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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 860, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 860

नवतितमोऽध्यायः ८४१ इक्षुजंबूनालिकेरमोचागुडसितायुतैः । अचलां लभते लक्ष्मीं भोक्ता च भवति ध्रुवम् ॥१५६॥ सर्षपाज्यैर्हुते मृत्युः काष्ठाग्नो वैरिभृत्यवे । चतुरङ्गुलजैर्होमाच्चतुरङ्गबले रिपोः ॥१५७॥ सप्ताहाद्रोगदुःखार्तिर्भवेत्येव न संशयः । नित्यं नित्यार्चनं कुर्यात्तया होमं घृतेन वै ॥१५८॥ विद्यामिमंत्रिलं तोयं पिवेत्प्रातस्तदाप्तये । चन्दनोशीरकर्पूरकस्तरीरोचनान्वितैः ॥१५६॥ काश्मीरकालागुरुभिर्मुगस्त्रेदप्रभैरपि । पूजयेच्च शिवामेतैर्गन्धैःसर्वार्थसिद्धयं ॥१६०॥ सर्वाभिरपि नित्याभिः प्रातर्मातृकया समम् । त्रिजप्ताभिः पिवेत्तोयं तथा वाक्सिद्धये शिवम् ॥१६१॥ विदध्यात्साधनं प्राग्वद्धर्जलक्षं पयोव्रतः । त्रिस्वादुसिक्तैररुणेरंबुजैर्हवनं चरेत् ॥१६२॥ जपतर्पणहोमार्चातकसिद्धमनुर्नरः । कुर्यादुक्तान्प्रयोगांश्च न चेत्तन्ननुदेवताः ॥१६३॥ प्राणांस्तस्य प्रसंख्येव कुपितास्तत्क्षनान्मुने । अनया विद्यया लोके यदसाध्यं न तत्क्वचित् ॥१६४॥ अरण्यवटमूले च पर्वताग्रगुहामु च । उद्यानमध्यकांतारे मातृपादप्रमूलतः ॥१६५॥ सिंधुतीरे वने चैता यक्षिणीः साधयेन्नरः । कमलैः कैरवै रक्तैः सितैः सौगंधिकोत्पलैः ॥१६६॥ सुगंधिशेफालिकया त्रिमध्वक्तैर्यथाविधि । होमात्सप्तसु वारेषु तन्मंडलत एव वै ॥१६७॥ विजयं समवाप्नोति समरे द्वंद्वयुद्धके । मल्लयुद्धे शस्त्रयुद्धे दावे द्यूताह्वयेऽपि च ॥१६८॥ व्यवहारेषु सर्वत्र जयमाप्नोति निश्चितम् । चतुरंगुलजैः पुष्पैर्होमात्सस्तंमयेदरीन् ॥१६९॥ तथैव कर्णिकारोत्थैः पुन्नागोत्थैनमेरुजैः । चंपकैः केतकै राजवृक्षजैर्माधवोद्भवैः ॥१७०॥ प्राग्वद्हारेषु जुहुयात्क्रमात्पुष्पैस्तु सप्तभिः । प्रोक्तेषु स्तंभनं शत्रोर्भङ्गो वा भवति ध्रुवम् ॥१७१॥ ही अचल लक्ष्मी को प्राप्त कर भोक्ता होता है। शत्रु की मृत्यु के लिये सरसों तथा घी से चिता के अग्नि में हवन करना चाहिए । आरग्वध (छतिवन) से होम करने से शत्रु का सेना को एक सप्ताह के भीतर दुःख-पीड़ा होने लगती है, इसमें संशय नहीं ॥१५३-१५७३॥ विद्या की प्राप्ति के लिये नित्य नित्याओं की अर्चना कर घी से हवन, करके उनके मन्त्र से अभिमंत्रित जल का पान करना चाहिये । सकल कामना सिद्धि के लिये चन्दन उगीर (खसखस), कपूर, कस्तूरी, गोरोचन, कुंकुम, कागुरु तथा सुगंधित द्रव्यों से शिवा की पूजा करनी चाहिये । वाक्सिद्धि के लिये समस्त नित्याओं के साथ शांतियों का पूजन करके उनके मंत्रों का जप करे और उनसे अभिमंत्रित जल का पान करे । तदनन्तर त्रिमधु युक्त रक्तकमलों से हवन करे जप, तर्पण होम तथा पूजन से मन्त्रों को सिद्ध करके साधक पूर्वोक्त प्रयोगों को करे। अन्यथा कुपित देवियां उसके प्राण ले लेती हैं । लोक में तन्त्र विद्या से जो वस्तु सिद्ध नहीं होगी, वह किसी से भी नहीं हो सकती ॥१५८-१६४॥ वन में वटवृक्ष की जड़ में, पर्वत की चोटी पर या गुफा में, उद्यान में मातृवृक्ष के मूल में, समुद्रतट पर यक्षिणियों की सिद्ध करना चाहिए । कमल, कैरव, रक्त, तथा श्वेत कमल और त्रिमधुयुक्त सुगंधित शेफालिका से विधिपूर्वक होम करना चाहिये । सात दिन इस तरह होम करने से समर में द्वंद्वयुद्ध, मल्लयुद्ध, शस्त्रयुद्ध वाद, जूआ, व्यवहार सर्वत्र विजय प्राप्त होती है, इसमें संशय नहीं। आरग्वध से होम करने से शत्रुओं का स्तंभन होता है । कर्णिकार, पुन्नाग, सुरपुन्नाग, चंपक, केतकी, राजवृक्ष तथा माधव के पुष्पों से हवन करने से शत्रु का स्तंभन या नाश हो जाता है, इसमें संशय नहीं ॥१६५-१७१॥ नक्षत्रवृक्ष की अग्नि में सरसों तथा घी मिलाये उसी वृक्ष की समिधा से हवन करने से शत्रु तुरन्त पादा- भिवादन करने लगते हैं । पहिले सम्यक् प्रकार से दिनकर की अर्चना करके मृत्युकाष्ठ की अग्नि में मृत्युपत्र, १०६ ना० पु०