बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 853, कुल 1008 में से
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८३४ नारदीयपुराणम् कृष्णचक्रेऽतिकृष्णां तामतिक्रुद्धाशयो यजेत् । साध्ययोनिं तदग्रे तु बलिं च्छिन्नन्निवेदयेत् ॥४५॥ सिद्धद्रव्यसमेतं तु मासात्तद्भाललोचनात् । जायन्ते भीषणाः कृत्यास्ताभ्यः सिद्धिं निवेदयेत् ॥४६॥ विश्वसंहारसंतृष्टाः पुनरेत्य निजेच्छया । देव्या ललाटनेत्रे स्युः प्रार्थिते तु तिरोहिताः ॥४७॥ रक्तभूषांबरालेपमालाभूषितविग्रहाः । उद्याने निर्जने देवीं चक्रे संचित्य पूजयेत् ॥४८॥ कह्लारचंपकाशोकपाटलाशत्तपत्रकैः । सिद्धद्रव्यसमोपेतैर्मायाः सिद्धयंति मासततः ॥४६॥ यासां प्रसादालाभेन कामरूपो भवेन्नरः । याभिर्विश्वजयो विश्वचारी विश्वविनोदवान् ॥५०॥ षडाधाराब्जमध्ये तु चक्रं संचित्य पूजयेत् । चंद्रचंदनकस्तूरीमृगनाभिमहोदयैः ॥५१॥ त्रिकालज्ञो भवेद्देवी तेषु सम्यग्यिचिंतयेत् । पूर्णप्रतीतौ भव्यानि विकलेऽभव्यमीरितम् ॥५२॥ देवींचक्रेण संहतां स्मरेद्भक्तियुतो नरः । विवेका विभवा विश्वा वितता च प्रकीर्तिता ॥५३॥ कामिनी खेचरी गर्वा पुराणा परमेश्वरी । गौरी शिवा ह्यमेया च विमला विजया परा ॥५४॥ पवित्रा पीडनी विद्या विश्वेशी शिववल्लभा । अशेषरूपा स्वानंदांबुजाक्षी चाप्यनिंदिता ॥५५॥ वरदा वाक्यदा वाणी विविधा वेदविग्रहा । विद्या वागीश्वरी सत्या संयता च सरस्वती ॥५६॥ निर्मलानन्दरूपा च ह्यमृता मानदा तथा । पूषा चैव तथा तुष्टिः पुष्टिंश्चापि रतिधृतिः ॥५७॥ शशिनी चंद्रिका कांतिर्ज्योत्स्ना श्रीः प्रीतिरंगदा । देवीनामानि चैतानि चुलुके सलिले स्मरन् ॥५८॥ मातृकासहितां विन्नां विरावृत्यामृतात्मिकाम् । ताडों सरस्वतीं जिह्वां दीपाकारां स्मरन्पिबेत् ॥५६॥ अब्दाच्चतुर्विधं तस्य पांडित्यं भुवि जायते । एवं नित्यमुषःकाले यः कुर्याच्छुद्धमानसः ॥६०॥ स योगी ब्रह्मविज्ञानी शिवयोगी तथात्मवित् । अनुग्रहोक्तचक्रस्थां देवीं ताभिर्वृतां स्मरेत् ॥६१॥ बलि समर्पित करता है, उसके ललाट से भयंकर कृत्यायँ उत्पन्न होती हैं, जिनके शरीर रक्त भूषण, वस्त्र, लेप तथा मालाओं से विभूषित रहते हैं । उनसे सिद्धि का निवेदन कर देने पर वे विश्व का संहार कर बैठती हैं । पुनः प्रार्थना करने पर वे देवी के ललाटस्थ नेत्र में तिरोहित हो जाती हैं । उद्यान के जनशून्य स्थान में चक्र पर अवस्थित देवी का ध्यान करके रक्त कमल, चम्पा, अशोक, पाटल, सामान्य कमल तथा सिद्ध द्रव्यों से एक मास तक उनका पूजन करने से माया सिद्ध होती हैं, उनकी कृपा से मनुष्य विश्वविजयी, विश्वचारी, विश्वविनोदी तथा इच्छानुरूप फलभोक्ता होता है । मूलाधार कमल के मध्य देवी का ध्यान करके कर्पूर, चन्दन, तथा कस्तूरी से पूजन करने वाला व्यक्ति त्रिकालज्ञ होता है ॥४४-५२॥ जो नर भक्तिपूर्वक चक्रसहित देवी का स्मरण करके उनके विवेका, विभवा, विश्वा, वितता, कामिनी, खेचरी, गर्वा, पुराणा, परमेश्वरी, गौरी, शिवा, अमेया, विमला, विजया, परा, पवित्रा, पीडनी, विद्या, विश्वेशी, शिववल्लभा, अशेषरूपा, स्वानन्दानु जाक्षी, अनिंदिता, वरदा, वाक्यदा, वाणी, विविधा, वेदविग्रहा, विद्या, वागीश्वरी, सत्या, संयता, सरस्वती, निर्मला, आनंदरूपा, अमृता, मानदा, पूषा, तुष्टि, पुष्टि, रति, धृति, शशिनी, चंद्रिका, कांति, ज्योत्स्ना, श्री, प्रीति, अंगदा—इन नामों का पाठ करके एक चुल्लू जल पिये । फिर मातृका सहित विन्ना, अमृतात्मिका, ताडो, सरस्वती, जिह्वा तथा दीपाकारा का ध्यान करते हुए उस जल का पान कर जाय । एक वर्ष तक, ऐसा करने से अद्भुत पांडित्य की प्राप्ति होती है । जो व्यक्ति नित्य प्रातःकाल शुद्ध मन से ऐसा करता है, वह योगी, ब्रह्मविज्ञानी, शिवयोगी तथा आत्मवेत्ता होता है । उपर्युक्त शक्तियों के साथ अनुग्रहचक्र पर अवस्थित देवी का ध्यान करके चम्पा तथा कमल के पुष्पों से पूजा करने से आरोग्य लाभ होता हैं ॥५३- ६१३॥