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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 877, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 877

८५८ | नारदीयपुराणम् ताराद्यो वसुवर्णोऽयं क्षेत्रपालस्य कीर्तितः । षड्दीर्घयुक्तबीजेन षडंगं न्यस्य चिन्तयेत् ॥१६२॥ नीलाचलाभं दिग्वस्त्रं सर्पभूषं त्रिलोचनम् । पिंगोध्वंकेशान्दधतं कपालं च गदां स्मरेत् ॥१६३॥ लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं जुहुयात्तद्दशांशतः । चरुणा घृतसिक्तेन ततः क्षेत्रे समर्चयेत् ॥१६४॥ धर्मादिकल्पिते पीठे सांगावरणमादरात् । तस्मै सपरिवाराय बलिमेतेन निर्हरेत् ॥१६५॥ पूर्वमेद्विद्वयं पश्चाद्विद्विषं पुरुपं द्वयम् । भञ्जय द्वितयं भूयो नर्तय द्वितयं पुनः ॥१६६॥ ततो विघ्नपडूद्वन्द्वं महाभैरव तत्परम् । क्षेत्र पालवलिं गृह्णद्वयं पावकसुन्दरी ॥१६७॥ बलिमन्त्रोऽयमाख्यातः सर्वकामफलप्रदः । सोपदेशं बृहत्पिण्डे कृत्वा रात्रिषु साधकः ॥१६८॥ स्मृत्वा यथोक्तं क्षेत्रेशं तस्य हस्ते बलिं हरेत् । बलिदानेन सन्तुष्टः क्षेत्रपालः प्रयच्छति ॥१६६॥ कांतिं मेधां बलारोग्यं तेजः पुष्टिं यशः श्रियम् । उद्धरेद्वटुकं ङेतमापदुद्धारणं तथा ॥२००॥ कुरुद्वयं ततः पश्चाद्वटुकं ङेतमुच्चरेत् । शक्विरुद्रौ ध्रुवादिश्च द्वाविंशत्यक्षरो मनुः ॥२०१॥ द्विचतुःसप्तवेदाब्धिचंद्रांगैरंगकं मनोः । वालं स्फटिकसंकाशं तल्लोललसिताननम् ॥२०२॥ दिव्या कल्पैः प्रदीप्तांगं त्र्यक्षं दंडत्रिशूलिनम् । सुप्रसन्नं स्मरेद्भक्त्या भक्तानामभयंकरम् ॥२०३॥ वर्णलक्षं जपेन्मन्त्रं हविष्याशी जितेन्द्रियः । तद्दशांशं प्रजुहुयात्तिलैर्मधुरसंयुतैः ॥२०४॥ धर्मादिकल्पिते पीठे पंकेजे चातिशोभने । षट्कोणांतस्त्रिकोणस्थव्योमपंकजसंयुते वटुकं पूजयेद्देवं सांगावरणकं क्रमात् । शत्रुपक्षस्य रुधिरं पिशितं च दिने दिने । भक्षयस्व गणैः सार्द्ध सारमेयसमन्वितः ॥२०५॥ ॥२०६॥ बलिमन्त्रोऽयमाख्यातः शत्रुनाम्ना विदर्भितः । अनेन बलिना हृष्टो वटुकः परसैन्यकम् ॥२०७॥ छित्त्वा गणेभ्यो विभजेदामिषं क्रुद्धमानसः । अङ्क शो वह्निशिखरो लांतवांत इतीरितः ॥२०८॥ युक्त बीजमंत्र से षडंगन्यास करके नील पर्वत के समान आभा वाले, दिगम्बर, सर्पों से विभूषित, त्रिलोचन, भूरे तथा ऊर्ध्व विस्तृत केशवाले, कपाल एवम् गदा धारण करने वाले शिव का ध्यान करे । तत्पश्चात् एक लाख मन्त्र का जप कर उसका दशांश घृतसिक्त चरु से हवन करे । तदनन्तर धर्मादि कल्पित पीठ पर आदर पूर्वक अंगावरण सहित क्षेत्रपाल की पूजा करके परिवार सहित उनको बलि चढ़ाये । 'पूर्वम्...पावक- सुन्दरी' - यह बलिमन्त्र है, जो अखिल कामनाओं को प्रदान करता है । रात्रि में साधक एक उपकरण सहित बृहत् पिण्ड को लेकर क्षेत्रेश का स्मरण करते हुए उनके हाथ में बलि समर्पित करे ॥१६२-१६९॥ बलि से संतुष्ट होकर क्षेत्रपाल साधक को कांति, मेधा, बल, आरोग्य, तेज, पुष्टि, यश तथा श्री प्रदान करते हैं। "उद्धरेत् ...... ध्रुवादिः"- यह बाईस, अक्षरों का मन्त्र है । मंत्र के दूसरे, चौथे, सातवें और पहले अक्षर से अंगन्यास करना चाहिये । तदनन्तर स्फटिक के समान स्वच्छ वर्ण वाले, चंचल मुख वाले, दिव्य आभूषणों से प्रदीप्त अंग वाले, तीन नेत्र वाले, दण्ड और त्रिशूल धारण करने वाले, भक्तों को अभय दान देने वाले, सदा सुप्रसन्न रहने वाले बाल रूप शंकर का ध्यान करे। फिर हविष्य भोजन तथा इंद्रिय-संयम करते हुए बाईस लाख मन्त्र का जप करे और उसका दशांश मधुरयुक्त तिल से हवन करे ॥२००-२०४॥ अनन्तर धर्मादिकल्पित अत्यन्त मनोहर पद्मपीठ पर अंगावरण सहित बटुक देव की पूजा करे । "शत्रुपक्षस्य... "- यह बलि देने का मन्त्र है। शत्रु का नाम लेकर इस मन्त्र से बटुक को बलि समर्पण करने से उक्तदेव हृष्ट होकर शत्रुसेना को छिन्न-भिन्न करते हुए क्रोध से उसके मांस के टुकड़े-टुकड़े कर