तमादिपुरुषं देवं नमामि ह्यर्थसिद्धये ॥२२॥ श्रुतयो यं न जानन्ति न जानन्ति च सुरयः । ते नमामि जगद्धेतुं समायं चाप्यमायिनम् ॥२३॥ यस्यावलोकनं चित्रं मायोपद्रवकारणम् । जगद्रूपं जगद्धेतुं तं वन्दे सर्ववन्दितम् ॥२४॥ यत्पादाम्बुजकिञ्जल्कसेवारक्षितमस्तकाः । अवापुः परमां सिद्धिं तं वन्दे कमलाधवम् ॥२५॥ यस्य ब्रह्मादयो देवा महिमानं न वै विदुः । अत्यासन्नं च भक्तानां तं वन्दे भक्तसंगिनम् ॥२६॥ यो देवस्त्यक्तसङ्गानां शान्तानां करुणार्णवः । करोति ह्यात्मनः सङ्गं तं देवं सङ्गवर्जितम् ॥२७॥ यज्ञेश्वरं यज्ञकर्म यज्ञकर्मसुनिष्ठितम् । नमामि यज्ञफलदं यज्ञकर्मप्रबोधकम् ॥२८॥ अजामिलोऽपि पापात्मा यन्नामोच्चारणादनु । प्राप्तवान्परमं धाम तं वन्दे लोकसाक्षिणम् ॥२९॥ हरिरूपी महादेवः शिवरूपी जनार्दनः । इति लोकस्य नेता यस्तं नमामि जगद्गुरुम् ॥३०॥ ब्रह्माद्या अपि देवेशा यन्मायापाशयन्त्रिताः । न जानन्ति परं भावं तं वन्दे सर्वनायकम् ॥३१॥ हृत्पद्मस्थोऽपि योग्यानां दूरस्थ इव भासते । प्रमाणातीतसद्भावस्तं वन्दे ज्ञानसाक्षिणम् ॥३२॥ यन्मुखाद्ब्राह्मणो जातो बाहुभ्यां क्षत्रियोऽजनि । ऊर्वोर्वैश्यः समुत्पन्नः पद्भ्यां शूद्रोऽभ्यजायत ॥३३॥ मनसश्चन्द्रमा जातो जातः सूर्यश्च चक्षुषः । मुखादग्निश्चेन्द्रश्च प्राणाद्वायुरजायत ॥३४॥ सृष्टि के आदि कारण ! नमस्कार है । बहुरूप, अरूप और महात्मा को नमस्कार करती हूँ सबमें एक रूप से रहने वाले, निर्गुण और सगुण भगवान् को नमस्कार है । लोकस्वामी, परमज्ञानरूपी, सद्‌भक्तों पर वात्सल्य भाव रखने वाले, मंगलग्रूप को नमस्कार है । जिनके अवतार रूपों की मुनीश्वर अर्चना करते हैं उस आदि पुरुष देव को अपनी मनोरथ सिद्धि के लिए नमस्कार करती हूँ । जिसको, श्रुतियां और विद्वान् मनुष्य नहीं जान पाते हैं, उस जगत् के आदि कारण, माया युक्त और पुनरपि माया रहित देव को नमस्कार है । जिसका अवलोकन माया के उपद्रव को शान्त करने का कारण है, उस सर्वज्ञ, और सर्वज्ञेय, जगद्रूप और जगदादिकारण को नमस्कार करती हूँ ।।१६-२४।। जिसके चरण कमल के पराग की सेवा में सर्वदा शिर-झुकाये रहने वाले अतएव रक्षित भक्तजनों ने परम सिद्धि को प्राप्त किया उस कमलापति को नमस्कार है । जिसकी महिमा को ब्रह्मा आदि देवगण भी न जान सके उसी भक्तरक्षक और भक्तों के अति निकट रहने वाले भक्त वत्सल को नमस्कार है । जो करुणासागर देवता शान्त और संसार से सर्वथा दूर रहने वाले जनों से अपना संपर्क स्थापित करता है उस अनासक्त देव को नमस्कार है ।।२६-२७।। उस यज्ञेश्वर, यज्ञकर्म और यज्ञकार्य में अपनी निष्ठा रखने वाले, यज्ञफल दाता और यज्ञकर्मों को प्रेरणा प्रदान करने वाले देव को नमस्कार करती हूँ । पापात्मा अजामिल भी जिसके नामोच्चारण मात्र से तत्काल परम पद को प्राप्त हो गया, उस लोक-साक्षी की वन्दना करती हूँ, जो हरि रूपी महादेव और शिवरूपी जनार्दन अपने अद्वैत भाव से लोक के अग्रणी हैं उन जगद्गुरु को नमस्कार करती हूँ । ब्रह्मा आदि देव प्रभु भी जिस माया पति के माया-पाश में बँध कर उसके परम रूप को नहीं जान पाते हैं उस अखिल-जीव-नायक की वन्दना करती हूँ, जो हृदय कमल में रहता हुआ भी योगिजनों की दृष्टि में दूरस्थ की भांति दीख पड़ता है जिसकी स्थिति या सद्भाव को प्रमाणों द्वारा भी सिद्ध नहीं किया जा सकता है । तथा उस ज्ञान साक्षी की वन्दना करती हूँ, जिसके मुख से ब्राह्मण और बाहुओं से क्षत्रिय उत्पन्न हुए, ऊरु से वैश्य और चरणों से शूद्रों की उत्पत्ति हुई ।।२८-३३।। मन से चन्द्रमा और चक्षु से सूर्य, मुख से अग्नि तथा इन्द्र और प्राण से वायु की उत्पत्ति हुई,

