बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 87, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें६८ नारदीयपुराणम् देवतारूपमास्थाय संप्रोचुर्बलिनोदिताः । किमर्थं तप्यते मातः शरीरपरिशोषणम् ॥३८॥ यदि जानन्ति दैतेया महद्दुःखं ततो भवेत् । त्यजेदं दुःखबहुलं कायशोषणकारणम् ॥३९॥ प्रयाससाध्यं सुकृतं न प्रशंसन्ति पण्डिताः । शरीरं यत्नतो रक्ष्यं धर्मसाधनतत्परैः ॥४०॥ ये शरीरमुपेक्षन्ते ते स्युरात्मविघातिनः । सुखं त्वं तिष्ठ सुभगे पुत्रानस्मान्न खेदय ॥४१॥ मात्रा हीना जना मातर्मृतप्राया न संशयः । गावो वा पशवो वापि यत्र गावो महीरुहाः ॥४२॥ न लभन्ते सुखं किंचिन्मात्रा हीना मृतोपमाः । दरिद्रो वापि रोगी वा देशान्तरगतोऽपि वा ॥४३॥ मातृदर्शनमात्रेण लभते परमां मुदम् । अन्ने वा सलिले वापि धनादौ वा प्रियासु च ॥४४॥ कदाचिद्विमुखो याति जनो मातरि कोऽपि न । यस्य माता गृहे नास्ति यत्न धर्मपरायणा साध्वी च स्त्री पतिप्राणा गन्तव्यं तेन वै वनम् ॥४६॥ धर्मश्च नारायणभक्तिहीनो धनं च सद्भोगविवर्जितं हि । गृहं च भार्यातनयैर्विहीनं यथा तथा मातर्विहीनमर्त्यः ॥४७॥ तस्माद्देवि परित्राहि दुःखार्तानात्मजांस्तव । इत्युक्ताप्यदितिर्दैत्यैर्न चचाल समाधितः ॥४८॥ एवमुक्तवासुराः सर्वे हरिध्यानपरायणाम् । निरीक्ष्य क्रोधसंयुक्ता हन्तुं चक्रुर्मनोरथम् ॥४९॥ कल्पान्तमेघनिर्घोषाः क्रोधसंरक्तलोचनाः । दंष्ट्राग्रैरसृजन्वह्निं सोऽदहत्काननं क्षणात् ॥५०॥ शतयोजनविस्तीर्णं नानाजीवसमाकुलम् । तेनैव दग्धा दैतेया ये प्रधर्षयितुं गताः ॥५१॥ में कहा--हे माता ! शरीर को सुखा देने वाले इस तप को क्यों कर रही हो ॥३४-३६॥ यदि दैत्य इस रहस्य को जान जायेंगे तब तो और अधिक कष्ट होगा। इस कष्टसाध्य और काय को क्लेश पहुँचाने वाले दुःखकर तप को छोड़ दो। पण्डित जन कष्टसाध्य पुण्य कर्म की प्रशंसा नहीं करते । धर्म साधना में तत्पर रहने वाले मनुष्यों को इस शरीर को बड़े यत्न से रक्षा करनी चाहिए ॥४०-४१॥ जो अपने शरीर को इस प्रकार कष्ट देते हैं वे आत्मघाती कहे जाते हैं। सुशीले ! तुम सुख पूर्वक रहो अपने पुत्रों को इस घोर तपस्या से खिन्न मत करो । माता ! मातृ हीन मनुष्य मरे हुए के समान है इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । गायें हों या पशु हों वे पशुओं तथा घास से युक्त स्थान में रह कर भी मातृ हीन होने पर मृतक तुल्य हैं तथा कुछ भी सुख नहीं पाते हैं । दरिद्र, रोगी अथवा विदेश गया हुआ पुत्र केवल अपनी माता का दर्शन पाकर ही परम आनन्द प्राप्त करता है । कदाचित् कोई मनुष्य अन्न, जल, धन आदि अथवा स्त्री की ओर से भी विमुख हो जाता है ॥४२-४५॥ परन्तु माता से विमुख होने वाला सम्भवतः कोई भी नहीं देखा जाता । जिसके घर में धर्म परायण माता और पतिव्रता साध्वी स्त्री न हो उसको घर छोड़कर वन चला जाना चाहिए । नारायण की भक्ति के बिना धर्म, सत्कार्य में न व्यय किये गये धन और स्त्री पुत्र से रहित घर की जो मर्यादा है वही मातृहीन व्यक्ति की है । देवि ! इसलिए अपने शोक और दुःख से व्याकुल पुत्रों की रक्षा करो, दैत्यों के इस कूट वचन को सुनकर भी अदिति अपनी समाधि से विचलित नहीं हुई ॥४६-४८॥ अपने को विफल देखकर वे राक्षस क्रुद्ध हो गए, और विष्णु के ध्यान में मग्न अदिति को मारने के लिए उद्यत हो गए । उनके लोचन क्रोध से रक्त हो गए और प्रलय कालीन मेघ के समान वे भयङ्कर चीत्कार करने लगे, उनके भयङ्कर दांतों से अग्नि की ज्वाला निकल पड़ी जिससे वह सारा शत-योजन विस्तीर्ण और अनेक जीवों से व्याप्त कानन क्षणभर में जलकर भस्म हो गया । उसी अग्नि से वे दैत्य भी, जो कि अदिति को हानि पहुँचाने आये हुए थे, जलकर भस्म हो गए । सौ देव वर्षों से अच्युत के ध्यान