बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८४० नारदीयपुराणम् त्रिमध्वक्तैश्चंपकैश्च प्रसूनैर्बकुलोद्भवैः । मधूकजैः प्रसूनैश्च हुतैः कन्यामवाप्नुयात् ॥१४१॥ पुन्नागजेहुतैर्वस्त्रमवाज्यैरिष्टमवाप्नुयात् । माहिषैर्महिषीराजेरजान् गव्यैश्च गास्तथा ॥१४२॥ अवाप्नोति हुतैराज्यैः रत्नै रत्नं च साधकः । शालिपिष्टमयीं कृत्वा पुत्तलीं ससितां ततः ॥१४३॥ हृद्देशन्यस्तनाम्णां पचेत्तैलाज्ययोर्निशि । तन्मनाश्च दिवारात्रौ विद्याजप्तां तु भक्षयेत् ॥१४४॥ सप्तरात्रप्रयोगेण नरो नारी नृपोऽपि वा । दासवद्वशमायाति चित्तप्राणादि चार्पयेत् ॥१४५॥ हयारिपुष्पैर्वरुणैः सितैर्वा जुहुयात्तथा । त्रिसप्तरात्रान्महतीमवाप्नोति श्रियमन्नरः ॥१४६॥ छागमांसेस्विमन्मध्वक्तैर्होमात्स्वर्णमवाप्नुयात् । क्षीराक्तैः सस्यसंपन्नां भुवमाप्नोति मंडलात् ॥१४७॥ पद्माक्षैर्हवनाल्लक्ष्मीमवाप्नोति त्रिभिर्दिनैः । बिल्वैर्दशांशं जुहुयान्मंत्राद्यैः साधने जये ॥१४८॥ एवं संसिद्धमंत्रस्तु मंत्रितैश्चुलुकोदकैः । फणिदष्टमृतानां तु मुखे संताड्य जीवयेत् ॥१४६॥ तत्कर्णयोर्जपन्विद्यंः दृष्ट्या वा जपसिद्धया । संताड्य शीघ्रसहसा मृतमुत्थापयेदिति ॥१५०॥ कृत्वा योनि कुंडमध्ये तत्राग्नौ विविधहुनेत् । तिलसर्षपगोधूमशालिधान्ययवैर्हुनेत् ॥१५१॥ त्रिमध्वक्तैरेशो वा समेतैर्वा समृद्धये । बकुलैश्चंपकैरब्जैः कह्लारै रक्तोत्पलैः ॥१५२॥ कैरवैर्मल्लिकाकुन्दमधूकैर्रविराप्तये । अशोकैः पाटलैबिल्वैर्जातीविकंकतैः सितैः ॥१५३॥ नवनोत्पलैरश्वरिपुजैः कर्णिकारजैः । होमाल्लक्ष्मीं च सौभाग्यं निधिमायुर्यशो लभेत् ॥१५४॥ दूर्वा गुडूचीमश्वत्थं वटमारग्वधं तथा । सिताकंपलक्षजं हुत्वा चिरान्मुच्येत रोगतः ॥१५५॥ नारियल से होम करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। घृतयुक्त श्वेत कमल, दुग्धयुक्त रक्तकमल, त्रिमधुयुक्त चंपक, मोलसिरी तथा मधूक के पुष्पों से होम करने से कन्या की प्राप्ति होती है ॥१३७-१४१॥ पुंनाग के कुसुमों से होम करने से वस्त्रों की प्राप्ति होती है और घृत से इष्ट वस्तु की प्राप्ति होती है। भैंस के घी से हवन करने से भैंस की, बकरी के घी से बकरे की, गौओं के घी से गायों की और रत्न से रत्नों को प्राप्ति होती है। चीनी के साथ चावल को पीस कर पुत्तलिका बनाये। उसके हृदय पर साध्य का नाम लिख कर रात्रि में उसे तेल और घी में पकाये। फिर दिन में मन्त्र का जप करके उसका भक्षण करे। इस प्रकार सात रात्रियों तक प्रयोग करने से नर या नारी या राजा दासवत वश में आ जाता है और अपना चित्त, प्राण आदि समर्पित कर देता है ॥१४२-१४५॥ श्वेत या रक्त करवीर के पुष्पों से इक्कीस रात तक होम करने से महालक्ष्मी की प्राप्ति होती है। त्रिमधुयुक्त छाग के मांस से हवन करने से सुवर्ण-लाभ होता है। क्षीरयुक्त छागमांस से होम करने से बारह दिनों में सस्यपूर्णा भूमि का लाभ होता है। पद्मों से होम करने से तीन दिनों में लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। मन्त्र जप करने के उपरान्त उसका दशांश हवन करना चाहिये। देवी के मंत्र सिद्ध हो जाने पर साधक सांप के काटने से मरे हुए व्यक्ति के मुख में एक चूलू जल देकर जिला सकता है अथवा मृत व्यक्ति के कानों में मंत्र जप कर लाठी की ठोकर से एकाएक उसे उठा सकता है। ऐश्वर्य के लिए कुंड के मध्य में योनिमुद्रा बना कर वहां विधिपूर्वक त्रिमधुयुक्त तिल, सरसों, गेहूँ, चावल तथा यव से हवन करे। लक्ष्मी प्राप्ति के लिए मोलसिरी, चंपक, श्वेतकमल, रक्तकमल, कुमुद, मालती, कुंद तथा मधूक-पुष्पों से होम करना चाहिये ॥१४६-१५२॥ अशोक, पाटल, बिल्व, जूही, श्वेत विकंकत, नीलकमल, करवीर, तथा कनेल से होम करने से लक्ष्मी सौभाग्य, आयु, यश तथा निधि की प्राप्ति होती है। दूर्वा, गुडूच, पीपल, वट, छतिवन सफेद आक तथा पाकर से हवन करने से रोगों का नाश होता है। इक्षु, जंबु, नारियल तथा मोचागुड़ से होम करने वाला साधक निश्चय