७२ नारदीयपुराणम् ऋग्यजुः सामरूपाय सत्यस्वरगतात्मने । षडङ्गरूपिणे तुभ्यं भूयोभूयो नमो नमः ॥३५॥ त्वमिन्द्रः पवनः सोमस्त्वमीशानस्त्वमन्तकः । त्वमग्निर्निऋतिश्चैव वरुणस्त्वं दिवाकरः ॥३६॥ देवाश्च स्थावराश्चैव पिशाचाश्चैव राक्षसाः । गिरयः सिद्धगंधर्वा नद्यो भूमिश्च सागराः ॥३७॥ त्वमेव जगतामीशो यत्रासि त्वं परात्परः । त्वद्रूपमखिलं देव तस्मान्नित्यं नमोऽस्तु ते ॥३८॥ अनाथनाथसर्वज्ञ भूतदेवेन्द्रविग्रह । दैत्यैर्बाधितान्पुत्रान्मम पाहि जनार्दन ॥३६॥ इति स्तुत्वा देवमाता देवं नत्वा पुनः पुनः । उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा हर्षाश्रुक्षालितस्तनी ॥४०॥ अनुग्राह्यास्मि देवेश त्वया सर्वादिकारण । अकण्टकां श्रियं देहि मत्सुतानां दिवौकसाम् ॥४१॥ अन्तर्यामिञ्जगद्रूप सर्वज्ञ परमेश्वर । अज्ञातं किं तव श्रीश किं मामीहयसि प्रभो ॥४२॥ तथापि तव वक्ष्यामि यन्मे मनसि रोचते । वृथापुत्रास्मि देवेश दैत्यैः परिपीडिता ॥४३॥ तान्न हिंसितुमिच्छामि यस्ततेऽपि सुता मम । तानहत्वा श्रियं देहि मत्सुतेभ्यः सुरेश्वर ॥४४॥ इत्युक्तो देवेदेवेशः पुनः प्रीतिमुपागतः । उवाच हर्षयन्विप्र देवमातरमादरात् ॥४५॥ श्रीभगवानुवाच प्रीतोऽस्मि देवि भद्रं ते भविष्यामि सुतो ह्यहम् । यतः सपत्निपुत्रेषु वात्सल्यं देवि दुर्लभम् ॥४६॥ त्वया तु यत्कृतं स्तोत्रं तत्पठन्ति नरास्तु ये । तेषां संपद्वरा पुत्रा न हीयन्ते कदाचन ॥४७॥ स्वात्मजे वान्यपुत्रे वा यः समत्वेन वर्तते । न तस्य पुत्रशोकः स्यादेष धर्मः सनातनः ॥४८॥

उस ऋक् यजु और सामरूप, सत्य स्वर को प्राप्त आत्मावाले षडङ्ग ब्रह्म को बार बार नमस्कार है। तुम इन्द्र हो, पवन, ईशान, सोम और यम हो, तुम अग्नि, निर्ऋति, वरुण और दिवाकर भी हो, देव, स्थावर, पिशाच राक्षस, गिरि सिद्ध, गन्धर्व, नदियाँ, भूमि, सागर आदि तुम्हीं हो ॥३४-३७॥ समस्त जगत् के ईश और परात्पर ब्रह्म भी तुम्हीं हो। देव ! यह समस्त जगत् तुम्हारा ही रूप है, इसलिए तुमको सतत नमस्कार है। अनाथों के नाथ ! सर्वज्ञ ! सब प्राणियों और देवेन्द्र के रूप में रहने वाले ! जनार्दन ! दैत्यों से पीड़ित मेरे पुत्रों की रक्षा करो । । ३८-३६॥ देवमाता ने इस प्रकार भगवान् की स्तुति की और बार बार भगवान् को प्रणाम किया । फिर हाथ जोड़कर आनन्दाश्रु से अपने हृदय को धोती हुई वह बोली- देवेश ! सबके आदि कारण ! इस समय तुम्हारे अनुग्रह का एकमात्र पात्र मैं हूँ, मेरे स्वर्गस्थ पुत्रों (देवों) को अक्षय श्री प्रदान करो । जगद्रूप ! सर्वज्ञ ! परमेश्वर ! श्रीश ! तुमसे कौन सा रहस्य अज्ञात है ? अतः प्रभो ! तुम मुझसे क्या पूछ रहे हो ? तथापि मेरे मन को जो अच्छा लग रहा है, उसको कह रही हूँ। देवेश ! इस समय मैं दैत्यों से पीड़ित पुत्रों की माता हूँ, जिनकी शक्ति व्यर्थ सी हो गई है । उन दैत्यों का वध नहीं चाहती क्योंकि वे भी मेरे पुत्र हैं; परन्तु उनकी हिंसा न करते हुए भी आप मेरे पुत्रों को ऐश्वर्य और इन्द्र पद प्रदान कीजिए। देवदेवेश इतनी बातें सुनकर पुनः और अधिक प्रसन्न हो गए । विप्रनारद ! तब वे आदर पूर्वक देवमाता का हर्ष बढ़ाते हुए बोले ॥४०-४५॥ श्री भगवान् बोले-- देवि ! मैं तुम पर प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण होगा। तुम्हारा सौत के पुत्रों पर भी अनुपम वात्सल्य है, अतः मैं स्वयं तुम्हारा पुत्र बनूँगा । तुमने जिस स्तोत्र से मेरा स्तवन किया है उस स्तोत्र को जो मनुष्य पढ़ेंगे उनकी भी श्रेष्ठ सम्पत्ति और सन्तति का क्षय कभी भी नहीं होगा। जो अपने और दूसरे के पुत्रों पर समान भाव रखता है उसको कभी भी पुत्रशोक नहीं होता, यह एक सनातन नियम है ॥४६-४८॥

दशमोऽध्यायः ७३ अदितिरुवाच नाहं वोढुं क्षमा देव त्वामाद्यं पुरुषं परम् । असंख्याताण्डरोमाणं सर्वेशं सर्वकारणम् ॥४६॥ यत्प्रभावं न जानन्ति श्रुतयः सर्वदेवताः । तमहं देवदेवेशं धारयामि कथं प्रभो ॥५०॥ अणोरणीयांसमजं परात्परतरं प्रभुम् । धारयामि कथं देव त्वामहं पुरुषोत्तमम् ॥५१॥ महापातकयुक्तोऽपि यन्नामस्मृतिमात्रतः । मुच्यते स कथं देवो ग्राम्येषु जनिमर्हति ॥५२॥ यथा शूकरमत्स्याद्या अवतारास्तव प्रभो । तथायमपि को वेद तव विश्वेश ! चेष्टितम् ॥५३॥ त्वत्पादपद्मप्रणता त्वन्नामस्मृतितत्परा । त्वामेव चिंतये देव ! यथेच्छसि तथा कुरु ॥५४॥ सनक उवाच तयोक्तं वचनं श्रुत्वा देवदेवो जनार्दनः । दत्त्वाभयं देवमातुरिदं वचनमब्रवीत् ॥५५॥ श्रीभगवानुवाच सत्यमुक्तं महाभागे त्वया नास्त्यत्र संशयः । तथापि शृणु वक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतरं शुभे ॥५६॥ रागद्वेषविहीना ये मद्भक्ता मत्परायणाः । वहन्ति सततं ते मां गतासूया अदांभिकाः ॥५७॥ परोपतापविमुखाः] शिवभक्तिपरायणाः । मत्कथाश्रवणासक्ता वहन्ति सततं हि माम् ।५८॥ पतिव्रताः पतिप्राणाः पतिभक्तिपरायणाः । वहन्ति सततं देवि स्त्रियोऽपि त्यक्तमत्सराः ॥५९॥ मातापित्रोश्च शुश्रूषुर्गुरुभक्तोऽतिथिप्रियः । हितकृद्ब्राह्मणानां यः स मां वहति सर्वदा ॥६०॥ अदिति बोली--देव ! आदि, परम पुरुष तुमको मैं गर्भ में धारण करने में समर्थ नहीं हूँ। जिसके रोम-रोम में असंख्य ब्रह्माण्ड भूलते रहते, जो सर्वेश और सब का आदि कारण है, जिसकी महिमा को श्रुतियाँ और सब देवता नहीं जान पाते हैं, प्रभो ! उस देवदेवेश को मैं कैसे गर्भ में धारण कर सकती हूँ ? ॥४६-५०॥ देव ! अणु से भी अणुतम, अज, परात्पर, प्रभु और पुरुषोत्तम देव तुमको कैसे मैं धारण कर सकती हूँ ? जिसके नाम स्मरण मात्र से महापापों में फँसा प्राणी भी शीघ्र मुक्त हो जाता है वह आदि देव किस प्रकार मेरे समान ग्राम्य मानवी की कुक्षि से उत्पन्न हो सकता है ? प्रभो ! जिस प्रकार शूकर, मत्स्य (मछली) आदि तुम्हारे अन्य अवतार हुए हैं इसी प्रकार यह तुम्हारा कोई अवतार होगा ? भला तुम्हारे रहस्यमय व्यापार को कौन जान सकता है ? देव ! मैं तो केवल तुम्हारे चरण-कमलों में ही सर्वदा विनत रहने वाली, तुम्हारे नामों के रटने में ही लीन रहने वाली और सर्वदा तुम्हारा हो चिन्तन करने वाली एक किङ्करी हूँ, तुम्हारी जैसी इच्छा हो करो ॥५१-५४॥ सनक बोले-उसकी कही हुई बातों को सुनकर देवाधिदेव जनार्दन ने देवमाता को अभय वरदान दिया और कहा--॥५५॥ श्री भगवान् बोले--महाभाग्यशालिनि ! तुमने जो कुछ कहा सत्य है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । फिर भो शुभे ! सुनो, आज तुमको अत्यन्त रहस्यमय तत्त्व बता रहा हूँ । जो राग द्वेष से हीन मेरे भक्त, मुझमें ही विरत रहने वाले तथा ईर्ष्या और दंभ से रहित हैं, वे सर्वदा मुझको ढोते रहते हैं। दूसरों को पीड़ा न पहुँचाने वाले, शिव-भक्ति में अनन्य भाव रखने वाले और मेरी कथा में सर्वदा तल्लीन रहने वाले भक्त सर्वदा मुझको ढोते हैं । पतिव्रता, पतिप्रिया, पतिभक्ति को ही अपना सर्वस्व समझने वाली और ईर्ष्या से सर्वथा दूर रहने वाली स्त्रियां भी मुझको अपने हृदय में रखती है ॥५६-५६॥ माता पिता की सेवा करने वाला, गुरुभक्त, अतिथिसवो और ब्राह्मणों का हित करने वाला मनुष्य सर्वदा मुझको ढोता है । नित्य पुण्य तीर्थों में रत रहने वाला, सत्संग १०-नार०

७४ नारदीयपुराणम् पुण्यतीर्थरता नित्यं सत्सङ्गनिरतास्तथा । लोकानुग्रहशीलाश्च सततं ते वहन्ति माम् ॥६१॥ परोपकारनिरताः परद्रव्यपराङ्मुखाः । नपुंसकाः परस्त्रीषु ते वहन्ति च मां सदा ॥६२॥ तुलस्युपासनरताः सदा नामपरायणाः । गोरक्षणपरा ये च सततं मां वहन्ति ते ॥६३॥ प्रतिग्रहनिवृत्ता ये परान्नविमुखास्तथा । अन्नोदकप्रदातारो वहन्ति सततं हि माम् ॥६४॥ त्वं तु देवि ! पतिप्राणा साध्वी भूतहिते रता । संप्राप्य पुत्रभावं ते साधयिष्ये मनोरथम् ॥६५॥ इत्युक्त्वा देवदेवेशो ह्रार्दित देवमातरम् । दत्त्वा कण्ठगतां मालामभयं च तिरोदधे ॥६६॥ सा तु संहृष्टमनसा देवसुदर्शनन्दिनी । प्रणम्य कमलाकान्तं पुनः स्वस्थानमाव्रजत् ॥६७॥ ततोऽदितिर्महाभागा सुप्रीता लोकवन्दिता । असूत समये पुत्रं सर्वलोकनमस्कृतम् ॥६८॥ शङ्खचक्रधरं शान्तं चन्द्रमण्डलमध्यगम् । सुधाकलशदध्यन्नकरं वामनसंज्ञितम् ॥६९॥ सहस्रादित्यसंकाशं व्याकोशकमलेक्षणम् । सर्वाभरणसंयुक्तं पीताम्बरधरं हरिम् ॥७०॥ स्तुत्यं मुनिगणैर्युक्तं सर्वलोकैकनायकम् । आविर्भूतं हरिं ज्ञात्वा कश्यपो हर्षविह्वलः । प्रणम्य प्राञ्जलिर्भूत्वा स्तोतुं समुपचक्रमे ॥७१॥ कश्यप उवाच नमो नमस्तेऽखिलकारणाय नमोनमस्तेऽखिलपालकाय । नमो नमस्तेऽमरनायकाय नमो नमो दैत्यविनाशनाय ॥७२॥ नमो नमो भक्तजनप्रियाय नमोनमः सज्जनरंजिताय । नमो नमो दुर्जननाशनाय नमोऽस्तु तस्मै जगदीशवराय ॥७३॥ में लगातार रहने वाला और सर्वदा लोक पर अनुग्रह करने वाला व्यक्ति मुझको अपने हृदय में ढोता रहता है। परोपकार-परायण, पर की थोड़ी भी आकांक्षा न रखने वाले और परस्त्री के प्रति नपुंसक-सा व्यवहार करने वाले मुझे सर्वदा ढोते हैं ॥