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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 857, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 857

८३८ नारदीयपुराणम् मुद्‌गैर्मुद्‌गं घृतैराज्यं सिद्धैरित्थं हुतैर्भवेत् । साध्यक्षंवृक्षसंसूतां विष्टपादरजः कृताम् ॥११०८॥ राजीमरीचिलोणोत्थां पुत्तलीं जुहुयान्निशि । प्रपदाभ्यां च जंघाभ्यां जानुभ्यामुरुयुग्मतः ॥११०६॥ नाभेरधस्ताद्धृदयान्मनेनाकण्ठतस्तथा । शिरसा च सुतीक्ष्णेन छित्त्वा शस्त्रेण वै क्रमात् ॥१११०॥ एवं द्वादशधा होमान्नरनारीनराधिपाः । वश्या भवंति सप्ताहाज्ज्वरार्त्तीश्चास्य वांछया ॥११११॥ पिष्टेन गुडयुक्तेन मरिचैर्जीरकैर्युताम् । कृत्वा पुत्तलिकां साध्यनामयुक्तामथो हृदि ॥१११२॥ सनामहोमसंपातघृते पाच्यतां पुनः । स्पृशन्निजकराग्रेण सहस्रं प्रजपेन्मनुम् ॥१११३॥ अभ्यर्च्य तद् घृताभ्यक्तं भक्षयेत्तद्धिया जपन् । नरनारीनृपास्तस्य वश्याःस्युर्मरणावधि ॥१११४॥ शश्वदष्टगंधं संपिष्य कन्यया शिशिरे जले । तेन वै तिलकं भाले धारयन्वश्ययेज्जगत् ॥१११५॥ शालितंडुलमादाय प्रस्थं भांडे नवे क्षिपेत् । समानवर्णवत्साया रक्ताया गोः पयस्तथा ॥१११६॥ द्विगुणं तत्र निक्षिप्य श्रपयेत्संस्कृतेऽनले । घृतेन सिक्तं सिक्थं तु कृत्वा तत्ससितं करे ॥१११७॥ विधाय विद्यामष्टोर्ध्वशतं जप्त्वा हुनेत्ततः । एवं होमो महालक्ष्मीमावहेत्प्रतिपत्कृतः ॥१११८॥ शुक्रवारेष्वपि तथा वर्षान्नृपसमो भवेत् । पंचम्यां तु विशेषेण प्राग्वद्धोमं समाचरेत् ॥१११६॥ तस्यां तिथौ त्रिमध्वक्तैर्मल्लिकाद्यैः सितैर्हुनेत् । अन्नाद्याभ्यांच्च नियतं हुत्वान्नाढ्यो भवेन्नरः ॥११२०॥ यद्यद्धि वांछितं वस्तु तत्तत्सर्वं तु सर्वदा । घृतहोमादवाप्नोति तथैव तिलतंडुलैः ॥११२१॥ अरुणैः पंकजैर्होमं कुर्वंस्त्रिमथुराप्लुतैः । मंडलाल्लभते लक्ष्मीं महतीं श्लाघ्यविग्रहाम् ॥११२२॥ कल्हारैः क्षौद्रसंयुक्तैः पूर्णाद्यं तद्दिनावधि । जुहुयान्नित्यशो भक्त्या सहस्रं विकचैः शुभैः ॥११२३॥ स तु कीर्ति धनं पुत्रान्प्राप्नुयान्नात्र संशयः । चंपकैः क्षौद्रसंसिक्तैः सहस्रहवनाद्‌ध्रुवम् ॥११२४॥ मूंग से होम करने से मूंग की, घृत से घी की और सर्षप से सर्षप की प्राप्ति होती है । साध्यवृक्ष के पुष्पराज, राई, मरिच, तथा लोनी के साग से रात्रि में हवन करने से नर, नारी, तथा नराधिप एक सप्ताह में वशीभूत होते हैं और साधक से इच्छानुसार उन्हें ज्वरपीड़ा भी हो जाती है । यहां होम चरणों के अग्रभाग, जानु, ऊरु, नाभि, हृदय, सिर, कंठ तथा अत्यन्त तेज शिलाशस्त्र से करना चाहिये । गुड़, मरिच तथा जीरे को पीस कर गुड़िया बनाये । उस पर साध्य वस्तु का नाम लिखकर उसे घी में पका डाले । फिर कराग्र से उसका स्पर्श करते हुए एक सहस्र मन्त्र का जप करे । पुनः पूजा करके उसका भक्षण करे । ऐसा करने से मरण पर्यन्त नर, नारियां तथा राजा वशीभूत होते हैं । अष्टगन्धों को शीतल जल से पीस कर किसी कुमारी के द्वारा ललाट पर तिलक लगाये । ऐसा करने से जगत् वशीभूत होता है ॥११०८-१११५॥ एक सेर चावल को लाल रंग के बछड़ वाली रक्तवर्णा गौ के दूध के साथ नवीन पात्र में संस्कृत अग्नि पर पका कर उसमें घी चीनी मिलाकर एक सौ आठ वार मन्त्र पूर्वक हवन करे । प्रतिपदा में ऐसा करने से महा- लक्ष्मी की प्राप्ति होती है । शुक्रवार को भी इस तरह करने से नृप की समता प्राप्त होती है । पंचमी में विशेष करके पूर्ववत् होम करना चाहिए । उस तिथि में त्रिमधुयुक्त मालती से हवन करना चाहिये । अन्न-घी से नियम- पूर्वक होम करने से मनुष्य धनाढ्य होता है । घृत एवम् तिल-तंडुल से होम करने से समस्त अभिलाषाओं की पूर्ति होती है । त्रिमधुयुक्त रक्त कमलों से हवन करने से महालक्ष्मी की प्राप्ति होती है। जो पूर्णिमा से पूर्णिमा तक मधुयुक्त विकसित रक्त कमलों से भक्तिपूर्वक नित्य सहस्र बार हवन करता है, उसे कीर्ति धन तथा पुत्रों की प्राप्ति होती है, इसमें संशय नहीं ॥१११६-१२३½॥ नारद ! जो एक मास तक मधुयुक्त सहस्र चंपकपुष्पों से होम