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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 854, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 854

नवतितमोऽध्यायः ८३५ चंपकैर्दीवरैर्मासादारोग्यमुपजायते । ज्वरभूतग्रहोन्मादशीतकाकामलाक्षिहृत् ॥६२॥ दंतकर्णज्वरशिरःशूलगुल्मादि कुक्षिजाः । व्रणप्रमेहच्छद्यर्शोग्रहण्यमत्रिदोषजाः ॥६३॥ सर्वे तथा शमं यांति पूजया परमेश्वरी । द्रव्यं चक्रस्य निर्माणे काश्मीरं समुदीरितम् ॥६४॥ सिंदूरं गैरिकं लाक्षा दरदं चंदनद्वयम् । बिल्वद्वारे ऽलिखेत्त्र्यस्त्रं षोडशत्र्यस्रसंयुतम् ॥६५॥ दरदेनास्थ मध्यस्थां पूजयेत्परमेश्वरीम् । ताभिस्तच्छक्तिभिः सार्क सिद्धद्रव्यैः सुगंधिभिः ॥६६॥ कुसुमैर्मासमात्रेण नागकन्यासमन्वितम् । पातालादिषु लोकेषु रमयत्यनिशं चिरम् ॥६७॥ यक्षराक्षसगंधर्वसिद्धविद्याधरांगनाः । पिशाचा गुह्यका वीराः किन्नराः भुजगास्तथा ॥६८॥ सिद्धयंति पूजनात्तत्र तथा तत्प्रोक्तकालतः । किंशुकैर्भूषणावाप्तौ पाटलैर्गजसिद्धये ॥६९॥ रक्तोत्पलैरश्वसिद्धौ कुमुदैश्चरसिद्धये । उत्पलैरूष्ट्रसंसिद्धयै तगरैः पशुसिद्धये ॥७०॥ जंबीरीर्म्महिषावाप्त्यै लकुचैरजसिद्धये । दाडिमैर्निधिसंसिद्धयै मधुकैर्गानसिद्धये ॥७१॥ बकुलैरंगनासिद्धयै कह्लारैः पुत्रसिद्धये । शतपत्रैर्जयावाप्त्यै केतकेर्वाहनाप्तये ॥७२॥ सौरभाढ्यैः प्रसूनैस्तु नित्यं सौभाग्यसिद्धये । पूजयेन्मासमात्रं वा द्विगुणं त्रिगुणं तु वा ॥७३॥ यावत्फलावाप्तिकांक्षी शर्कराघृतपायसैः । सचक्रपरिवारां तां देवीं सलिलमध्यगाम् ॥७४॥ तर्पयेत्कुसुमैः साध्यैः सर्वोपद्रवशान्तये । घृतैः पूर्णायुषः सिद्धयै क्षौद्रैः सौभाग्यसिद्धये ॥७५॥ दुग्धेरारोग्यसंसिद्धयै त्रिमिरैश्वर्यंसिद्धये । नालिकेरोदकैः प्रीत्ये हिमतोयैर्नृपाप्तये सर्वार्थसिद्धये तोयैरभिषिंचेन्महेश्वरोम् ॥७६॥

परमेश्वरी की पूजा करने से ज्वर, भूत, ग्रह, उन्माद, सर्दी, नेत्ररोग, हृदयरोग, दन्तरोग, कर्णरोग, शिरोव्यथा, उदररोग, व्रण, प्रमेह, बवासीर, संग्रहणी तथा अन्य रोग नष्ट हो जाते हैं। चक्र के निर्माण में कुंकुम, सिंदूर, गेरू, लाक्षा, दरद तथा दोनों चन्दनों का उपयोग करना चाहिये । बिल्वद्वार में तीन तथा सोलह त्रिकोणों का उल्लेख करे। मध्य में दरद से परमेश्वरी का पूजन करे। इस तरह एक मास तक सुगंधित सिद्ध द्रव्यों तथा पुष्पों से शक्तियों समेत देवी की आराधना करने से, पाताल, आदि लोकों में रात्रिंदिव नागकन्याओं के साथ रमण करने की क्षमता प्राप्त होती है और यक्ष, राक्षस, गंधर्व, सिद्ध, विद्याधर, अंगना, पिशाच, गुह्यक, वीर, किन्नर तथा सर्प उसके वशीभूत हो जाते हैं ॥६२-६८॥ पलाश पुष्पों से पूजा करने से आभूषणों की प्राप्ति होती है और यावल (त) (जूही) से पूजन करने से हाथी की। रक्त कमल से अश्व की, कुमुद से वाहन की, कमल से ऊँट की, तगर से पशुओं की, नीबू से भैंस की, बड़हल से बकरे की, दाड़िमों से निधि की, महुए से गाने की, मोलसिरी से रमणी की, रक्तकमल से पुत्र की, सौ दल वाले कमल से स्त्री की, केतकी से वाहन की और अत्यन्त सुगंधित कुसुमों से नित्य सौभाग्य की प्राप्ति होती है। पूर्णफल प्राप्ति के लिये एक मास या दो मास या तीन मास तक पूजा करनी चाहिए। अखिल उपद्रवों की शान्ति के लिये शक्कर, घी तथा खीर से चक्र-परिवार सहित सलिलमध्यगामिनी देवी को तृप्त करके पुष्प सहित अर्घ्य प्रदान करे। घृत से देवी को तृप्त करने से पूर्णायु की प्राप्ति होती है और मधु से सौभाग्य की। दूध से आरोग्य की, उक्त तीनों से ऐश्वर्य की, नारियल के जल से प्रेम की, हिमजल से राजा की और जल से सकल प्रयोजनों की प्राप्ति होती है ॥६९-७६॥