६०-६२॥ तुलसी की उपासना में सर्वदा लगे रहने वाले हरिनाम का उच्चारण करने वाले और गोरक्षक सर्वदा मुझको ढोते रहते हैं। जो दान लेने का नाम तक नहीं लेते, जो दूसरों के दिये अन्न की इच्छा नहीं रखते और जो स्वयं अन्न और जल का दान करते हैं वे सर्वदा मुझको ढोते रहते हैं ॥६३-६४॥ देवि ! तुम तो पतिव्रता, साध्वी और सब प्राणियों के हित में निरत रहने वाली हो मैं तुम्हारा पुत्र बनकर तुम्हारे सब मनोरथों को पूर्ण करूँगा ॥६५॥ देवदेवेश ने देवमाता अदिति से इस प्रकार कहकर अपने कंठ की माला उसको दे दी और अभय वरदान देकर स्वयं अन्तर्हित हो गए। वह देव-जननी, दक्षकन्या अदिति प्रसन्न मन से कमलापति को प्रणाम कर अपने स्थान पर लौट आई ॥६६-६७॥ तदन्तर अनुकूल समय पर महाभागशालिनी, प्रसन्नवदना और लोकपूज्या अदिति ने सबलोकों से वन्दित, शंखचक्रधारी, शान्त, चन्द्रमण्डल (प्रभामण्डल) से आवृत्त, सुधा कलश एवं दधि मिश्रित अन्न हाथ में लिये हुए वामन नामक पुत्र को उत्पन्न किया जो सहस्रसूर्य के समान तेजस्वी, विकसित कमल के समान नेत्र वाला सब प्रकार के आभूषणों से सुशोभित, पीताम्बरधारी, मुनि- गणों से वन्द्य और सब लोकों के नायक स्वयं हरि थे । भगवान् को अपने पुत्ररूप में प्रकट हुए देखकर महात्मा कश्यप ने आनन्द विभोर हो प्रणाम किया और हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे ॥६८-७१॥ कश्यप बोले—अखिल जगत के कारण हरि को नमस्कार है । अखिल लोक के पालक को बार-बार नमस्कार करते हैं । देवेश, दैत्य-विनाशक को नमस्कार है । भक्त जनों के प्रिय को नमस्कार है । सज्जन को सुख

नमोऽस्तु सूर्याद्यमितप्रभाय नमो नमः पुण्यकथागताय ॥७५॥

७५ दशमोऽध्यायः नमो नमः कारणवामनाय नारायणायामितविक्रमाय । सशार्ङ्गचक्रासिगदाधराय नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय ॥७४॥ नमः पथोराशिनिवासनाय नमोऽस्तु सद्धृत्कमलस्थिताय । नमोऽस्तु सूर्याद्यमितप्रभाय नमो नमः पुण्यकथागताय ॥७५॥ नमो नमोऽर्केन्दुविलोचनाय नमोऽस्तु ते यज्ञफलप्रदाय । नमोऽस्तु यज्ञाङ्गविराजिताय नमोऽस्तु ते सज्जनवल्लभाय ॥७६॥ नमो जगत्कारणकारणाय नमोस्तु शब्दादिविवर्जिताय । नमोऽस्तु ते दिव्यसुखप्रदाय नमो नमो भक्तमनोगताय ॥७७॥ नमोऽस्तु ते ध्वान्तविनाशकाय नमोऽस्तु ते मन्दरधारकाय । नमोऽस्तु ते यज्ञवराहनाम्ने नमो हिरण्याक्षविदारकाय ॥७८॥ नमोऽस्तु ते वामनरूपभाजे नमोऽस्तु ते क्षत्रकुलान्तकाय । नमोऽस्तु ते रावणमर्दनाय नमोऽस्तु ते नन्दसुताग्रजाय ॥७९॥ नमस्ते कमलाकान्त नमस्ते सुखदायिने । स्मृतार्तिनाशिने तुभ्यं भूयो भूयो नमो नमः ॥८०॥ यज्ञेश यज्ञविन्यास यज्ञविघ्नविनाशन । यज्ञरूप यज्ञद्रूप यज्ञाङ्ग त्वां यजाम्यहम् ॥८१॥ इति स्तुतः स देवेशो वामनो लोकपावनः । उवाच प्रहसन्हर्षं वर्द्धयन्कश्यपस्य सः ॥८२॥ श्रीभगवानुवाच तात तुष्टोऽस्मि भद्रं ते भविष्यति सुरार्चित ! । अचिरात्साधयिष्यामि निखिलं त्वन्मनोरथम् ॥८३॥


देने वाले को नमस्कार है । दुष्ट जनों के नाश करने वाले को बार-बार नमस्कार है। जगदीश्वर को नमस्कार करते हैं । जगत् के आदि कारण वामन को नमस्कार करते हैं । अमित विक्रम शील नारायण को नमस्कार है । धनुष के सहित चक्र, खङ्ग और गदा के धारण करने वाले को नमस्कार है । उस पुरुषोत्तम को नमस्कार है । ॥७४॥ अगाध जल राशि में निवास करने वाले को नमस्कार है । सज्जनों के हृदय-कमल में निवास करने वाले को नमस्कार है । सूर्य से भी अधिक प्रभावान् को नमस्कार है । पुण्य कथा स्थान पर सर्वदा निवास करने वाले को हमारा नमस्कार है । सूर्य और चन्द्र रूपी नेत्र वाले को नमस्कार करते हैं । यज्ञ फल को देने वाले तुमको हमारे असंख्य नमस्कार हैं । यज्ञांग से सुशोभित और सज्जनों के प्रिय को हम नमस्कार करते हैं । जगत् के आदि कारण के भी कारण को नमस्कार है । शब्दादि विषयों के अविष्य को नमस्कार है । स्वर्गीय सुखों के देने वाले तुमको हमारा नमस्कार है । भक्तों के मन में रहने वाले को नमस्कार है । अज्ञान तिमिर का नाश करने वाले तुमको नमस्कार है । मन्दराचल को धारण करने वाले कूर्म को नमस्कार है । यज्ञ वराह नाम से प्रसिद्ध, हिरण्याक्ष को विदीर्ण करने वाले को नमस्कार है ॥