बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः ५६ यस्मात्क्षिपसि दुष्टाग्रे मयि शापान्तरं ततः । पिशाचयोनिमद्यैव याहि पुत्रसमन्विता ॥६८॥ तेनैवं ब्राह्मणी शप्ता पिशाचत्वं तदा गता । क्षुधार्ता सुस्वरं भीमा रुरोदापत्यसंयुता ॥६९॥ राक्षसश्च पिशाची च क्रोशन्तौ निर्जने वने । जग्मतुर्नर्मदातीरे वनं राक्षससेवितम् ॥७०॥ औदासीन्यं गुरौ कृत्वा राक्षसों तनुमाश्रितः । तत्रास्ते दुःखसंतप्तः कश्चिल्लोकविरोधकृत् ॥७१॥ राक्षसं च पिशाचीं दृष्ट्वा स्ववटमागतौ । उवाच क्रोधबहुलो वटस्थो ब्रह्मराक्षसः ॥७२॥ किमर्थमागतौ भीमौ युवां मत्स्थानमीप्सितम् । ईदृशो केन पापेन जातौ मे ब्रूवतां ध्रुवम् ॥७३॥ सौदासस्तद्वचः श्रुत्वा तया यच्चात्मना कृतम् । सर्वं निवेदयित्वास्मै पश्चादेतदुवाच ह ॥७४॥ सौदास उवाच कस्त्वं वद महाभाग त्वया वै किं कृतं पुरा । सख्यम॑र्मातिस्नेहेन तत्सर्वं वक्तुमर्हसि ॥७५॥ करोति वञ्चनं मित्रे यो वा को वापि दुष्टधीः । स हि पापफलं भुंक्ते यातनास्तु युगायुतम् ॥७६॥ जन्तूनां सर्वदुःखानि क्षीयन्ते मित्रदर्शनात् । तस्मान्मित्रेषु मतिमान्न कुर्याद्वञ्चनं कदा ॥७७॥ कल्मषापादेनेत्युक्तो वटस्थो ब्रह्मराक्षसः । उवाच प्रीतिमापन्नो धर्मवाक्यानि नारद ॥७८॥ ब्रह्मराक्षस उवाच अहमासं पुरा विप्रो मागधो वेदपारगः । सोमदत्त इति ख्यातो नाम्ना धर्मपरायणः ॥७९॥ प्रमत्तोऽहं महाभाग विद्यया वयसा धनैः । औदासीन्यं गुरोः कृत्वा प्राप्तवानीदृशीं गतिम् ॥८०॥ न लभेऽहं सुखं किंचिन्नराहारोऽतिदुःखितः । मया तु भक्षिता विप्राः शतशोऽथ सहस्रशः ॥८१॥ तुमने मुझ दुष्ट के ऊपर दूसरा शाप भी रख दिया इसलिए तुम अभी अपने पुत्र के सहित पिशाच योनि को प्राप्त हो जाओ ॥६३-६८॥ उस राक्षस से इस प्रकार शाप पाकर वह ब्राह्मणी तत्काल राक्षसी हो गई । पुत्र सहित वह भयङ्कर आकार वाली राक्षसी भूख प्यास से व्याकुल होकर जोर-जोर से चिल्लाने लगी । रोते चिल्लाते हुए वे दोनों राक्षस और पिशाची उस निर्जन वनमें घूमने लगे । घूमते हुए वे दोनों नर्मदा-तटवर्ती उस वनमें गए जहाँ गुरु की अवज्ञा के कारण राक्षस बन कर एक दूसरा दुःखो लोकविरोधी राक्षस रहता था । उस राक्षस और पिशाची को अपने वट की ओर आते देख कर उस वट पर रहने वाले ब्रह्म राक्षस ने क्रोध पूर्वक कहा ॥६६-७२॥ भयङ्कर आकार वाले तुम दोनों क्यों मेरे इस प्रिय निवास स्थान पर आए ? ऐसा कौन सा पाप किया जिससे तुम दोनों राक्षस हो गए, सारी बातें मुझसे पूर्ण रूप से कहो । सौदास ने स्वयं और उस पिशाची ने जो कुछ किया था कह दिया और उसके बाद उस ब्रह्मराक्षस से पूछा ॥७३-७४॥ सौदास बोला- महाभाग ! तुम कौन हो, तुमने इसके पूर्व कौन सा पाप किया, कहो । तुम मेरे सखा हो, इसलिए प्रेमपूर्वक सारी बातें तुम अवश्य कहो । जो कोई दुष्टबुद्धि अपने मित्र के प्रति वंचना करता है वह दस हजार युगों तक उस पाप का फल भोगता है । प्राणियों के सभी दुःख मित्रदर्शन से नष्ट हो जाते हैं । इसलिये बुद्धिमान् व्यक्ति मित्रों के प्रति कभी भी कपट व्यवहार नहीं करते हैं । कल्माषपाद के ऐसा कहने पर वट- निवासी ब्रह्मराक्षस ने प्रसन्न होकर धर्म युक्त बातें कहीं ॥७५-७८॥ ब्रह्मराक्षस बोला- मैं पहले सोमदत्त नामक परम धार्मिक वेदज्ञ और मगध देश का रहने वाला ब्राह्मण था । महाभाग ! विद्या, युवावस्था और धन के मद से मतवाला होकर गुरु का अपमान कर दिया जिससे इस गति को प्राप्त हुआ हूँ । मित्र ! इस अवस्था में कहीं भी किसी प्रकार का सुख नहीं पा रहा हूँ, केवल निराहार