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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 855, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 855

८३६ नारदीयपुराणम् पूगोद्याने यजेद्देवीं सिद्धद्रव्यैर्दिवाशिनम् । निवसंस्तत्र तत्पुष्पैर्जायते मन्मथोपमः ॥७७॥ पूर्णासु नियतं देवीं कन्याकायां समर्चयन् । कृत्याः प्रेरिता मंत्रा विमुखांस्तान् ग्रसंति वै ॥७८॥ लिंगत्रयमयीं देवीं चक्रस्थाभिश्च शक्तिभिः । पूजयन्निष्टमखिलं लभतेऽत्र परत्र च ॥७९॥ शतमानकृतैः स्वर्णपुष्पैः सौरभ्यवासितैः । पूजयन्मासमात्रेण प्राग्जन्माद्यैर्विमुच्यते ॥८०॥ तथा रत्नैश्च नवभिर्मासं तु यदि पूजयेत् । विमुक्तसर्वपापौघैस्तां च पश्यति चक्षुषा ॥८१॥ अंशुकैरर्चयेद्देवीं मासमात्रं सुगन्धिभिः । मुच्यते पापकृत्यादिदुःखौघैरितरैरपि ॥८२॥ देवीरूपं स्वमात्मानं चक्रं शक्तीः समंततः । भावयन्विषयैः पुष्पैः पूजयंस्तन्मयो भवेत् ॥८३॥ षोडशानां तु नित्यानां प्रत्येकं तिथयः क्रमात् । तत्तत्तिथौ तद्भजनं जपहोमादिकं चरेत् ॥८४॥ घृतं च शर्करा दुग्धमपूपं कदलीफलम् । क्षौद्रं गुडं नालिकेरफलं लाजा तिलं दधि ॥८५॥ पृथुकं चणकं मुद्गपायसं च निवेदयेत् । कामेश्वर्यादिशक्तीनां सर्वासामपि चोदितम् ॥८६॥ आद्याया ललितायास्तु सर्वाण्येतानि सर्वदा । निवेदयेच्च जुहुयाद्वह्नौ दद्यान्नृणामपि ॥८७॥ तत्तद्विद्याक्षरोक्तामौषधं तत्प्रमाणतः । संपिष्य गुटिकीकृत्य ताभिः सर्वं च साधयेत् ॥८८॥ रविवारेऽरुणांभोजैः कुमुदैः सोमवारके । भौमे रक्तोत्पलैः सौम्येवारे तगरसंभवैः ॥८९॥ गुरुवारे सुकल्हारैः शुक्रवारे सितांबुजैः । नीलोत्पलैर्मंदवारे पूजयेदिष्टमादरात् ॥९०॥ निवेदयेत्क्रमात्तेषु रविवारादिषु क्रमात् । पायसं दुग्धकदलीनवनीतसिताघृतम् ॥९१॥ एवमिष्टं समाराध्य देवीं गंधादिभिर्यजेत् । ग्रहपीडां विजित्याशु सुखानि च समश्नुते ॥९२॥ पूगीफल के उद्यान में निवास करते हुये उसके पुष्पों तथा सिद्ध द्रव्यों से देवी की अर्चना करने से मनुष्य कन्दर्पत्तुल्य हो जाता है। कन्या (राशि) संक्रान्ति में पड़ने वाली पूर्णिमा में जो देवी की आराधना करता है, उसकी भेजी हुई कृत्यायै शत्रुओं को खा डालती हैं, चक्रावस्थित शक्तियों के साथ लिंगत्रयमयी देवी की पूजा करने से इहलोक तथा परलोक में सकल कामनाओं की पूर्ति होती है। एक सौ सुवासित स्वर्णपुष्पों से एक मास तक देवी पूजन करने वाला व्यक्ति पूर्व जन्मादि के कर्मों से मुक्त हो जाता है। उसी तरह नौ रत्न-पुष्पों से एक मास तक पूजा करने वाला समस्त पापों से रहित होकर अपने चक्षु से देवी का दर्शन करता है ॥७७-८१॥ सुवासित वस्त्रों से एक मास तक पूजा करने वाला समस्त पापकर्मों तथा दुःखों से मुक्त हो जाता है। अपनी आत्मा को चारों ओर शक्तियों से परिवेष्टित देवी समझकर विषय रूपी पुष्पों से उनका पूजन करते हुए तन्मय हो जाना चाहिए। सोलह नित्याओं में से प्रत्येक की अलग-अलग तिथि है। तत्तत् तिथि में तत्तत् नित्या के लिये जप, होम, भजन आदि करना चाहिये । घी, शक्कर, दूध, पुआ, केला, मधु, गुड़, नारियल, लावा, तिल, दधि, चिड़वा ,चना तथा मूंग की खीर कामेश्वरी आदि समस्त शक्तियों को समर्पित करे ॥८२-८६॥ आद्या तथा ललिता को ये वस्तुएं सदा समर्पण करे, तदपश्चात् वह्नि में हवन करे। तत्तत् मंत्रों के अक्षर प्रमाण औषधि को पीस कर गोली बनाये और उनसे सबको सिद्ध करे। रविवार में लाल कमलों से, सोमवार में कुमुदों से, मंगल को रक्त कमलों से, बुध को तगर से, वृहस्पति को रक्त कमलों से, शुक्रवार को श्वेत कमलों से ओर शनिवार को नीलकमलों से आदरपूर्वक इष्ट देवी की पूजा करनी चाहिये। रविवार आदि दिनों में क्रमश: खीर, दूध, केला, मक्खन, चीनी तथा घी समर्पित करना चाहिए ॥८७-९१॥ इस प्रकार इष्ट की पूजा कर गन्ध आदि से देवी की आराधना करने वाला व्यक्ति शीघ्र ग्रहपीडा को