७२-७८॥ वामन रूप धारण करने वाले, क्षत्रिय कुल के विनाशक को नमस्कार है । रावण का मर्दन करने वाले को नमस्कार है । नन्द के पुत्र कृष्ण के अग्रज बलराम को नमस्कार है । कमलाकान्त ! तुमको नमस्कार है । सुखदाता को नमस्कार है । स्मरण मात्र से दुःखों को दूर कर देने वाले तुमको बार-बार नमस्कार है । यज्ञेश ! यज्ञविन्यास ! यज्ञविघ्नहर ! यज्ञरूप ! यज्ञविधि ! यज्ञांग ! तुम्हारी हम वन्दना कर रहे हैं । इस प्रकार कश्यप ने लोक पावन देवेश वामन की स्तुति की । यह सुनकर कश्यप के आनन्द को और बढ़ाते हुए वामन ने हंसकर कहा ॥७६-८२॥ श्री भगवान् बोले—तात ! मैं प्रसन्न हूँ, सुर पूजित ! आपका कल्याण होगा, आपके सब मनोरथों को

७६ नारदीयपुराणम् अहं जन्मद्वये त्वेवं युवयोः पुत्रतां गतः । अस्मिञ्जन्मन्यपि तथा साधयाम्युत्तमं सुखम् ॥८४॥ अत्रान्तरे बलिर्दैत्यो दीर्घसत्रं महामखम् । आरभे गुरुणा युक्तः काव्येन च मुनीश्वरैः ॥८५॥ तस्मिन्मखे समाहूतो विष्णुर्लक्ष्मीसमन्वितः । हविः स्वीकरणार्थाय ऋषिभिर्ब्रह्मवादिभिः ॥८६॥ प्रवृद्धैश्वर्यदैत्यस्य वर्त्तमाने महाक्रतौ । आमंत्र्य मातापितरौ स वटुर्वामनो ययौ ॥८७॥ स्मितेन मोहयँल्लोकं वामनो भक्तवत्सलः । हविर्भोक्तुमिवायातो बलेः प्रत्यक्षतो हरिः ॥८८॥ दुर्वृत्तो वा सुवृत्तो वा जडो वा पण्डितोऽपि वा । यो भक्तियुक्तस्तस्यान्तः सदा संनिहितो हरिः ॥८९॥ आयान्तं वामनं दृष्ट्वा ऋषयो ज्ञानचक्षुषः । ज्ञात्वा नारायणं देवमुद्ययुः सभ्यसंयुताः ॥९०॥ एतज्ज्ञात्वा दैत्यगुरुरेकांते बलिमब्रवीत् । स्वसारमविचार्यैव खलाः कार्याणि कुर्वते ॥९१॥ शुक्र उवाच भो भो दैत्यपते सौम्य ह्यपहर्त्ता तव श्रियम् । विष्णुर्वामनरूपेण ह्यदितेः पुत्रतां गतः ॥९२॥ तवाध्वरं स आयाति त्वया तस्यासुरेश्वर । न किंचिदपि दातव्यं मन्मतं शृणु पण्डित ॥९३॥ आत्मबुद्धिः सुखकरी गुरुबुद्धिर्विशेषतः । परबुद्धिर्विनाशाय स्त्रीबुद्धिः प्रलयंकरी ॥९४॥ शत्रूणां हितकृद्य॑स्तु स हन्तव्यो विशेषतः ॥९५॥ बलिरुवाच एवं गुरो न वक्तव्यं धर्ममार्गविरोधतः । यदादत्ते स्वयं विष्णुः किमस्मादधिकं वरम् ॥९६॥ कुर्वन्ति विदुषो यज्ञान्विष्णुप्रीणनकारणात् । स चेत्साक्षाद्धविर्भागी मत्तः कोऽप्यधिको भुवि ॥९७॥ मैं पूरा करूँगा। मैं इस प्रकार और दो जन्मों में आपका पुत्र बन चुका हूँ। इस जन्म में भी पूर्व की ही भाँति आपको उत्तम सुख प्रदान करूँगा। इसी बीच दैत्यराज बलि ने गुरु शुक्र और महामुनियों की सहायता से अधिक दिनों तक चलने वाला महायज्ञ प्रारम्भ किया। उस यज्ञ में लक्ष्मी के सहित विष्णु भी हवि ग्रहण करने के लिए ब्रह्मवादी ऋषियों द्वारा आवादित थे। अनेकों ऐश्वर्य-शाली राक्षसों से भरे हुए उस यज्ञ में माता-पिता की अनु- मति लेकर वटु वामन भी गये ॥८७॥ उस भक्तवत्सल वटु के मन्द हास्य से संसार मोहित हो गया। मानों बलि की हवि ग्रहण करने के लिए हरि स्वयं ही वहाँ आ गए। दुराचारी, सदाचारी, मूर्ख अथवा पंडित जो कोई भी हो उसको, भक्ति को देखकर भगवान् सर्वदा उसके समीप उपस्थित रहते हैं। ज्ञान-चक्षु ऋषियों ने साक्षात् नारायण को वामन रूप में वहाँ आते देखकर बड़े सम्मान के साथ उनका सत्कार किया। दैत्य-गुरु शुक्र इस रहस्य को ताड़ गए, उन्होंने एकान्त में बलि से कहा, क्योंकि दुष्ट जन अपनी शक्ति को समझे बिना ही कार्य करते हैं । ॥८८-९१॥ शुक्र बोले- दैत्यपते ! सौम्य ! तुम्हारी सम्पत्ति को अपहरण करने वाले विष्णु वामन के रूप में अदिति के पुत्र हुए हैं। असुरेश्वर ! वही तुम्हारे यज्ञ में आ रहे हैं, परन्तु उनको कुछ भी न देना। पंडित ! मेरे सुझाव को सुनो, अपना विवेक सुखकर होता है, किन्तु गुरु का उपदेश और भी कल्याणप्रद होता है। दूसरे की बुद्धि से काम करने वाला विनष्ट होता है और स्त्री की बुद्धि तो प्रलय मचा देती है। जो शत्रुओं का हितैषी हो उसे विशेष रूप से मारना चाहिए ॥९२-९५॥ बलि बोला- गुरुदेव ! इस प्रकार स्वयं आप धर्म विरोधी चर्चा न करें। स्वयं विष्णु यदि मेरे अतिथि या याचक बनें तो इससे बढ़कर दूसरा क्या वर या श्रेय हो सकता है। विद्वान् विष्णु की प्रसन्नता के लिए ही

