बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवतितमोऽध्यायः ८३७
अर्धरात्रे तु साध्यां स्त्रीं स्मरन्मदनवह्निना । दह्यमानां हृतस्वांतां मस्तकस्थःपितांजलिम् ॥९३॥ विकीर्णकेशीमालोललोचनामरुणारुणाम् । वायुप्रेखत्पताकास्थपदां पद्मकलेवराम् ॥९४॥ विवेकविधुरां मत्तां मानलज्जाभयातिगाम् । चिंतयन्नर्चयेच्चक्र' मध्ये देवीं दिगंबराम् ॥९५॥ जपादाडिमबंधूककिंशुकैद्यैः समर्चयेत् । अन्यैः सुगंधिशेफालीकुसुमाद्यैः समर्चयेत् ॥९६॥ त्रिसप्तरात्रादायाति प्रोक्तरूपा मदाकुला । यावच्छरीरपातः स्याच्छापो वानपगास्य सा ॥९७॥ पद्मैरक्तैस्त्रिमध्वक्तैर्होमाल्लक्ष्मीमवाप्नुयात् । तथैव कैरवै रक्तरंगनाः स्ववशं नयेत् ॥९८॥ समानरूपवत्सायाः शुक्लाया गोः पयःप्लुतैः । मल्लिकामलतीजातीशत्पत्रैर्हुतैर्भवेत् ॥९९॥ कीर्तिविद्याधनारोग्यसौभाग्यवित्तपादिकम् । आरग्वधप्रसूनैस्तु क्षौद्रायुतैर्हवनाद्भवेत् ॥१००॥ स्वर्णादिस्तंभनं शत्रोर्नृपादीनां क्रुधोऽपि च । आज्याक्तैः करवीरोत्थैः प्रसूनैररुणैर्हुतैः ॥१०१॥ रक्तांबराणि वनिता नृपामात्यवशं तथा । भूषावाहनवाणिज्यसिद्धयश्चास्य वांछिताः ॥१०२॥ लवणैः सर्षपैर्गौरैस्तैलैर्वाथ होमतः । सतैलावर्तैनिशामध्ये स्वा नयेद्वांछितां वधूम् ॥१०३॥ तैलाक्तैर्जुहुयात्कृष्णदत्तूरपुष्पैनिशांतरे । मासादरातस्तस्यातिज्वरेण भवति ध्रुवम् ॥१०४॥ आरुष्करैघृताभ्यक्तैस्तत्तद्बीजैर्निशि होमतः । शत्रोर्दाहव्रणानि स्युर्दुःसाध्यानि चिकित्सकैः ॥१०५॥ तथा तत्तैलसंसिक्तैर्बीजैरंकोलकेरपि । मरिचैः सर्षपाज्याक्तैनिशि होमानुसारतः ॥१०६॥ वांछितां वनितां कामज्वरातमानयेदद्भुतम् । शालिभिश्चाज्यसंसिक्तैर्होमाच्छालीनवाप्नुयात् ॥१०७॥
जीतकर सुखों को प्राप्त करता है । (स्त्री को सिद्ध करने वाला साधक) अर्ध रात्रि के समय साध्य स्त्री का इस प्रकार स्मरण करे, कि वह कामाग्नि से दग्ध हो रही है, चित्त को चुराने वाली हैं, मस्तक पर हाथों को रखे हुई है, उसके बाल बिखरे हुए हैं, नेत्र दीर्घ तथा अरुण हैं, पैर वायु में झूलती हुई पताका पर स्थित हैं, शरीर कमल तुल्य कोमल है, उसमें विवेक का लेश नही है, वह उन्माद से युक्त है और मान, लज्जा तथा भय का अतिक्रमण करने वाली है ॥९२-९४½॥ ऐसी स्त्री का ध्यान कर चक्र के मध्य में दिगंबरा देवी की जपापुष्प (अड़हुल) दाड़िम, बन्धूक (दोपहरिया फूल), पलाशपुष्प तथा अन्य सुगंधित शेफालिका आदि पुष्पों से पूजा करे । इक्कीस रात तक ऐसा करने से उक्त रूपक मद विह्वल स्त्री सिद्ध हो जाती है । त्रिमधुयुक्त रक्त कमलों से हवन करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होतो है । रक्त कुमुदों से हवन करने से ललनायें वशीभूत होती हैं। उजले रंग के वछड़े वाली शुक्लवर्णा गौ के दूध से सिंचित मालती, जूही तथा कमल से हवन करने से यश, विद्या, धन, आरोग्य तथा सौभाग्य की प्राप्ति होती है । मधुयुक्त आरग्वध (छितिवन) के कुसुमों से हवन करने से स्वर्णा आदि की प्राप्ति और शत्रु एवम् राजा का स्तंभन होता है ॥९५-१००½॥ घृतयुक्त लाल करवीर से होम करने से वनिता, राजा तथा मन्त्री वशीभूत होते हैं और रक्त वस्त्र, आभूषण, वाहन तथा व्यापार का लाभ होता है । नमक तथा उजले सरसों में तेल मिलाकर निशामध्ये में हवन करने से मन- चाही स्त्री की प्राप्ति होती है । तैलयुक्त कृष्ण दरपुष्पों से एक मास तक होम करने से शत्रु को विषम ज्वर हो जाता है । घृतयुक्त भिलावें के बीजों से रात्रि में होम करने से शत्रु को दाह व्रण होते हैं, जिनकी चिकित्सा वैद्य भी नहीं कर पाते । उसी के तेल भिलाये बीज, अंकोल, मरिच तथा सर्षप से रात्रि में हवन करने से शीघ्र कामज्वर पीड़ित रमणी को प्राप्ति होती है । घृताक्त चावल से होम करने से चावल की प्राप्ति होती है ॥१०१-१०७॥