बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 77, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें५८ नारदीयपुराणम् ब्राह्मणी स्वपतिं वीक्ष्य निशाचरकरस्थितम् । शिरस्यञ्जलिमाधाय प्रोवाच भयविह्वला ॥५४॥ ब्राह्मप्युवाच भो भो नृपतिशार्दूल त्राहि मां भयविह्वलाम् । प्रियप्राणप्रदानेन कुरु पूर्णमनोरथाम् ॥५५॥ नाम्ना मित्रसहस्त्वं हि सूर्यवंशसमुद्भवः । न राक्षसस्ततोऽनाथां पाहि मां विजने वने ॥५६॥ या नारी भर्तृरहिता जीवत्यपि मृतोपमा । तथापि बालवैधव्यं किं वक्ष्याम्यरिमर्दन ॥५७॥ न मातापितरौ जाने नापि बंधुं च कंचन । पतिरेव परो बंधुः परमं जीवनं मम ॥५८॥ भवान्वेत्यखिलान्धर्मान्योषितां वर्त्तनं यथा । त्रायस्व बन्धुरहितां बालापत्यां जनेश्वर ॥५९॥ कथं जीवामि पत्यास्मिन्हीना हि विजने वने । दुहिताहं भगवतस्त्राहि मां पतिदानतः ॥६०॥ प्राणदानानात्परं दानं न भूतं न भविष्यति । वदन्तीति महाप्राज्ञाः प्राणदानं कुरुष्व मे ॥६१॥ इत्युक्त्वा सा पापातस्य राक्षसस्य पदाग्रतः । एवं संप्राथ्यमानोऽपि ब्राह्मण्या राक्षसो द्विजम् अभक्षयत्कृष्णसारशिशुं व्याघ्रो यथा बलात् । ॥६२॥ ततो विलप्य बहुधा तस्य पत्नी पतिव्रता । पूर्वशापहतं भूपमशपत्क्रोधित पुनः ॥६३॥ पतिं मे सुरतासक्तं यस्माद्धिसितवान्बलात् । तस्मात्स्त्रीसङ्गमं प्राप्तस्त्वमपि प्राप्स्यसे मृतिम् ॥६४॥ शप्त्वैवं ब्राह्मणी क्रुद्धा पुनः शापान्तरं ददौ । राक्षसत्वं ध्रुवं तेऽस्तु मत्पतिर्भक्षितो यतः ॥६५॥ सोऽपि शापद्वयं श्रुत्वा तया दत्तं निशाचरः । प्रमन्युः प्राह विसृजन्कोपादङ्गारसंचयम् ॥६६॥ दुष्टे कस्मात्प्रदत्तं मे वृथा शापद्वयं त्वया । एकस्यैवापराधस्य शापस्त्वेको ममोचितः ॥ ६७॥
प्रकार व्याघ्र मृगशावक को पकड़ लेता है उसी प्रकार मुनि को उसने पकड़ लिया । ब्राह्मणी अपने पति को राक्षस के पंजे में फंसा देखकर भयविह्वल हो गई और हाथ जोड़कर राक्षस से बोली ॥५०-५४॥ ब्राह्मणी बोली—'हे भूपश्रेष्ठ ! भय से व्याकुल मेरी रक्षा करो, मेरे पति के प्राणों को देकर मुझे कृतकृत्य करो । तुम सूर्य वंश के मित्रसह नामक नरपाल हो, राक्षस नहीं हो अप: भूपाल होने के नाते इस निर्जन वन में मेरी रक्षा करो । जो नारी पतिहीन है वह जीते हुए भी मरे के समान है, तिस पर बालवैधव्य तो और ही कष्टकर है । अरिसूदन ! इस विषय में और क्या कहूँ । इस समय न तो मेरे माता-पिता अथवा कोई बन्धु ही हैं, केवल पति ही मेरे सर्वस्व और एक मात्र आधार हैं। आप सब धर्म तत्त्वों को जानते हैं और यह भी जानते हैं कि नारी जीवन का आधार क्या है, नरपाल ! असहाय शिशु सन्तान वाली, मेरी रक्षा करो, इस निर्जन वन में पति के अवलम्ब के बिना कैसे जी सकूँगी ? मैं आपकी पुत्री हूँ मुझे पतिदान देकर रक्षा कीजिए ॥५५-६०॥ प्राणदान से बढ़कर कोई दूसरा दान न तो है न होगा, ऐसा महाबुद्धिमान् व्यक्ति कहते हैं । यह कहकर वह राक्षस के चरणों के समीप गिर पड़ी। ब्राह्मणो के इस प्रकार प्रार्थना करने पर भी उस राक्षस ने कुछ ध्यान नहीं दिया और उस ब्राह्मण को इस प्रकार खा गया जिस प्रकार बाघ काले मृग छौने को हठात् खा जाता है ॥६१-६२॥ इसके बाद उसकी पतिव्रता ब्राह्मणो बहुत विलाप करने लगी और क्रुद्ध होकर पहले से ही शाप प्राप्त उस राजा को शाप दे दिया कि जिस लिए तुमने रति आसक्त मेरे पति को क्रूरता पूर्वक मार डाला है इसलिए तुम भी कभी स्त्री प्रसङ्ग करोगे तभी मर जाओगे । तुमने मेरे पति को खा लिया है इसलिए तुम्हारा यह राक्षस भाव सर्वदा के लिए स्थिर रहेगा । वह निशाचर भी ब्राह्मणी के दिये हुए दो शापों को सुनकर क्रोधान्ध हो गया और क्रोध से अग्नि की ज्वाला बरसाता हुआ सा बोला- दुष्टे ! तुमने व्यर्थ मुझे दो शाप क्यों दे दिये । एक अपराध के लिए एक ही शाप उचित था परन्तु