७७ दशमोऽध्यायः दरिद्रेणापि यत्किंचिद्दीयते विष्णवे गुरो । तदेव परमं दानं दत्तं भवति चाक्षयम् ॥९८॥ स्मृतोऽपि परया भक्त्या पुनाति पुरुषोत्तमः । येन केनाप्यर्चितश्चेद्ददाति परमां गतिम् ॥९९॥ हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृतः । अनिच्छयापि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः ॥१००॥ जिह्वाग्रे वसते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम् । स विष्णुलोकमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥१०१॥ गोविन्देति सदा ध्यायेद्यस्तु रागातिवर्जितः । स याति विष्णुभवनमिति प्राहुर्मनीषिणः ॥१०२। अग्नौ वा ब्राह्मणे वापि हूयते यद्धविर्गु रो ! । हरिभक्त्या महाभाग तेन विष्णुः प्रसीदति ॥१०३॥ अहं तु हरितुष्ट्यर्थं करोम्यध्वरमुत्तमम् । स्वयमायाति चेद्विष्णुः कृतार्थोऽस्मि न संशयः ॥१०४॥ एवं वदति दैत्येन्द्रे विष्णुर्वामनरूपधृक् । प्रविवेशाध्वरस्थानं हुतवह्निमनोरमम् ॥१०५॥ तं दृष्ट्वा कोटिसूर्याभं योग्यावयवसुन्दरम् । वामनं सहसोत्थाय प्रत्यगृह्णात्कृताञ्जलिः ॥१०६॥ दत्त्वाऽसनं च प्रक्षाल्य पादौ वामनरूपिणम् । सकुटुम्बो वहन्मूर्ध्ना परमां मुदमाप्तवान् ॥१०७॥ विष्णवेऽस्मै जगद्धाम्ने दत्त्वाऽर्घ्यं विधिवद्बलिः । रोमाञ्चिततनुर्भूत्वा हर्षाश्रुनयनोऽब्रवीत् ॥१०८॥ बलिरुवाच अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे सफलो मखः । जीवितं सफलं मेऽद्य कृतार्थोऽस्मि न संशयः ॥१०८½॥ अमोघामृतवृष्टिर्मे समायातातिदुर्लभा । त्वदागमनमात्रेण ह्यनायासो महोत्सवः ॥११०॥ एते च ऋषयः सर्वे कृतार्था नात्र संशयः । यैः पूर्वं हि तपस्तप्तं तदद्य सफलं प्रभो ॥१११॥

यज्ञ करते हैं । यदि मेरे यज्ञ में वही साक्षात् हवि के भोक्ता बन जायें तो मुझसे बढ़कर संसार में और दूसरा कौन भाग्यवान् होगा ? दरिद्र भी जो कुछ गुरु विष्णु को देता है वही परम दान है, वही अक्षय होता है । अनन्य भाव से स्मरण करने पर भी पुरुषोत्तम लोगों को पवित्र करते हैं। चाहे कोई किसी प्रकार से भगवान् की पूजा करे उसे हरि अवश्य परमगति देते हैं ॥९६-९९॥ दुष्ट चित्त लोगों के स्मरण करने पर भी हरि उनके पापों को दूर कर देते हैं, क्योंकि बिना इच्छा के भी छू देने पर अग्नि जला ही देती है । जिसकी जिह्वा पर दो अक्षरों का हरि-नाम सदा वास करता है, वह उस विष्णुलोक को प्राप्त करता है जहां से पुनः लौटना नहीं पड़ता । जो राग-द्वेष दूर रह कर गोविन्द का ध्यान करता है वह विष्णु-भवन को प्राप्त करता है, ऐसा मनीषी कहते हैं । गुरुदेव ! अग्नि या ब्राह्मण के मुख में जो हवि भगवद्-भक्ति पूर्वक दी जाती है, उससे भगवान् अत्यन्त प्रसन्न होते हैं ॥१००-१०३॥ मैं तो केवल भगवत्-प्रीति के लिए ही उस उत्तम यज्ञ को कर रहा हूँ। यदि विष्णु स्वयं मेरे यज्ञ में आ रहे हैं। तब तो मैं कृतार्थ हो गया, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं ! इस प्रकार दैत्यपति बलि की गुरु जी से वार्ता हो रही थी कि इतने में प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी वामन रूप धारी विष्णु यज्ञमण्डप में चले आये । करोड़ों सूर्य के समान तेजस्वी वामन के परम मनोहर रूप को देखकर बलि बड़ी शीघ्रता से उठकर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और आसन पर बैठाकर भगवान् वामन के चरणों को धोया, भगवान् के चरणोदक को कुटुम्ब सहित अपने शिर पर चढ़ा परम आनन्द प्राप्त किया । तत्पश्चात् विधि पूर्वक जगद्धाम विष्णु को अर्घ्य प्रदान कर आनन्द-मग्न हो गया । उसके नेत्रों से आनन्द के आंसू बहने लगे और रोमाञ्च हो आया । किसी प्रकार अपने को सम्हाल कर बोला ॥१०४-१०८॥ आज मेरा जन्म सफल हो गया, आज मेरा यज्ञ सफल हो गया, मेरा जीवन सफल हो गया और मैं कृतार्थ हो गया, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । अति दुर्लभ अमोघ अमृत की वर्षा मेरे यहाँ हो गई । तुम्हारे आगमन मात्र से ही अनायास महोत्सव हो गया । ये सभी ऋषि भी आज कृतार्थ हो गए । प्रभो ! जिन ऋषियों ने तपस्या

