बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 86, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें६७ दशमोऽध्यायः ॥२४॥ अथ दैत्याणाः क्रुद्धास्ताड्यमानाः सरैर्भृशम् । शस्त्रैर्बहुविधैर्दैवान्निजघ्नुरतिदारुणाः ॥२४॥ दृषद्भिर्भिन्दिपालैश्च खड्गैः परशुतोमरैः । परिघैश्छुरिकाभिश्च कुन्तैश्चक्रैश्च शङ्कुभिः ॥२५॥ मुसलैरङ्कुशैश्चैव लाङ्गलैः पट्टिशैस्तथा । शक्त्योपलैः शतघ्नीभिः पाशैश्च तलमुष्टिभिः ॥२६॥ शूलैर्नालीकनाराचैः क्षेपणीयैस्समुद्गरैः । रथाश्वनागपद्गैः सङ्कुलो ववृधे रणः ॥२७॥ देवाश्च विविधास्त्राणि दैतेयेभ्यः समाक्षिपन् । एवमब्दसहस्राणि युद्धमासीत्सुदारुणम् ॥२८॥ अथ दैत्यबले वृद्धे पराभूता दिवौकसः । सुरलोकं परित्यज्य सर्वे भीताः प्रदुद्रुवुः ॥२९॥ नररूपपरिच्छन्ना विचेरुरवनीतले । वैरोचनिस्तुभुवनं नारायणपरायणः ॥३०॥ बुभुजेऽव्याहतैश्वर्यप्रवृद्धश्रीर्महाबलः । इयाज चाश्वमेधैः स विष्णुप्रीणनतत्परः ॥३१॥ इन्द्रत्वं चाकरोत्स्वर्गे दिक्पालत्वं तथैव च । देवानां प्रीणनार्थाय यैः क्रियन्ते द्विजैर्मखाः ॥३२॥ तेषु यज्ञेषु सर्वेषु हविर्भुङ्क्ते स दैत्यराट् । अदितिः स्वात्मजान्वीक्ष्य देवमातातिदुःखिता ॥३३॥ वृथात्र निवसामीति मत्वागाद्धिमवद्गिरिम् । शक्रस्यैश्वर्यमिच्छन्ती दैत्यानां च पराजयम् ॥३४॥ हरिध्यानपरा भूत्वा तपस्तेपेऽतिदुष्करम् । किंचित्कालं समासीना तिष्ठंती च ततः परम् ॥३५॥ पादेनैकेन सुचिरं ततः पादाग्रमात्रतः । कंचित्कालं फलाहारा ततः शीर्णदलाशना ॥३६॥ ततो जलाशना वायुभोजनाहारवर्जिता । सच्चिदानन्दसन्दोहं ध्यायत्यात्मानमात्मना ॥३७॥ दिव्याब्दानां सहस्रं सा तपोऽतप्यत नारद । दुरन्तं तत्तपः श्रुत्वा दैतेया मथिनोऽदितिम् ॥३८॥
समय युद्ध में देवताओं से जो राक्षस मारे जाते थे वे स्वयं देवता बनकर राक्षसों पर आक्रमण करते थे । जब असुर गण इस प्रकार देवों से बुरी तरह आहत होने लगे तब क्रुद्ध हो गए और बड़ी निष्ठुरता से विभिन्न शस्त्रों से देवों पर प्रहार करने लगे ।२१-२४॥ वह देवासुर-संग्राम पत्थरों की वर्षा से, भिन्दिपाल, खड्ग, परशु, तोमर, परिध, छुरिका, भालों, चक्र, शंकु, मुशल, अंकुश, लांगूल, पट्टिश, वेग से पत्थरों की वर्षा करने वाले यन्त्रों, शतघ्नी (तोप) पाश, तलमुष्टि, (?), शूल, नाराच, और फेंके जाने वाले मुद्गरों के प्रहार से रथ, अश्व, हाथी और पैदल सैनिकों की घोर, भयङ्कर मार-काट से अत्यन्त भयानक हो गया । देवों ने भी विविध अस्त्रों के प्रहार से राक्षसों को व्याकुल कर दिया । इस प्रकार वह महाभयङ्कर संग्राम एक हजार वर्षों तक चलता रहा ॥२५-२८॥ अन्त में दैत्यों की सेना प्रबल हो गई, देवगण पराजित हो गए, सभी देवता देवलोक छोड़कर इधर-उधर डर कर भाग निकले, मनुष्यों का रूप धारण कर पृथ्वी पर भटकने लगे । नारायण भक्त वैरोचन बलि अपने अमित ऐश्वर्य और सतत श्री वृद्धि का उपयोग करने लगा । विष्णु की उपासना में सर्वदा सचेष्ट रहने वाले उस असुर ने अनेक अश्वमेध यज्ञ किए । उसने स्वर्ग में इन्द्र का अधिकार इसी प्रकार दिक्पालों का भी अधिकार भी प्राप्त कर लिया । ब्राह्मण गण देवों की प्रीति के लिए जिन-जिन यज्ञों को करते थे उनमें वह स्वयं जाकर हवि ग्रहण करता था । देव माता अदिति अपने पुत्रों को अति दीन-दशा देख कर अति दुःखी हो गई ॥२९-३३॥ मैं व्यर्थ ही यहाँ दिन बिता रही हूँ, यह सोचकर वह हिमालय पर्वत की ओर चली गई । वहाँ जाकर अपने पुत्र इन्द्र की विभव कामना और दैत्यों के पराजय की इच्छा से भगवान् की सेवा में तल्लीन हो कठोर तप करने लगी । कुछ समय तक बैठकर पुनः खड़ी होकर, कुछ समय तक एक पैर पर स्थित होकर और कुछ समय पैर की अंगुलियों के सहारे खड़ी होकर तपस्या की । इसी प्रकार कुछ समय तक फलाहार कर तत्पश्चात् गिरी हुई सूखी पत्तियों पुनः जल और केवल वायु का ही आहार कर अपनी तपस्या को और कठिन कर दिया । नारद ! आनन्दमय सच्चिदानन्द का अपने अन्तःकरण में ध्यान करती हुई उस देव-जननी ने एक सहस्र दिव्य वर्ष बिता दिये । अदिति के उस घोर तप का पता पाकर मायावी दैत्यों ने देवता का रूप बनाकर बलि के कहे हुए शब्दों