सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 858, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 858

नवतितमोऽध्यायः ८३६ लभते स्वर्णनिष्काणां शतं मासेन नारद । पाटलेर्घृतसंसिक्तैस्त्रिसहस्रं हुतैस्तथा ॥१२५॥ दर्शादिमासाल्लभते चित्राणि वसनानि च । कर्पूरचंदनाद्यानि सुगन्धानि तु मासतः ॥१२६॥ वस्तूनि लभते हुद्यैरन्यैर्भोगोपयोगिभिः । शालिभिः क्षीरसिक्तैश्च सप्तमीषु शतं हुतम् ॥१२७॥ तेन शालिसमृद्धिः स्यान्मासैः षड्भिरसंशयम् । तिलैर्हुतैस्तु दिवसैर्वर्षैदारोग्यमाप्नुयात् ॥१२८॥ स्वजन्मर्क्षत्रिषु तथा दूर्वामिञ्जुहुयान्नरः । निरांतको महाभोगः शतं वर्षाणि जीवति ॥१२९॥ गुडूचीतिलदूर्वाभिस्त्रिषु जन्मसु वा हुनेत् । तेनायुःश्रीयशोभोगपुण्यनिध्वादिमान्भवेत् ॥१३०॥ घृतपायसदुग्धैस्तु हुतैस्तेषु त्रिषु क्रमात् । आयुरारोग्यविभवेनृपामात्यो भवेत्तथा ॥१३१॥ सप्तम्यां कदलीहोमात्सौभाग्यं लभतेऽन्वहम् । दूर्वात्रिकैस्तु प्रादेशमानैस्त्रिस्वादुसंयुतैः ॥१३२॥ जुहुयाद्दिनशो घोरे सन्निपातज्वरे तथा । तद्दिनेषु जपेद्विद्यां नित्यशः सलिलं स्पृशन् ॥१३३॥ सहस्रवारं तत्तोयैः स्नानं पानं समाचरेत् । पाकाद्यमपि तैरेव कुर्याद्रोगविमुक्तये ॥१३४॥ साध्यर्क्षवृक्षसंचूर्णं त्र्यूषणं सर्षपं तिलम् । पिष्टं च साध्यपादोत्थरजसा च समन्वितम् ॥१३५॥ कृत्वा पुत्तलिकां सम्यग्धृदये नामसंयुताम् । प्राग्वच्छित्वायसैस्तीक्ष्णैः शस्त्रैः पुत्तलिकां हुनेत् ॥१३६॥ एवं दिनैः सप्तभिस्तु साध्यो वश्यो भवेद्दृढम् । तथाविधां पुत्तलिकां कुंडमध्ये निखन्य च ॥१३७॥ उपर्यग्निं निधायाथ विद्यया दिनशो हुनेत् । त्रिसहस्रं त्रियामायां सर्षपैस्तद्रसाप्लुतः ॥१३८॥ शतयोजनदूरादप्यानयेद्दनितां बलात् । वशयेद्वनितां होमात्कौशिकैर्मधुमिश्रितैः ॥१३९॥ नारिकेरफलोपेतैर्गुडैलक्ष्मीमवाप्नुयात् । तथाज्यसिक्तैः कह्लारैः क्षीराक्तैस्तरुणोत्पलैः ॥१४०॥ करता है, वह सौ स्वर्णमुद्राओं को प्राप्त करता है। जो अमावस्या से लेकर एक मास तक तीन हजार घृतयुक्त पाटल-पुष्पों से हवन करता है, उसे चित्रित वस्त्र, कर्पूर, चन्दन, सुगंधित द्रव्य तथा अन्य भोगोपयोगी सुन्दर वस्तुओं का लाभ होता है। सप्तमी तिथि में दूध युक्त चावल से होम करने से छह मासों में मनुष्य के पास चावल की समृद्धि हो जाती है। तिल से होम करने से एक वर्ष में आरोग्य लाभ होता है। जो नर अपने जन्म-नक्षत्र के दिन दूर्वा से, हवन किया करता है, वह महाभोगी तथा सुप्रसन्न रहते हुए सौ वर्षों तक जीता हैं। गुडूच, तिल तथा दूर्वा से जन्म नक्षत्रों के दिन हवन करने से आयु, लक्ष्मी, यश, भोग, पुण्य तथा निधि की प्राप्ति होती है ॥१२४-१३०॥ घी, खीर तथा दूध से जन्म नक्षत्रों में होम करने से आयु, आरोग्य तथा ऐश्वर्य का लाभ और राजा एवम् मन्त्री वशीभूत होते हैं सप्तमियों में केले से होम करने वाला सौभाग्य को प्राप्त करता है। सन्निपात ज्वर के नाश के लिए हरें, बहेड़े और आंवले से हवन करना चाहिये। रोगमुक्ति के लिये मन्त्र का सहस्र बार जप करके जल का स्पर्श करे और उसी जल से स्नान, पान तथा भोजन बनाये। साध्यवृक्ष के चूर्ण, सोंठ, मरिच तथा पीपल के चूर्ण, सरसों और तिल को मिला कर पुत्तलिका बनाये। उस (पुत्तलिका) के हृदय पर साध्य का नाम लिख दे। फिर पहले की तरह तीक्ष्ण शस्त्रों से उस पुत्तलिका को काटकर हवन करे। सात दिनों तक ऐसा करने से साध्य निश्चय ही वशीभूत हो जाता है ॥१३१-१३६॥ उस पुत्तलिका को कुंड के मध्य में गाड़कर ऊपर से आग लगा कर दिन में मन्त्र पूर्वक तीन सहस्र बार हवन करे। फिर रात्रि में उसके ऊपर सरसों के तेल तथा सरसों चढ़ाये। ऐसा करने से वह सौ योजन दूर से भी वनिता को बलपूर्वक ला देती है। मधु मिश्रित गुग्गुल से होम करने से रमणी वशीभूत होती है। गुड़ तथा

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 858, कुल 1008 में से · BharatKosha