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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 849, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 849

८३० नारदीयपुराणम् विश्वावृत्त्या तु विजयी सर्वतः स्यात्सुखी नरः । शक्रावृत्त्याखिलेष्टाप्तिः सर्वतो मंगलं भवेत् ॥१७४॥ तिथ्यावृत्त्याखिलानिष्टानयत्नादाप्नुयान्नरः । षोडशावृत्तितो भूयान्नरः साक्षान्महेश्वरः ॥१७५॥ विश्वं स्रष्टुं पालयितुं संहर्तुं च क्षमो भवेत् । मंडलं मासमात्रं वा यो जपेद्यद्यदाशयः ॥१७६॥ तत्तदेवाप्नुयात्सत्यं शिवस्य वचनं यथा । इत्येतत्कथितं विप्र नित्याह्यर्चनाश्रितम् ॥१७७॥ नाम्नां सहस्रं मनसोऽभीष्टसंपादनक्षमम् ॥१७८॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे ललितास्तोत्रकवचसहस्र- नामकथनं नामैकोननवतितमोऽध्यायः ॥८९॥ नवतितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच अथातो विप्र नित्यानां प्रयोगादिसमन्वितम् । पटलं तेऽभिधास्यामि नित्याभ्यर्चनदीपकम् ॥१॥ ललितायास्त्रिभिर्वर्णैः सकलार्थोऽभिधीयते । शेषेण देवीरूपेण तेन स्यादिदमीरितम् ॥२॥ अशेषतो जगत्कृत्स्नं हृल्लेखात्मकमुच्यते । तस्याश्चार्थस्तु कथितः सर्वतंत्रेषु गोपितः ॥३॥ शिव के तुल्य हो जाता है । तेरह आवृत्ति करने से मनुष्य सर्वविजयी तथा सुखी होता है । चौदह आवृत्त करने से समस्त कामनाओं की प्राप्ति तथा सब प्रकार से कल्याण होता है । पन्द्रह आवृत्ति करने से अना- यास ही अखिल वस्तुओं की प्राप्ति हो जाती है। सोलह आवृत्ति करने से मानव साक्षात् महेश्वर होता है और विश्व के सृजन, पालन तथा संहार करने की क्षमता प्राप्त करता है। जो एक मास तक नित्य सत्रह आवृत्ति पाठ करेगा, उसके हृदय में जो-जो अभिलाषायें होंगी, वे तुरन्त पूर्ण हो जायेंगी, यह शिव का सत्य वचन है। विप्र ! सहस्रं मनःकामनाओं को पूर्ण करने वाले नित्याओं के पूजन सहित सहस्र नामों को मैंने बता दिया ॥१७३-१७८॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में ललिता के स्तोत्र, कवच तथा सहस्रनाम कथन नामक नवासीवां अध्याय समाप्त ॥ अध्याय ६० अर्चन-विधि सहित नित्यापटल-कथन सनत्कुमार बोले- विप्र ! अब इसके उपरान्त नित्याओं के प्रयोग, अर्चना आदि बतलाते हुए पटल का निरूपण करूँगा । ललिता के तीन वर्णों से ही सकल पदार्थों का अभिधान होता है । शेष देवी रूप से यह जगत् कहा गया है । संपूर्ण विश्व हृल्लेखा का स्वरूप है। उनका वर्णन सब तन्त्रों में गुप्त रूप से किया गया है।