बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५६ नारदीयपुराणम् अपश्यन्मानुषं मांसं परमेण समाधिना । अहोऽस्य राज्ञो दौःशील्यमभक्ष्यं दत्तवान्मम ॥२४॥ इति विस्मयमापन्नः प्रमन्युर्भवन्मुनिः । अभोज्यं मद्विघाताय दत्तं हि पृथिवीपते ॥२५॥ तस्मात्तवापि भवतु ह्ये तदेव हि भोजनम् । नृमांसं रक्षसामेव भोज्यं दत्तं मम त्वया ॥२६॥ तद्याहि राक्षसत्वं त्वं तदाहारोचितं नृप । इति शापं ददत्यस्मिन्सौदासो भयविह्वलः ॥२७॥ आज्ञप्तो भवतेवेति सकंपोऽस्य व्यजिज्ञपत् । भूयश्च चिन्तयामास वशिष्ठस्तेन नोदितः ॥२८॥ रक्षसा वंचितं भूपं ज्ञातवान् दिव्यचक्षुषा । राजापि जलमादाय वशिष्ठं शप्तुमुद्यतः ॥२६॥ समुद्यतं गुरुं शप्तं दृष्ट्वा भूयो रुषान्वितम् । मदयंती प्रिया तस्य प्रत्युवाचाथ सुव्रता ॥३०॥ मदयंत्युवाच भो क्षत्रियदायाद कोपं संहर्तुमर्हसि । त्वया यत्कर्म भोक्तव्यं तत्प्राप्तं नात्र संशयः ॥३१॥ गुरुं तुंकृत्य हुंकृत्य यो वदेन्मूढधीर्नरः । अरण्ये निर्जले देशे स भवेद्ब्रह्मराक्षसः ॥३२॥ जितेन्द्रिया जितक्रोधा गुरुशुश्रूषण रताः । प्रयान्ति ब्रह्मसदनमिति शास्त्रेषु निश्चयः ॥३३॥ तयोक्तो भूपतिः कोपं त्यक्त्वा भार्यां ननन्द च । जलं कुत्र क्षिपामीति चिन्तयामास चात्मना ॥३४॥ तज्जलं यत्र संसिक्तं तद्भवेद्भस्म निश्चितम् । इति मत्वा जलं तत्तु पादयोर्न्यक्षिपत्स्वयम् ॥३५॥ तज्जलस्पर्शमात्रेण पादौ कल्माषतां गतौ । कल्माषपाद इत्येवं ततः प्रभृति विस्तृतः ॥३६॥ कल्माषपादो मतिमान् प्रिययाश्वासितस्तदा । मनसा सोऽतिभीतस्तु ववन्दे चरणं गुरोः ॥३७॥ उवाच च प्रपन्नस्तं प्राञ्जलिनंयकोविदः । क्षमस्व भगवन्सर्वं नापराधः कृतो मया ॥३८॥ की यह नीचता कि इसने अभक्ष्य मांस मुझे भोजन के लिए दे दिया ! यह सोचकर आश्चर्य-चकित मुनि को अत्यन्त क्रोध हुआ । 'पृथ्वोपति ! तुमने मेरे सर्वनाश के लिए अभक्ष्य मांस दिया है, अतः तुम्हारा भी यही भोजन होगा मनुष्य का मांस राक्षसों का ही भोजन है, वही आज तुमने मुझे दिया इसलिये राजन् ! तुम उसी आहार के योग्य 'राक्षस' बनो, गुरु को इस प्रकार शाप देते देखकर राजा सौदास भय से विह्वल हो गया ॥२३-२७॥ कांपते हुए उसने कहा 'आपने ही तो ऐसी आज्ञा दी है । उसके ऐसा कहने पर वसिष्ठ जी पुनः सोचने लगे । अपनी दिव्य दृष्टि से उन्होंने जान लिया कि राक्षस ने राजा को ठग लिया । राजा भी हाथ में जल लेकर गुरु को शाप देने के लिए तैयार हो गया । क्रोधान्ध पति को गुरु को शाप देने के लिए उद्यत देखकर उसकी प्रिय व्रतशील भार्या मदयन्ती ने कहा ॥२८-३०॥ मदयंती बोली-क्षत्रिय-दायाद ! तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिए, जो कुछ भोगना है वही इस समय प्राप्त हुआ है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । जो मूर्ख मनुष्य गुरु से 'तुम कह कर, या हुँ कह कर' कुछ कहता है वह वनमें जलशून्य स्थान में ब्रह्मराक्षस होता है। इन्द्रियनिग्रही, परमशान्त और गुरु की शुश्रूषा में लीन रहने वाले मनुष्य ब्रह्मलोक में स्थान पाते हैं, ऐसा शास्त्रों का निर्णय है। पत्नी के इस प्रकार समझाने पर भूपति ने क्रोध छोड़ दिया और भार्या पर प्रसन्न हो गया। अपने मनमें सोचने लगा कि इस शाप जल को कहाँ फेंकूं, जहाँ यह जल फेंका जायगा वह तो अवश्य जल कर भस्म हो जायगा यह निश्चित है। यह सोचकर उस जल को अपने पैरों पर छोड़ दिया ॥३१-३५॥ उस जल के गिरते ही दोनों पैर काले हो गए। तभी से उसका नाम कल्माषपाद ही प्रसिद्ध हो गया । मतिमान् कल्माषपाद ने प्रिया के इस प्रकार समझाने पर कुछ आश्वस्त हुआ और मन में अत्यन्त भय से त्रस्त होकर गुरु के चरणों पर गिर पड़ा । नीति-विशारद राजा ने हाथ जोड़ कर विनीत भाव से कहा। भगवन् ! क्षमा कीजिए मैंने जान बूझकर अपराध नहीं किया है। मुनि ने राजा की