७८ नारदीयपुराणम् कृतार्थोऽस्मि कृतार्थोऽस्मि कृतार्थोऽस्मि न संशयः। तस्मात्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमो नमः ॥११२॥ त्वदाज्ञया त्वन्नियोगं साधयामीति मन्मनः। अत्युत्साहसमायुक्तं समाज्ञापय मां प्रभो ॥११३॥ एवमुक्तो दीक्षितेन प्रहसन्वामनोऽब्रवीत् । देहि मे तपसि स्थातुं भूमिं त्रिपदसंमिताम् ॥११४॥ एतच्छ्रुत्वा बलिः प्राह राज्यं याचितवान्नहि। ग्रामं वा नगरं वापि धनं वा किं कृतं त्वया ॥११५॥ तन्निशम्य बलिं प्राह विष्णुःसर्वशरीरभृत् । आसन्नभ्रष्टराज्यस्य वैराग्यं जनयन्निव ॥११६॥ श्रीभगवानुवाच शृणुदैत्येन्द्र वक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतमं परम्। सर्वसंगविहीनानां किमर्थैः साध्यते वद ॥११७॥ अहं तु सर्वभूतानामन्तर्यामीति भावय। मयि सर्वमिदं दैत्य ! किमन्यैः साध्यते वद ॥११८॥ रागद्वेषविहीनानां शान्तानां त्यक्तमायिनाम् । नित्यानन्दस्वरूपाणां किमन्यैः साध्यते धनैः ॥११९॥ आत्मवत्सर्वभूतानि पश्यतां शान्तचेतसाम् । अभिन्नमात्मनः सर्वं को दाता दीयते च किम् ॥१२०॥ पृथ्‍वीयं क्षत्रियवंशा इति शास्त्रेषु निश्चितम् । तदाज्ञायां स्थिताः सर्वे लभन्ते परमं सुखम् ॥१२१॥ दातव्यो मुनिभिश्चापि षष्ठांशो भूभुजे बले ! । महीयं ब्राह्मणानां तु दातव्या सर्वयत्नतः ॥१२२॥ भूमिदानस्य माहात्म्यं न भूतं न भविष्यति। परं निर्वाणमाप्नोति भूमिदो नात्र संशयः ॥१२३॥ स्वल्पामपि महीं दत्त्वा श्रोत्रियायाहिताग्नये । ब्रह्मलोकमवाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥१२४॥ भूमिदः सर्वदः प्रोक्तो भूमिदो मोक्षभाग्भवेत् । अतिदानं तु तज्ज्ञेयं सर्वपापप्रणाशनम् ॥१२५॥ महापातकयुक्तो वा युक्तो वा सर्वपातकैः। दशहस्तां महीं दत्त्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१२६॥

की थी उनकी तपस्या सफल हो गई, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं। मैं कृतार्थ हो गया, इसमें सन्देह नहीं, इसलिए भगवन् ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है। आपकी आज्ञा के अनुसार आपके आदेशों का पालन करूँ, यही मेरी इच्छा है। प्रभो ! मुझ सेवक को आज्ञा दीजिए, मैं उत्साह के साथ पालन करूँगा। ॥११०६-११३॥ यजमान की ऐसी बातें सुनकर भगवान् वामन हँसते हुए बोले— तो मुझे तपस्या करने के लिए केवल तीन पग भूमि दे दो। यह सुनकर बलि ने कहा 'न तो आपने राज्य मांगा, न ग्राम, न नगर और न धन ही; आपने यह क्या किया ? बलि की बातें सुनकर अखिल जीव को धारण और पोषण करने वाले विष्णु ने बलि से इस प्रकार कहा मानो निकट भविष्य में राज्यच्युत होने वाले को आश्वा- सन देने के लिए वे वैराग्य उत्पन्न कर रहे हों ॥११४-११६॥ श्रीभगवान् बोले— दैत्येन्द्र ! सुनो, आज मैं परम गुह्य रहस्य को कह रहा हूँ। सब प्रकार की आसक्तियों से परे रहने वालों का धन से कौन सा प्रयोजन सिद्ध हो सकता है ? बताओ ! मैं सब प्राणियों का अन्तर्यामी हूँ, ऐसा समझो । दैत्य ! यह सारा जगत् मुझमें ही स्थित है, तो बताओ, मुझे अन्य वस्तुओं से क्या लाभ होगा ? राग द्वेष से रहित, शान्त, मायामुक्त और नित्यानन्द-स्वरूप व्यक्तियों को अन्य धन से क्या लाभ होगा ? कहो सब प्राणियों को अपने समान देखने वाले, शान्तचित्त और सबको अपने से अभिन्न समझने वाले के लिए कौन दाता है और क्या दे सकता है ? यह पृथ्वी क्षत्रियों के अधिकार में रहती है, ऐसा शास्त्रों में निश्चित किया गया है। उसी क्षत्रिय की आज्ञा में रहकर सारे प्राणी सुख प्राप्त करते हैं। बलि ! मुनियों को भी भूमिपति राजा को उपज का छठा भाग देना चाहिए। ब्राह्मणों के लिए यह पृथ्वी दान में सब प्रकार से देनी चाहिए। भूमिदान का बहुत बड़ा महत्त्व है, ऐसा दान न तो हुआ है न होगा। भूमिदाता परममोक्ष को प्राप्त करता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं ॥११७-१२३॥ किसी श्रोत्रिय अग्निहोत्र करने वाले ब्राह्मण को थोड़ा भी भूदान करने से दाता आवागमन से रहित ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है। भूमि दाता ही सब कुछ का दाता कहा जाता है।

