बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकोननवतितमोऽध्यायः ८२१ जिह्वामूलगता नासागतोरःस्थलगामिनी । पदवाक्यस्वरूपा च वेदभाषास्वरूपिणी ॥१५९॥ सेकाख्या वीक्षणाख्या चोपदेशाख्या तथैव च । व्याकुलाक्षरसंकेता गायत्री प्रणवादिका ॥१६०॥ जपहोमार्चनध्यानयंत्रतर्पणरूपिणी । सिद्धसारस्वता मृत्युंजया च त्रिपुरा तथा ॥१६१॥ गारुडा चान्नपूर्णा चाप्यश्वारूढा नवात्मिका । गौरी च देवी हृदया लक्षदा च मतंगिनी ॥१६२॥ निष्कत्रयपदा चेष्टावादिनी च प्रकीर्तिता । राजलक्ष्मीनर्महालक्ष्मीः सिद्धलक्ष्मीर्गवानना ॥१६३॥ इत्येवं ललितादेव्या दिव्यं नामसहस्रकम् । सर्वार्थसिद्धिदं प्रोक्तं चतुर्वर्गफलप्रदम् ॥१६४॥ एतन्नित्यमुषःकाले यो जपेच्छुद्धमानसः । स योगी ब्रह्मविज्ज्ञानी शिवयोगी तथात्मवित् ॥१६५॥ द्विरावृत्त्या प्रजपतो ह्यायुरारोग्यसंपदः । लोकानुरंजनं नारीनृपावर्जनकर्म च ॥१६६॥ अपृथक्त्वेन सिद्ध्यंति साधकस्यास्य निश्चितम् । त्रिरावृत्त्यास्य वै पुंसो विश्वं ब्रूयाद्वशेऽखिलम् ॥१६७॥ चतुरावृत्तितश्चास्य समीहितमनारतम् । फलत्येव प्रयोगार्हो लोकरक्षाकरो भवेत् ॥१६८॥ पंचावृत्त्या नरा नार्यो नृपा देवाश्च जंतवः । भजंत्येनं साधकं च देव्यामाहितचेतसः ॥१६९॥ षडावृत्त्या तन्मयः स्यात्साधकश्चास्य सिद्धयः । अचिरेणैव देवानां प्रसादात्संभवंति च ॥१७०॥ सप्तावृत्त्यारिरोगादिकृत्यापस्मारनाशनम् । अष्टावृत्त्या नरो भूपान्निग्रहानुग्रहक्षमः ॥१७१॥ नवावृत्त्या मन्मथाभो विक्षोभयति भूतलम् । दशावृत्त्या पठेन्नित्यं वागलक्ष्मीकांतिसिद्धये ॥१७२॥ रुद्रावृत्त्याखिलद्धिश्च तदायत्तं जगद्भवेत् । अर्कावृत्त्या सिद्धिभिः स्याद्दिग्भिर्मर्त्यो हरोपमः ॥१७३॥ तथा दंतगामिनी, ॥१५१-१५८॥ जिह्वामूलगता, नासागता, उरःस्थलगामिनी, षड्वाक्यस्वरूपा, वेदभाषा- स्वरूपिणी, सेका, वीक्षणा, उपदेशा, व्याकुलाक्षरसंकेता, गायत्री, ब्रह्मवादिनी, जप होम, पूजन, ध्यान, यंत्र तथा तर्पण-रूपिणी, सिद्धसारस्वता, मृत्युंजया, त्रिपुरा, गारुडा, अन्नपूर्णा, अश्वारूढा, नवात्मिका, गौरी, देवी, हृदया, लक्षदा, मतंगिनी, निष्कत्रयपदा, चेष्टा-वादिनी, राजलक्ष्मी, महालक्ष्मी, सिद्धलक्ष्मी, ओर गवानना ॥१५६-१६३॥ ये ललितादेवी के सहस्र नाम हैं, जो समस्त प्रयोजनों को सिद्ध करने वाले तथा चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) के फल को देने वाले हैं। जो व्यक्ति नित्य प्रातःकाल शुद्ध मन से इन नामों का पाठ करेगा, वह योगी, ब्रह्मवेत्ता, ज्ञानी, शिवयोगी तथा आत्मवेत्ता होगा। जो नित्य दो आवृत्ति पाठ करेगा, उसे, आयु, आरोग्य तथा संपत्ति की प्राप्ति होगी और वह नारी, राजा तथा लोगों को प्रसन्न करेगा। तीन आवृत्ति पाठ करने से विश्व वशीभूत हो जाता है। चार आवृत्ति पाठ करने से सतत इच्छा- नुसार फल मिलता है और प्रयोग करने से लोगों को रक्षा होती है ॥१६४-१६८॥ जो पांच आवृत्ति पाठ करता है, उसकी सेवा नर, नारियाँ, राजा, देवता सभी जन्तु देवी से मोहित- चित्त होकर करते हैं। तन्मय होकर छह आवृत्ति पाठ करने से साधक को देवी की कृपा से शीघ्र ही समस्त सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। सात आवृत्ति करने से (पाठक अपने) शत्रुओं को रोग आदि उत्पन्न कर सकता है और अपस्मार (मिरगी) आदि रोगों का नाश भी कर सकता है। आठ आवृत्ति करने से मनुष्य राजाओं के ऊपर निग्रह-अनुग्रह करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है। नौ आवृत्ति पाठ करने वाला साधक मदन तुल्य होकर संपूर्ण भूतल को विक्षुब्ध करता है। दश आवृत्ति करने से वाणी, लक्ष्मी तथा कांति की सिद्धि होती है ॥१६९-१७२॥ ग्यारह आवृत्ति करने से अखिल ऋद्धियां प्राप्त होती हैं तथा उसके अधीन निखिल जगत् हो जाता है। बारह आवृत्ति करने से अष्ट सिद्धियां प्राप्त होती हैं तथा वह मनुज