बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 862, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवतितमोऽध्यायः ८४३ दद्याद्गुग्गुलुधूपं च यावत्कर्मावसानकम् । ततो देव्या समाविष्टे तस्मिन्संपूज्य भक्तितः ॥१९०॥ ततस्तामुपचारैस्तैः प्रागुक्तैर्विद्यया व्रती । प्रलपंस्तां ततः पृच्छेद्धीष्टं कथयेच्च सा ॥१९१॥ भूतं मनद्भवष्यिं च यदन्यन्मनसि स्थितम् । जन्मांतराण्यतीतानि सर्व सा पूजिता वदेत् ॥१९२॥ ततस्तां प्राग्वदभ्यर्च्य त्वात्मन्युद्वास्य तां जपेत् । सहस्रवारं स्थिरधीः पूर्णात्मा विचरेत्सुखी ॥१९३॥ मधूत्रयसंसिक्तैरुणैरंबुजैः श्रियम् । प्राप्नोति मंडलं होमात्सितैस्तैश्च महद्यशः ॥ १९४॥ क्षौद्राक्तैरुत्पलै रक्तैर्हवनात्प्रोक्तकालतः । सुवर्णं समवाप्नोति निधि वा वसुधां तु वा ॥१९५॥ क्षीराक्तैः कैरवैर्होमात्प्रोक्तं काममवाप्नुयात् । धान्यानि विविधान्याशु सुभगः स भवेन्नरः ॥१९६॥ आज्याक्तैरुत्पलैर्होमाद्वांछितं समवाप्नुयात् । तद्वत्तैरपि कह्लारैर्हवनाद्राजवल्लभः ॥१९७॥ पलाशपुष्पैस्त्रिस्वादुयुक्तैस्तत्कालहोमतः । चतुर्विधं तु पांडित्यं भवत्येव न संशयः ॥१९८॥ लाजैस्त्रिमधुरोपेतैस्तत्कालहवनेन वै । कन्यकां लभते पत्नीं समस्तगुणसंयुताम् ॥१९९॥ नालिकेरफलोद्भवै ससितं सगुडं तु वा । ओद्राक्षं जुहुयात्सर्वद्रव्यत्त्वाद्धनदोपमः ॥२००॥ तयैवान्नाज्यहोमेन सतंडुलतिलैरपि । प्रसूनैररुणैस्तद्वत्तथा बंधूकसंभवैः ॥२०१॥ सितैः प्रसूनैर्वाक्सिद्धि हवनात्समवाप्नुयात् । सितरक्तैस्तु मिलितैरायुगरोग्यमाप्नुयात् ॥२०२॥ दुर्वाभिस्त्रिमध्वक्तैर्हवनात् जयेच्च तान् । तथा गुडूच्या होमेन पायसेन तिलेन च ॥२०३॥ श्रीखंडपंककर्पूरमिलितैः शतपत्रकैः । हवनाच्छ्रियमाप्नोति यावदन्यगा भवेत् ॥२०४॥ कुंकुमं हिमतोयेन पिष्ट्वा कर्पूरसंयुतम् । तत्पंकमद्दितैर्होमात्कह्लारैर्विकचैः सुमैः ॥२०५॥ राजकल्पः श्रिया भूयाज्जीवेद्वर्षशतं भुवि । निःसपत्नौ निरांतको निर्द्वन्द्वो निर्मलाशयः ॥२०६॥ भूत, भविष्यत्, वर्तमान जो कुछ मन में रहेगा, वह सब मालूम हो जायगा। इस प्रकार पूजिता होने पर देवी जन्म-जन्मान्तर की बात भी बता देती हैं। तदुपराम्त पूर्ववत् देवी की अर्चना कर सहस्र बार मंत्र का जप करे। ऐसा करने से स्थिर बुद्धि, पूर्णात्मा साधक सुख से विहार करता है ॥१८७-१९०॥ त्रिमधुयुक्त रक्त तथा श्वेत कमलों से होम करने से लक्ष्मो एवम् महायश की प्राप्ति होती है। मधुयुक्त रक्तकमलों से हवन करने से सुवर्ण या निधि या भूमि की प्राप्ति होती है दुग्धयुक्त कैरवों से होम करने से कामना पूर्ण होती है और वह मनुष्य शीघ्र सौभाग्यवान् तथा धन-धान्य संपन्न हो जाता है। घृतयुक्त रक्त कमलों से हवन करने से वांछित फल की प्राप्ति होती है। श्वेत-रक्त कमलों से हवन करने वाला व्यक्ति राजा का प्रिय होता है। त्रिस्वादुयुक्त पलाशपुष्पों से होम करने से तत्काल चारों प्रकार के पांडित्यों की प्राप्ति होती है, इसमें संशय नहीं ॥१६१-१९८॥ त्रिमधुयुक्त लावा से होम करने से सर्वगुणसंपन्ना कन्या की प्राप्ति होती है। चीनी, गुड़, तथा मधु सहित नारियल से होम करने वाला व्यक्ति कुबेर के तुल्य होता है। अन्न तथा घी से होम करने से, तंडुल तथा तिल से होम करने से और रक्त पुष्प तथा दोपहरिया पुष्पसे हवन करने से भी पूर्वोक्त फल मिलता है। श्वेत पुष्पों से हवन करने से वाक्सिद्धि होती है। मिश्रित, श्वेत तथा रक्त पुष्पों से हवन करने से आयु और आरोग्य की प्राप्ति होती है। त्रिमधुयुक्त दूर्वा से हवन करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। गुडूच, क्षीर तथा तिल से होम करने से भी पूर्वोक्त फल मिलता है। श्रीखंड चंदन कपूर तथा कमल से एक साथ हवन करने से लक्ष्मी पीछे-पीछे चलती है। १९६-२०४॥ हिम जल से कुंकुम को पीस कर उसमें कपूर मिलाकर रक्त कमलों पर लेप करने से राजा के तुल्य लक्ष्मी की प्राप्ति होती है और वह व्यक्ति पृथ्वी पर शत्रुहीन दुःखहीन, निर्द्वन्द्व तथा निर्मलचित्त होकर