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दशमोऽध्यायः ७६ सत्पात्रे भूमिदाता यः सर्वदानफलं लभेत् । भूमिदानसमं नान्यत्त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥१२७॥ द्विजाय वृत्तिहीनाय यः प्रदद्यान्महीं बले । तस्य पुण्यफलं वक्तुं न क्षमोऽब्दशतैरहम् ॥१२८॥ सक्ताय देवपूजासु वृत्तिहीनाय दैत्यप । स्वल्पामपि महीं दद्याद्यः स विष्णुर्न संशयः ॥१२९॥ इक्षुगोधूमतुवरीपूगवृक्षादिसंयुता । पृथ्वी प्रदीयते येन स विष्णुर्नात्र संशयः ॥१३०॥ वृत्तिहीनाय विप्राय दरिद्राय कुटुम्बिने । स्वल्पामपि महीं दत्त्वा विष्णुसायुज्यमाप्नुयात् ॥१३१॥ सक्ताय देवपूजासु विप्रायाढकिकां महीम् । दत्त्वा लभेत गङ्गायां त्रिरात्रस्नानजं फलम् ॥१३२॥ विप्राय वृत्तिहीनाय सदाचाररताय च । द्रोणिकां पृथिवीं दत्त्वा यत्फलं लभते शृणु ॥१३३॥ गङ्गातीर्थाश्वमेधानां शतानि विधिवन्नरः । कृत्वा यत्फलमाप्नोति तदाप्नोति स पुष्कलम् ॥१३४॥ ददाति खारिकां भूमिं दरिद्राय द्विजाय यः । तस्य पुण्यं प्रवक्ष्यामि वदतो मे निशामय ॥१३५॥ अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च । विधाय जाह्नवीतीरे यत्फलं तल्लभेदध्रुवम् ॥१३६॥ भूमिदानं महादानमतिदानं प्रकीर्तितम् । सर्वपापप्रशमनमपवर्गफलप्रदम् ॥१३७॥ अत्रेतिहासं वक्ष्यामि शृणु दैत्यकुलेश्वर । यच्छ्रुत्वा श्रद्धया युक्तो भूमिदानफलं लभेत् ॥१३८॥ आसीत्पुरा द्विजवरो ब्राह्मकल्पे महामतिः । दरिद्रो वृत्तिहीनश्च नाम्ना भद्रमतिर्बले ॥१३९॥ श्रुतानि सर्वशास्त्राणि तेन वेदविदानिशम् । श्रुतानि च पुराणानि धर्मशास्त्राणि सर्वशः ॥१४०॥ अभवंस्तस्य षट्पत्न्यः श्रुतिः सिन्धुर्यशोवती । कामिनी मालिनी चैव शोभा चेति प्रकीर्तिताः ॥१४१॥ भूमिदाता ही मोक्ष का भागी होता है। इसी को सब पापों को नष्ट करने वाला श्रेष्ठ दान कहा गया है। सब पापों का करने वाला अथवा महापापी भी केवल दश हाथ भूमि का दान करने से पापों से मुक्त हो जाता है। योग्य व्यक्ति को भूमि दान करने से दाता सब दानों का फल पा जाता है। भूमिदान के समान तीनों लोकों में कोई दान नहीं है ॥१२४-१२७॥ बलि ! जीविकाहीन ब्राह्मण को जो भूमि दान करता है, उसके पुण्य फल को सौ वर्षों में भी मैं नहीं कह सकता हूँ ।१२८। दैत्यपति ! जीविकाहीन और सर्वदा देवाराधन में लगा रहने वाले ब्राह्मण को थोड़ी सी भी पृथ्वी का दान देने से दाता विष्णुतुल्य हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं। ईख, गेहूँ, अरहर और सुपारी के वृक्ष से युक्त पृथ्वी का जो दान करता है वह विष्णुरूप हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं ॥१२९-१३०॥ जीविकाहीन, दरिद्र और बहुकुटुम्बी ब्राह्मण को थोड़ी सी भी पृथ्वी का दान देने से मनुष्य विष्णुलीन हो जाता है। देवाराधन में तत्पर रहने वाले विप्र को अरहर वाली भूमि देने से गंगा में तीन रात्रि स्नान करने के समान फल मिलता है। जीविकाहीन, सदाचारी विप्र को द्रोणिका (एक नाप) परिमित भूमि देने से जो फल मिलता है उसको सुनो—गंगा तीर्थ और विधिपूर्वक सौ अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न करने से जो अक्षय फल मनुष्य को मिलता है वह फल उस दानी को मिलता है। जो दरिद्र ब्राह्मण को खारिका परिमित भूमि प्रदान करता है उसके पुण्यों को मैं बतला रहा हूँ सुनो—गंगा तट पर सहस्र अश्वमेध, सौ वाजपेय करने से जो फल प्राप्त होता है वह उसको मिलता है, यह ध्रुव है ॥१३१-१३६॥ भूमिदान, महादान और परमोत्कृष्ट दान कहा गया है, यह सब पापों को मिटाने वाला और मोक्ष फल देने वाला है। दैत्य कुल के स्वामी ! सुनो, मैं इस विषय में एक प्राचीन आख्यान सुना रहा हूँ जिसको श्रद्धापूर्वक सुनने से भी भूमिदान का फल मिलता है ॥१३७-१३८॥ बले ! प्राचीन काल में ब्राह्मकल्प में भद्रमति नामक एक महाबुद्धिमान् ब्राह्मण था। वह अति दरिद्र और आश्रय- हीन था। वह रात-दिन सब शास्त्रों का अध्ययन किया करता था, और सब धर्मशास्त्रों तथा पुराणों का भी श्रवण करता था। उसकी श्रुति, सिन्धु, यशोवती, कामिनी, मालिनी और शोभा नाम की छः पत्नियाँ थीं। असुरश्रेष्ठ !