बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 863, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें८४४ नारदीयपुराणम् इक्षुकाण्डस्य शकलैर्हवनाद्वस्त्रमाप्नुयात् । तथैव करबीरोत्थैः प्रसूनैररुणैः सितैः ॥२०७॥ क्षौद्राक्तैः पाटलापुष्पैर्हवनावशयेद्वधूः । तथैव पंकजैर्होमाद्रूपाजीवां वशं नयेत् ॥२०८॥ सस्रवत्सासितगोक्षीराक्तसितहोमतः । लभतेऽनुपमां लक्ष्मीमपि पाविष्ठचेतनः ॥२०९॥ सौवीराक्तैस्तु कार्पासबीजस्तत्कालहोमतः । अर्द्धेन्दुकुंडे नियतं वशगा रिपवो मुने ॥२१०॥ अरिष्टपत्रैस्तद्द्बीजैस्तद्गहौ तैस्तथा हुतैः । मृत्युबीजैर्निम्बतेलसिक्तैर्होमान्निहंति तान् ॥२११॥ रोगार्त्तास्तुरगांस्तद्वत्पंचगव्यैर्हु तैध्रुवम् । अक्षबीजैस्तु तैलाक्तैर्होमः सर्वविनाशनः ॥२१२॥ करंजबीजैः संसिक्तैर्होमाद्वैरी पिशाचवान् । तथैवाक्षतरूद्भूतपंचान्गहवनादपि ॥२१३॥ निजतैलान्वितैरक्षद्रुमबीजैस्तु होमतः । तद्दिने स्यादपस्मारी वैरी भवति निश्चितम् ॥२१४॥ अरातेर्जन्मनक्षत्रवृक्षैधनगतेऽनले । तद्योनिपिशितैस्तैश्च हवनान्मृत्युऋद्रिपोः ॥२१५॥ पद्माक्षबीजैः सर्वपतैलावर्तैर्हवनात्तथा । जायंते वैरिणः कुष्ठरोगा देहविलोपकाः ॥२१६॥ मरिचैः सर्षपैर्होमात्तैलाक्तैर्मत्स्यराजके । दाहज्वरेण ग्रस्तः स्यादरातिस्तद्दिने ध्रुवम् ॥२१७॥ एवं निग्रहहोमेषु स्वरक्षायै तथान्वहम् । स्निग्धैः संप्राप्तसिद्ध्यैर्जपहोमादि कारयेत् ॥२१८॥ मृत्युंजयेन वा तत्तत्प्रयोगस्याभिरेव वा । विद्याभिरन्यथासिद्धमंत्रमस्याशु नाशयेत् ॥२१९॥ लक्षत्रयं कृते प्रोक्तं त्रेतायां द्विगुणं तथा । द्वापरे त्रिगुणं प्रोक्तं कलौ तत्तु चतुर्गुणम् ॥२२०॥ दशांशं हवनं कार्यं तर्पणं तद्दशांशतः । तद्दशांशं मार्जनं स्याद्दशांशं द्विजभोजनम् ॥२२१॥
सौ वर्ष जीता है । इक्षु के खण्डों से हवन करने से वस्त्र की प्राप्ति होती है । मधुयुक्त रक्त तथा श्वेत करवीर के पुष्पों एवम् पाटल पुष्पों से हवन करने से स्त्री वशीभूत होती है । कमलों से होम करने से वेश्या वश में आती हैं । श्वेत वर्णवाली गाय के, जिसके बछड़े का भी वहीं रंग हो, दूध में कमलों को डुबो कर हवन करने से पवित्र साधक को भी अनुपम लक्ष्मी की प्राप्ति होती है । अर्धचन्द्राकार कुंड में बेर तथा कपास के बीजों से हवन करने से शत्रु वशीभूत हो जाते हैं ॥२०५-२१०॥ अरिष्ट (रीठे) के पत्र उसके बीज तथा नीम के तेल से संसिक्त मृत्युबीज (बांस) से अरिष्ट की समिधा से बने अग्नि में होम करने से शत्रुओं का नाश होता है । पंचगव्य तथा तैलाक्त अक्षबीज (बहेड़े) से हवन करने से समस्त रोगों का नाश होता है । करंज की समिधा से होम करने से शत्रु को पिशाच लग जाता है । बहेड़े की समिधा से हवन करने से भी पूर्वोक्त फल प्राप्त होता है नीम के तेल से संसिक्त बहेड़े की समिधा से होम करने से भी शत्रु को उसी दिन अपस्मार (मिरगी) रोग हो जाता है । शत्रु के जन्म नक्षत्र के दिन किसी वृक्ष में लगे हुए अग्नि में शत्रु की योनिवाले जन्तु के मांस से होम करने से रिपु की मृत्यु हो जाती है ॥२११-२१५॥ सरसों के तेल और कमलबीज से हवन करने से शत्रु के शरीर में कुष्ठ रोग हो जाता है । सर्षप तेल एवम् मरिच से हवन करने से शत्रु उसी दिन दाहज्वर से ग्रस्त हो जाता है । अपनी रक्षा के लिये नित्य मन्त्र पूर्वक जप, होम आदि करना चाहिये । मृत्युंजय-जप भी करते रहना चाहिये, अन्यथा सिद्ध मन्त्र साधक को शीघ्र नष्ट कर देता है । सत्ययुग में मन्त्र को सिद्ध करने के लिये तीन लाख जप करने की आवश्यकता होती है, त्रेता में उसके द्विगुण, द्वापर में त्रिगुण, और कलियुग में चतुर्गुण । मंत्र का दशांश हवन, हवन का दशांश तर्पण, तर्पण का दशांश मार्जन और मार्जन का दशांश ब्राह्मण भोजन कराना