बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५७ नवमोऽध्यायः
तच्छ्रुत्वोवाच भूपालं मुनिर्निश्वस्य दुःखितः । आत्मानं गर्हयामास ह्यविवेकपरायणम् ॥३६॥ अविवेको हि सर्वेषामापदां परमं पदम् । विवेकरहितो लोके पशुरेव न संशयः ॥४०॥ राज्ञा त्वजानता नूनमेतत्कर्मोचितं कृतम् । विवेकरहितोऽज्ञोऽहं यतः पापं समाचरेत् ॥४१॥ विवेकनियतो याति यो वा को वापि निवृतिम् । विवेकहीनमाप्नोति को वा यो वाप्यनियतिम् ॥४२॥ इत्युक्त्वा चात्मनात्मानं प्रत्युवाच मुनिर्नृपम् । नात्यन्तिकं भवेदेतद्द्वादशाब्दं भविष्यति ॥४३॥ गङ्गाबिन्दुभिरिक्तस्तु त्यक्त्वा वै राक्षसीं तनुम् । पूर्वरूपं त्वमापन्नो भोक्ष्यसे मेदिनीमिमाम् ॥४४॥ तद्विन्दुसेकसंभूतज्ञानेन गतकल्मषः । हरिसेवापरो भूत्वा परां शान्तिं गमिष्यसि ॥४५॥ इत्युक्तवाथर्वविद्व्रूपं वशिष्ठः स्वाश्रमं ययौ । राजापि दुःखसंपन्नो राक्षसीं तनुमाश्रितः ॥४६॥ क्षुत्पिपासाविशेषात्तो नित्यं क्रोधपरायणः । कृष्णपक्षायुतिर्भीमो बभ्राम विजने वने ॥४७॥ मृगांश्च विविधांस्तत्र मानुषांश्च सरीसृपान् । विहङ्गमान्प्लवङ्गांश्च प्रशस्तांस्तानभक्षयत् ॥४८॥ अस्थिभिर्बहुभिर्भूयः पीतरक्तकलेवरैः । रक्तान्तप्रेतकेशैश्च चितासीद्भूर्भयंकरी ॥४६॥ ऋतुत्रये स पृथिवीं शतयोजनविस्तृताम् । कृत्वातिदुःखितां पश्चाद्वनान्तरमुपागमत् ॥५०॥ तत्रापि कृतवान्नित्यं नरमांसाशनं सदा । जगाम नर्मदातीरं मुनिसिद्धनिषेवितम् ॥५१॥ विचरन्नर्मदातीरे सर्वलोकभयंकरः । अपश्यत्कंचन मुनिं रमन्तं प्रियया सह ॥५२॥ क्षुधानलेन संतप्तस्तं मुनिं समुपाद्रवत् । जग्राह चातिवेगेन व्याधो मृगशिशुं यथा ॥५३॥
बातें सुनकर लंबी सांस ली और दुःखी होकर अपनी विवेकहीनता को कोसते हुए राजा से बोले-- 'अविवेक सब आपत्तियों का एकमात्र स्थान है, इस लोक में विवेकशून्य प्राणी पशु के तुल्य है; इसमें कुछ भी सन्देह नहीं ॥३६-४०॥ राजा ने तो अज्ञान वश ऐसा कर्म किया है जो कि सबसे हो सकता है, किन्तु मैं तो विवेक शून्य, अज्ञ हूँ कि सब कुछ जानता हुआ भी ऐसा पाप कर्म कर डाला । विवेक से युक्त कोई भी मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करता है और विवेकहीन को सांसारिक बंधन प्राप्त होता है ॥४१-४२॥ इस प्रकार स्वयं अपने प्रति पश्चात्ताप सूचक बातें कहकर मुनि ने राजा से कहा 'यह शाप अधिक दिनों तक नहीं केवल बारह वर्ष तक ही रहेगा'। पुनः गंगाजल के अभिषेक से अपने राक्षस शरीर को छोड़कर पूर्व शरीर प्राप्त कर लोगे और तब इस साम्राज्य का उपभोग करोगे । उस गंगाजल के अभिषेक से ज्ञान प्राप्त होगा और तब निष्पाप होकर हरिसेवा में रुचि होगी जिसके फलस्वरूप परम शान्ति पा जाओगे ॥४३-४५॥ राजा से यह कहकर अथर्व-ज्ञाता वसिष्ठ जी अपने आश्रम को चले गए । राजा भी राक्षस शरीर पाकर दुःखी हो गया । भूख-प्यास से व्याकुल होकर नित्य प्रति क्रोध में ही जलता रहता था, उसका शरीर अमावस्या की रात्रि के समान कृष्ण वर्ण और भयंकर हो गया । इस प्रकार वह राक्षस बन कर विजन वन में इधर-उधर भटकने लगा । वन में विविध पशुओं मनुष्यों और रेंगकर चलने वाले जीवों, पक्षियों, वन्दरों एवं अन्य जीवों को खाता फिरता था। वन की सारी भूमि मरे हुए जीवों की अनगिनत हड्डियों, पीले और लाल रंग के कटे हुए अंगों, मृतकों के रक्त से सने बालों से अद्भुत और भयंकर बन गई ॥४६-४६॥ तीनों ऋतुओं में वह सौ योजन विस्तृत भू भाग को अपने अत्याचार से प्राणि-हीन बना दूसरे वनमें चला गया । वहाँ भी वह नित्य मनुष्यों की हत्या कर सर्वदा नर मांस खाता फिरता था। एक दिन सारे संसार को भयभीत करने वाला वह राक्षस नर्मदा तट पर घूमता हुआ सिद्धों और मुनियों के प्रदेश में पहुँचा । वहाँ उसने किसी मुनि को प्रिया के साथ विहार करते हुए देखा । क्षुधा-ज्वाला से जला वह उस मुनि की ओर बड़े वेग से झपटा और जिस ८--नार०