भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 1008 में से

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नवमोऽध्यायः ५५ वनाद्वनान्तरं गच्छन्नेक एव महीपतिः । आकर्णाकृष्टबाणः सन् कृष्णसारं समन्वगात् ॥१०॥ दूरसैन्योऽश्वमारूढः स राजानुव्रजन्म्गम् । व्याघ्रद्वयं गुहासंस्थमपश्यत्सुरते रतम् ॥११॥ मृगपृष्ठं परित्यज्य व्याघ्रयोः संमुखं ययौ । धनुःसंहितबाणेन तेनासौ शरशास्त्रवित् ॥१२॥ तां व्याघ्रीं पातयामास तीक्ष्णाग्रनतपर्वणा । पतमाना तु सा व्याघ्री षट्त्रिंशद्योजनायता ॥१३॥ तडित्वद्घोरनिर्घोषा राक्षसी विकृताभवत् । पतितां स्वप्रियां वीक्ष्य द्विषन्स व्याघ्रराक्षसः ॥१४॥ प्रतिक्रियाम् करिष्यामीत्युक्त्वा चांतर्दधे तदा । राजा तु भयसंविग्नो वने सैन्यं समेत्य च ॥१५॥ तद्वृत्तं कथयन्सर्वान्स्वां पुरीं स न्यवर्तत् । शङ्कमानस्तु तद्रक्षःकृत्याद्राजा सुदासजः ॥१६॥ परित्यत्याज मृगयां ततः प्रभृति नारद । गते बहुतिथे काले हयमेधमखं नृपः ॥१७॥ समारभे प्रसन्नात्मा वशिष्ठाद्यैर्मुनीश्वरैः । तत्र ब्रह्मादिदेवेभ्यो हविर्दत्त्वा यथाविधि ॥१८॥ समाप्य यज्ञनिष्क्रांतो वशिष्ठः स्नातकोऽपि च । अत्रान्तरे राक्षसोऽसौ नृपहिंसितभार्यकः ॥ कर्तुं प्रतिक्रिया राज्ञे समायातो रुषान्वितः ॥१९॥ स राक्षसस्तस्य गुरौ प्रयाते वशिष्ठवेषं तु तदैव धृत्वा । ॥२०॥ राजामभ्येत्य जगाद भोक्ष्ये मांसं समिच्छाम्यहमित्युवाच भूयः समास्थाय स सूपवेषं पक्वमामिषं मानुषमस्य चादात् । ॥२१॥ स्थितश्च राजापि हिरण्यपात्रे धृत्वागुरोरागमनं प्रतीक्षन् तन्मांसं हेमपात्रस्थं सौदासो विनयान्वितः । समागताय गुरवे ददौ तस्मै स सादरम् ॥२२॥ तं दृष्ट्वा चिन्तयामास गुरुः किमिति विस्मितः ॥२३॥ तटवर्ती वनमें घूमने लगा । धनुष की डोरी कान तक खींचे हुए तथा अकेले ही एक वन से दूसरे वन में जाते हुए राजा को मृग मिला । घोड़े पर सवार होकर उस मृग के पीछे दौड़ता हुआ अपने सैनिकों से बहुत दूर निकल गया । उसी समय उसने किसी गुफा में रति क्रीड़ा करते हुए व्याघ्र-युग्म को देखा । वह शीघ्र मृग का पीछा छोड़कर उन बाघों के सामने गया । धनुर्विद्या में प्रवीण उस राजा ने धनुष पर चढ़े हुए उस बाण से जो अत्यन्त तीक्ष्ण और जिसका फल आगे की ओर कुछ झुका हुआ था—मादा बाघ को मार गिराया । गिरते समय वह व्याघ्री छत्तीस योजन विस्तृत शरीर वाली एक भयङ्कर राक्षसी हो गई जिसने बादल के समान भयङ्कर चीत्कार किया ।।८-१३।। अपनी प्रिय स्त्री को इस प्रकार मरते देखकर वह व्याघ्र आकार वाला राक्षस क्रुद्ध हो गया और द्वेषपूर्वक यह कहता हुआ कि इसका बदला लूँगा, उस समय अन्तर्हित हो गया । यह घटना देखकर राजा भय से व्याकुल हो गया अपनी सेना के पास आकर सारी घटना कह दी और अपनी राजधानी को लौट आया । नारद ! उस राक्षस की प्रतिक्रिया के भय से उस दिन से राजा ने आखेट करना बन्द कर दिया । बहुत दिन बीत जाने पर प्रसन्न होकर राजा ने वसिष्ठ आदि मुनियों के साथ अश्वमेध यज्ञ प्रारम्भ किया । उस यज्ञ में विधिपूर्वक देवों को हवि प्रदान किया गया ।।१४-१८।। यज्ञ समाप्त होने पर वसिष्ठ जी स्नातकों के साथ चले गये । इसी बीच अवसर पाकर वह राक्षस—जिसकी भार्या को राजा ने मार डाला था—अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए क्रुद्ध होकर आया । वह राक्षस राजगुरु वसिष्ठ के चले जाने पर गुरु का ही वेष धारण कर राजा के पास आया और बोला—'मैं मांस भोजन करना चाहता हूँ' । पुनः शीघ्र ही वह पाचक (रसोइयाँ) का वेष धारण कर मनुष्य का मांस पकाकर राजा को दे दिया । राजा भी उस पक्व मांस को सोने के बर्तन में परस कर गुरु के आने की प्रतीक्षा करने लगा । राजा सुदास ने आगत गुरु को बड़े आदर के साथ उस सोने के पात्र में परसे हुए मांस को दे दिया ।।१६-२२।। उस को देखकर गुरु वसिष्ठ विस्मित हो गए सोचने लगे कि यह क्या है । अपनी ज्ञानदृष्टि द्वारा उन्होंने उस मांस को देख लिया । 'अहो ! राजा

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