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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 878, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 878

एकूनविंशतितमोऽध्यायः। ८५९ फट्न्तश्चण्डमन्त्रोऽयं त्रिवर्णात्मा समीरिनः । अस्य त्रितो मुनिः प्रोक्तश्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम् ॥२०८॥ चंडेशो देवता प्रोक्ता वक्ष्यतेऽङ्गप्रकल्पनम् । हृदयं दीप्तफट् प्रोक्तं ज्वलफट् शिर ईरितम् ॥२०९॥ शिखाज्वालिनि फट् प्रोक्ता वहफट् कवचं मतम् । ॥२११॥ हलफट् नेत्रमाख्यातं सर्वज्वालिनि फट् परम् विन्यस्यैवं षडंगानि ततो देवं विचिंतयेत् । चंडेश्वरं रक्ततनुं त्र्यक्षं रक्तांबरावृतम् ॥२१२॥ दधतं च त्रिशूलाक्षमालाटं ककमंडलूं । वर्णलक्षं जपेन्मन्त्रं होमं कुर्याद्दशांशतः ॥२१३॥ मधुत्रयसंयुक्तैर्विशुद्धैस्तिलतंडुलैः । पंचाक्षरोदिते पीठे मूर्ति मूलेन कल्पयेत् ॥२१४॥ कर्मेशो बिंदुसंयुक्तस्ततश्चंडेश्वराय च । हृदयं मनुराख्यातश्चंडेशस्य प्रपूजने ॥२१५॥ अंगैर्मातृभिराशैश्चवज्राद्यैरावृतिर्भवेत् । शैवमंन्त्रेषु निष्णातश्चण्डेश्वरमनुं जपेत् ॥२१६॥ सर्वान्कामानवाप्नोति परत्रेह च नंदति । शृणु नारद वक्ष्यामि दिव्यं माहेश्वरं स्तवम् ॥२१७॥ यस्य पाठेन पूजायां सिद्ध्यंति मन्त्रोऽखिलाः ॥२१८॥ धराम्ब्वग्निमरुद्व्योममखेशेन्द्वर्कमूर्तये । सर्वभूतान्तरस्थाय शंकराय नमोनमः ॥२१९॥ श्रूयंतकृतवासाय श्रुतये श्रुतिजन्मने । अतीन्द्रियाय महसे शाश्वताय नमोनमः ॥२२०॥ स्थलसूक्ष्मविभागाभ्यामनिर्देश्याय शंभवे । भवाय भवसद्भूतदुःखहन्त्रे नमोनमः ॥२२१॥ तर्कमार्गातिदूराय तपसां फलदायिने । चतुर्वर्गवदान्याय सर्वज्ञाय नमोनमः ॥२२२॥ आदिमध्यांतशून्याय निरस्ताशेषभीतये । योगिध्येयाय महते निर्गुणाय नमोनमः ॥२२३॥ विश्वात्मने विविक्ताय विलसच्चंद्रमौलये । कंदर्पदर्पनाशाय कालहंत्रे नमोनमः ॥२२४॥ देते हैं। "अंकुश ....... फट्" —यह चन्द्रमन्त्र कहलाता है। इसके मुनि त्रित हैं, छन्द अनुष्टुप् है और देवता चण्डेश हैं। 'दीप्त फट्' 'ज्वल फट्' आदि पदों का उच्चारण कर हृदय, शिर, नेत्र आदि छह अंगों का न्यास करे ॥२०५-२११॥। तदुपारन्त रक्त शरीर वाले, तीन नेत्र वाले, त्रिशूल, रुद्राक्षमाला, टंक, कमंडलु तथा रक्त वस्त्र धारण करने वाले शंकर का ध्यान कर तीन लाख मन्त्र को जपे और उसका दशांश त्रिमधुयुक्त शुद्ध तिल- तंडुल से होम करे। पुनः पंचाक्षर पीठ पर मूल मन्त्र से मूर्ति की कल्पना कर “कूर्म्मेशः च..... हृदयम्"—इस मन्त्र से चंडेश की पूजा करे। तत्पश्चात् सांगोपांग मातृगण और वज्र आदि आयुधों समेत लोकपालों की अर्चना कर शैव मन्त्रों में निष्णात साधक चण्डेश्वर के मन्त्र का जप करे ॥२१२-२१६॥ उपर्युक्त प्रकार से शिव की आराधना करने वाला व्यक्ति इस लोक में समस्त कामनाओं को प्राप्त कर परलोक में आनन्दोपभोग करता है। नारद ! अब मैं महेश्वर के दिव्य स्तोत्र को बता रहा हूँ, जिसका पूजा के समय पाठ करने से सकल मन्त्र सिद्ध हो जाते हैं--"पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, अग्नि, इन्द्र, चन्द्र, तथा सूर्य रूपी शंकर को नमस्कार है। सकल प्राणियों में वास करने वाले शिव को नमस्कार है। श्रुतियों के अन्त में वास करने वाले, श्रुतिरूप, श्रुतिजन्मा, इन्द्रियों से परे, तेजोरूप, शाश्वत शम्भु को नमस्कार है। स्थूल तथा सूक्ष्म विभाग से अनिर्देश्य, सांसारिक दुःख का हरण करने वाले भवरूप शिव को नमस्कार है ॥२१७-२२१॥ तर्कमार्ग से अत्यन्त दूर रहने वाले, तपस्या के फल देने वाले धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त कराने वाले सर्वज्ञ शिव को नमस्कार है । आदि, मध्य और अन्त से रहित, समस्त प्रकार के भयों से शून्य, योगियों के ध्यान करने योग्य, निर्गुण, महान्, शंकर को नमस्कार है। विश्वात्मा एकान्तप्रिय, चन्द्रमा से सुशोभित ललाट