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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 861, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 861

८४२ नारदीयपुराणम् शत्रोर्नक्षत्रवृक्षान्नौ तत्समिद्भिस्तु होमतः । सर्व्वाज्यप्लुताभिस्ते प्रणमंत्येव पादयोः ॥१७२॥ मृत्युकाष्ठानले मृत्युपत्रपुष्पफलैरपि । समिद्भिर्जुहुयात्सम्यग्वारेशार्चनपूर्वकम् ॥१७३॥ अरातेश्चतुरङ्गं तु बलं रोगार्त्त भवेत् । तेनास्य विजयो नूनन्निधनेनापि वा पुनः ॥१७४॥ अर्कखदिरकंजैरैश्शैः समिद्धेऽग्नौ तदुद्भवैः । पत्रैः पुष्पैः फलैः काष्ठैर्मूलैश्चापि हुनेत्क्रमात् ॥१७५॥ सव्रणैश्शदशताया घृतसिक्तैस्तु मण्डलात् । अरातिविङ्कुजो भूत्वा कुंडे व्यर्ते विधानतः ॥१७६॥ पलायते वा रोगार्त्तः प्रणमेद्वा भयान्वितः । पलाशेश्मानले तस्य पंचांगैस्तद्घृताप्लुतैः ॥१७७॥ होमेन सोमवारे च भवेत्प्राग्वन्न संशयः । खादिरेष्मानले तस्य पंचांगैस्तद्घृताप्लुतैः ॥१७८॥ वारे भौमस्य हवनात्तदाप्नोति सुनिश्चितम् । अपामार्गस्य सौम्येऽह्नि पिप्पलस्य गुरोर्दिने ॥१७९॥ उदुम्बरस्य भृगुजे शम्या मांर्देऽह्नि गोघृतैः । शुभ्रपीतसितश्यामवर्णाद्याः पूर्ववत्तया ॥१८०॥ तत्फलं समवाप्नोति तत्समिद्दीपितेऽनले । प्रतिपत्प्रिथिमारभ्य पंचम्यंतं क्रमेण वै ॥१८१॥ शालींश्चणकमुद्गांश्च यवमादेश्च होमतः । माहिषाज्यप्लुताँस्तैस्त्वाम्निक्षितिथिभिः समवाप्नुयात् ॥१८२॥ षष्ठ्यादिसप्तम्यंतं तु चाजाभवघृतैस्तथा । प्रागुक्तैर्निसुखैर्होमात्प्रागुक्तफलमाप्नुयात् ॥१८३॥ तदूर्ध्वं पंचके श्वेतैः समस्तेश्च तिलद्वयैः । सितान्नैः पायसैः सिक्तैराविर्केस्तु घृतैस्तथा ॥१८४॥ हवनात्तदवाप्नोति यदादौ फलमीरितम् । एवं नक्षत्रवृक्षोत्थबह्नौ तैस्तैर्मधुप्लुतैः ॥१८५॥ हवनादपि तत्प्राप्तिर्भवत्येव न संशयः । विद्यां संसाध्य पूर्वं तु पश्चादुक्तान्सशेषतः ॥१८६॥ प्रयोगात्साधयेद्धीमान् मंगलायाः प्रसादतः । संपूज्य देवतां विप्र कुमारीं कन्यकां तु वा ॥१८७॥ समुभाध्यवां मुग्धां स्नातां धोतांबरां शुभाम् । तथाविधं कुमारं वा संस्थाप्याभ्यर्च्य विद्यया ॥१८८॥ स्पृष्टशोर्षो जपेद्विद्यां शतवारं तयार्चयेत् । प्रसूनैररुणैः शुभ्रैः सौरभाढ्यैरथापि वा ॥१८९॥ पुष्प, फल तथा समिधाओं से हवन करने से रिपु की चतुरंगिणी सेना रोगाक्रान्त हो जाती है। उससे साधक की विजय होती है तथा शत्रु का निधन होता है। रविवार तथा सोमवार को घृतयुक्त आक की समिधा से पलाश-समिधा की अग्नि में हवन करने से शत्रुनाश होता है, इसमें संशय नहीं, मंगलवार को खैर की समिधा से बने अग्नि में उसी की समिधा तथा घृत से हवन करने से निश्चय ही शत्रुओं का नाश होता है । बुध को अपामार्ग से, बृहस्पति को पीपल से, शुक्र को गूलर से और शनि को शमीवृक्ष की समिधा से गोघृत मिलाकर हवन करने से पूर्वोक्त फल प्राप्त होता है ॥१७२-१८०१/२॥ प्रतिपदा से लेकर पंचमी तक क्रमशः चावल, चना, मूंग, यव तथा माष से भैंस के घी के साथ होम करने से पूर्वोक्त फल मिलता है। षष्ठी से लेकर सप्तमी तक बकरी के घृत के साथ उक्त वस्तुओं से होम करने से पूर्वोक्त फल की प्राप्ति होतो है। भेड़ के घी के साथ तिल, चीनो, तथा खीर से होम करने से पूर्वोक्त फल मिलता है। नक्षत्रवृक्ष की समिधा से बने अग्नि में मधुयुक्त पूर्वोक्त वस्तुओं से हवन करने पर भी निःसंदेह पूर्वोक्त फल मिलता है। बुद्धिमान् व्यक्ति पहले मंत्र को सिद्ध कर पश्चात् मंगला की कृपा से अशेष प्रयोगों को करे ॥१८१-१८६१/२॥ विप्र ! साधक देवता का पूजन कर शुभ अंगों वाली, मुग्धा, स्नाता तथा धोतवस्त्रा कुमारीकन्या तथा वैसे ही कुमार की पूजा करे। मन्त्र से शिर को छूकर सौ बार मन्त्र का जप करे सुगंधिपूर्ण और रक्त, श्वेत पुष्पों तथा गुग्गुल, धूप आदि से कुमारी-कुमार की अर्चना करे । तदनन्तर देवी के मंदिर में भक्तिपूर्वक उपचारों से उनकी पूजाकर मन्त्र का जप करे। तत्पश्चात् देवी से जो प्रश्न किया जायेगा, उसका उत्तर उनसे मिल जाएगा।