बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 850, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवतितमोऽध्यायः ८३१ व्योम्ना प्रकाशमानत्वं ग्रसमानत्वमग्निना । तयोविमर्श ईकारो बिंदुना तन्निफालनम् ॥४॥ पिडकंर्तरि बीजाख्या मन्त्रा मालाभिधाः क्रमात् । एकार्णवन्तो द्वयूर्णाश्च विदिक्ष्मुखमुखार्णकाः ॥५॥ वृत्तिजा र्णांल्लिखेदंकैर्व्यत्यस्तक्रमयोगतः । तर्भेदयोजनं कुर्यात्संभर्भाणामशेषतः ॥६॥ देव्यात्मकं समुदयं विश्रांति च शिवात्मकम् । उभयात्मकमप्यात्मस्वरूपं तैश्च भावयेत् ॥७॥ कालेनान्यच्च दुःखार्तिवासनानाशनो ध्रुवम् । पराहंतामयं सर्वस्वरूपं चात्मविग्रहम् ॥८॥ सदात्मकं स्फुरताख्यमशेषोपाधिवर्जितम् । प्रकाशरूपमात्मत्वे वस्तु तद्भासते परम् ॥६॥ यत एवमतो लोके नास्त्यमंत्रं यदक्षरम् । यद्विद्येति समाख्यातं सर्वथा सर्वतः सदा ॥१०॥ वासरेषु तु तेष्वेवं सर्वापत्तारकं भवेत् । तद्विधानं च वक्ष्यामि सम्यगासवकल्पनम् ॥११॥ गौडी पैष्टी तथा माध्वीत्येवं तत्त्रिविधं स्मृतम् । गुडमुष्णोदके क्षिप्त्वा समालोड्य विनिक्षिपेत् ॥१२॥ घटे काचमये तस्मिन् धातकीसुमनोरजः । खात्वा भूमौ संध्ययोस्तु करैः संक्षोभ्य भूयसा ॥१३॥ मासमात्रे गते तस्मिन्निमग्ने रजसि द्रुतम् । संशोध्य पूजयेत्तेन गौडी सा गुडयोगतः ॥१४॥ एवं मधुसमायोगान्माध्वी पैष्टीं शृणु प्रिये । अध्यर्द्धद्विगुणे तोये श्रपयेत्तन्दुलं शनैः ॥१५॥ दिनत्रयोषिते तस्मिन्धात्यूंकुररजः क्षिपेत् । दिमेकं धृते वाते निवाते स्थापयेत्ततः ॥१६॥ उदकेंलोलितं पश्चाद्गलितं पैष्टिकं मधु । वृक्षजं फलजं चेति द्विविधं क्रियते मधु ॥१७॥ तन्निर्माणं शृणुष्वाय यदास्वादान्मनोलयः । मृद्वीकां वाथ खजूरफलं पुष्पमथापि वा ॥१८॥ उनमें प्रकाशमानता आकाश से आती है और ग्रसमानता (निगलने का भाव) अग्नि से । उन दोनों का विमर्श ईकार है। बिन्दु से उसका अवलोकन करना चाहिए ॥१-४॥ पिंड के कर्त्ता में माला नामक बीज मंत्र क्रमशः स्थापित करने चाहिये । उस मन्त्र में एक वर्ण, चार वर्ण और तीन दिशाओं में मुख वाले वर्ण होने चाहिये । फिर विपरीत क्रम से वृत्तिजन्य अक्षरों को लिखे । उनसे सन्दर्भों का भेद सम्पूर्णतया कर दे । उदय में देवी के रूप, विश्राम में शिव के रूप और दोनों रूपों में आत्म-रूप की भावना करे । ऐसा करने से निश्चित ही दुःख, पीडा तथा वासना का नाश होता है। उत्कृष्ट अहंकारमय, सबका स्वरूप, आत्मरूप, सद्रूप, भासमानता की संज्ञा से युक्त, अक्रोध की उपाधि से रहित तथा प्रकाशरूप वस्तु आत्मा होने में भासित होती है । जिस लिए ऐसी बात है, इसलिए लोक में कोई वस्तु मन्त्र-रहित नहीं है । उस मन्त्र के जो अक्षर हैं और जो विद्या है वह सब बातें भली-भाँति बता दी गईं । विहित दिनों में उस मंत्र का अनुष्ठान करने से सभी आपत्तियाँ दूर हो जाती हैं। अब मैं भली-भांति आसव बनाने की विधि बताऊँगा । आसव (मद्य) विविध प्रकार के कहे गये हैं - जैसे - गौडी, पैष्टी तथा माध्वी । गरम जल में गुड़ को छोड़कर उसका मन्थन करे । फिर कांच के घड़े में धायके फूल के पराग के साथ उसे रखे। अनन्तर भूमि में उस घड़े को गाड़कर दोनों संध्या हाथों से उसे चलाये। एक मास तक ऐसा करने के उपरान्त उसको परिशोधित करके उससे पूजन करे । इस तरह गुड़योग से गोडी नामक मदिरा तैयार होती है ॥५-१४॥ प्रिय ! इसी प्रकार मधु के योग से माध्वी तथा पैष्टी नामक मद्य बनाया जाता है। ढाई गुने जल में चावल को धीरे-धीरे पकाये । फिर तीन दिनों तक उसे बासी करके धात्रीफल के चूर्ण के साथ मिलाये। पश्चात् एक दिन वायु में रख कर निर्वात स्थान में रख छोड़े । कुछ दिनों बाद जल मिलाकर उसका प्रयोग करे । इस तरह पैष्टिक मद्य बनता है। माध्वी मदिरा दो प्रकार की होती हैं- वृक्ष की एवम् फल की। उसका बनाना