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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 852, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 852

नवतितमोऽध्यायः ८३३ श्रावण्यामागमौक्तेन विधानाचैत्पवित्रकैः । प्रौष्ठपद्यां गन्धपुष्पैर्यजेद्वा केतकीकुसुमैः ॥३२॥ आश्वयुज्यां कन्यकाञ्चां भूषावस्त्रधनादिभिः । कार्त्तिक्यां कुंकुमैश्चैव निशि दीपगणैरपि ॥३३॥ सचन्द्रैर्मार्गशीर्ष्यां तु नालिकेरैरपूपकैः । पौष्यां सशर्करंगुडैर्गवां दुग्धैः समर्चयेत् ॥३४॥ स्वर्णरौप्यैः पंकजैस्तु माघ्यां सौगन्धिकादिभिः । फाल्गुन्यां विविधैर्द्रव्यैः फलैः पुष्पैः सुगंधिभिः ॥३५॥ पर्वताग्रे यजेद्दे वीं पलाशकुसुमैर्निशि । सिद्धद्रव्यैश्च सप्ताहात्खेचरीमेलनं भवेत् ॥३६॥ अरण्ये वटमूले वा कुंजे वा धरणीभृताम् । कदम्बजातिपुष्पाभ्यां सिद्धद्रव्यैः शिवां यजेत् ॥३७॥ मासेन सिद्धा यक्षिण्यः प्रत्यक्षा वांछितप्रदाः । केतकीकुसुमैः सिद्धाश्चेटका वारिधेस्तटे ॥३८॥ आज्ञामभीष्टां कुर्वन्ति रणे मायां महाद्भुताम् । वसूनि मालां भूषां च दद्युरस्येहह्यानिशम् ॥३६॥ पीठमृक्षद्रुमैः कृत्वा तत्र देवीं यजेन्निशि । शाल्मलैः कुसुमैः सिद्धद्रव्यैर्मासं तु निर्भयः ॥४०॥ श्मशानवेशे विप्रेंद्र सिद्धयंत्यस्य पिशाचकाः । अश्मपातप्रहाराद्यैर्जयावारिभिद्विषञ्चिरम् ॥४१॥ निर्जने विपिने रात्रौ मासमात्रं तु निर्भयः । यजेद्देवीं चक्रगतां सिद्धद्रव्यसमन्विताम् ॥४२॥ मालतीजातपुन्नागकेतकीमरुभिः क्रमात् । तेन सिद्ध्यंन्ति वेतालास्ताना रुह्येच्छया चरेत् ॥४३॥ श्मशाने चंडिकागेहे निर्जने विपिनेऽपि वा । मध्यरात्रे यजेद्देवीं कृष्णवस्त्रविभूषणैः ॥४४॥ तन्त्रोक्त विधि से कुशों से अर्चना करे । भाद्र मास की पूर्णिमा में गन्ध-पुष्पों से या केतकी कुसुमोँ से पूजन करे । ॥२९-३२॥ आश्विनो पूर्णिमा में वस्त्र, आभूषण, धन आदि से कुमारिका पूजन करना चाहिए । कात्तिको पूर्णिमा में कुंकुमों से देवी का पूजन करके रात्रि में दीप मालिका का उत्सव करे । अगहण की पूर्णिमा में कर्पूर, नारियल तथा पूओं से पूजा करे । पौषी पूर्णिमा में शक्कर, गुड तथा गाय के दूध से अर्चना करनी चाहिए । माघी पूर्णिमा में सुवर्ण, चांदी, कमल, तथा सुगंधित द्रव्यों से पूजा करे । फाल्गुनी पूर्णिमा में फल, पुष्प तथा विविध प्रकार के सुगंधित द्रव्यों से पूजन करे ॥३३-३५॥ रात्रि को पर्वत की चोटी पर पलाशपुष्प तथा सिद्ध द्रव्यों से देवो की अर्चना करनी चाहिये । एक सप्ताह ऐसा करने से खेचरी मुद्रा सिद्ध हो जाती है (अर्थात् देवी प्रत्यक्ष होतो है) । वन में या वट वृक्ष के मूल में या लताकुंज में कदम्ब, जूही तथा सिद्ध द्रव्यों से शिवा की अर्चना करनी चाहिए । इस तरह एक मास तक करने से वांछितफलदायिनी यक्षिणियां प्रत्यक्ष होती हैं । समुद्र के तट पर केतको के पुष्पों से पूजन करने से दास सिद्ध होते हैं । वे साधक की आज्ञा का पालन करते हैं, रण में अद्भुत माया रचते हैं और सदा धन, माला, आभूषण आदि देते रहते हैं ॥३६-३९॥ विप्रवर ! जो व्यक्ति एक मास तक रात को श्मशान में निर्भय होकर सेमल के फूलों तथा सिद्ध द्रव्यों से देवी की अर्चना करता है, उसके पिशाच सिद्ध होते हैं । वे (पिशाच) संग्राम में उस (साधक) के शत्रुओं को पत्थर से मार गिराते हैं । निर्जन वन में रात्रि के समय जो निर्भय होकर एक मास तक चक्र स्थित देवो का मालती, जूही, पुंनाग, केतको तथा मरु के पुष्पों एवम् सिद्ध द्रव्यों से पूजन करता है, उसके वेताल सिद्ध होते हैं । उन वेतालों के ऊपर चढ़कर वह इच्छानुसार विचरण करता है ॥४०-४३॥ श्मशान में या चंडिका गृह में या निर्जन वन में जो साधक एक मास तक मध्य रात्रि के समय क्रुद्ध होकर कृष्णचक्र स्थित अतिकृष्णवर्णा देवी की कृष्णवस्त्र तथा आभूषणों से पूजा करते हुए सिद्ध द्रव्य समेत १०५ ना० पु०