बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 876, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकनवतितमोऽध्यायः ८५७ धारादिपतिरुद्रोऽयं ज्ञापयत्यनिसुन्दरी । खङ्गरावणमंत्रोऽयं सप्तत्यूर्ध्वशताक्षरः ॥१७५॥ भूताधिपतये स्वाहा पूजामन्त्रोऽयमीरितः । सिद्धमन्त्रोऽयमुदितो जपादेव प्रसिद्ध्यति ॥१७६॥ अयुतद्वितयात्पश्चाद्भूतादिग्रहणे क्षमः । माया स्फुरद्वयं भूयः प्रस्फुरद्वितयं पुनः ॥१७७॥ घातयद्वितयं वर्म फडन्तः समुदीरितः । एकपंचाशद्वर्णोऽयमघोरास्त्रं महामनुः ॥१७८॥ अघोरोऽस्य मुनिः प्रोक्तस्त्रिष्टुप्छंद उदाहृतम् । अघोररुद्रः संदिष्टो देवता मन्त्रनायकः ॥१७९॥ हृदयं पंचभिः प्रोक्तं शिरः षड्भिरुदाहृतम् । शिखा दशभिराख्याता नवभिः कवचं मतम् ॥१८०॥ वसुवर्णैः स्मृतं नेत्रं दशाणैरस्त्रमीरितम् । मूर्ध्नि नेत्रास्यकंठेषु हृन्नाभ्यामूरुषु क्रमात् ॥१८१॥ जानुजंघापदद्वंद्वे रुद्रभिन्नाक्षरैर्न्यसेत् । पञ्चषट्काष्टवेदांगद्विद्व्यब्धिरसलोचनैः ॥१८२॥ श्यामं त्रिनेत्रं सर्पाढ्यं रक्तवस्त्रांगरागकम् । नानाशस्त्रधरं ध्यायेदघोराख्यं सदाशिवम् ॥१८३॥ भूतवेतालकादीनां क्षमोऽयं निग्रहे मनुः । तारो वांतो धरासंस्थो वामनेत्रेंदुभूषितः ॥१८४॥ पाशी बकः कर्णनेत्रवर्मास्त्रांतः षडक्षरः । मनुः पाशुपतास्त्राख्यो ग्रहक्षुद्रनिवारणः ॥१८५॥ षड्भिर्वर्णैः षडंगानि हुंफडंतैः सजातिभिः । मध्याह्नाकप्रभं भीमं त्र्यक्षं पन्नगभूषणम् ॥१८६॥ नानाशस्त्रं चतुर्वक्त्रं स्मरेत्पशुपति हरम् । वर्णलक्षं जपेन्मन्त्रं जुहुयात्तद्दशांशतः ॥१८७॥ गव्येन सर्पिषा मन्त्रो संस्कृते हव्यवाहने । शैवे पीठे यजेदंगमातृलोकेशवरायुधैः ॥१८८॥ अनेन मन्त्रितं तोयं भूतग्रस्तमुखे क्षिपेत् । सद्यः स मुंचति ह्येतन्महामंत्रप्रभावतः ॥१८९॥ अनेन मन्वितान्बाणान्स्त्वित्सृजेद्युधि यो नरः । जयेत्क्षणेन निखिलाञ्छत्रून्पार्थ इवापरः ॥१९०॥ वर्णान्तिमो बिंदुयुतः क्षेत्रपालाय हृन्मनुः । ॥१९१॥
अधिक अक्षरों वाला मन्त्र बनता है । "भूताधिपतये स्वाहा" यह पूजा का मन्त्र कहा गया है। इसको सिद्धमन्त्र भी कहते हैं। जप से ही इसकी सिद्धि हो जाती है ॥१६४-१७६॥ "अयुत................... फट्" - यह अघोरास्त्र नामक महामन्त्र है। इसके ऋषि अघोर हैं, छंद त्रिवृत् है और मन्त्रनायक देवता अघोररुद्र हैं। इसके पाँच अक्षरों से हृदय, छह अक्षरों से शिर, दश से शिखा, नौ से कवच, आठ से नेत्र और दस से अस्त्र कहे गये हैं। मस्तक, नेत्र, मुख, कंठ, हृदय, नाभि, ऊरु, जानु, जंघा तथा पादद्वय में पाँच, छः, आठ, छः, दो, दो, चार, छः, एवम् दो में रुद्र (११) भिन्न अक्षरों से न्यास करना चाहिये । तत्पश्चात् श्यामवर्ण, त्रिनेत्र, सर्पभूषित, रक्तवस्त्र, अंगराग तथा अनेक शस्त्र धारण करने वाले अघोर नामक सदाशिव का ध्यान करे! यह मंत्र भूत बेताल आदि का निग्रह करने में समर्थ है। "तारः............" यह पाशुपत नामक षडक्षर मन्त्र क्षुद्र ग्रहों का निवारण करता है। 'हृ' 'फट्' आदि छह वर्गों से षडंगन्यास करना चाहिये ।१७७-१८५½॥ पश्चात् मध्याह्नकालीन सूर्य के समान प्रभाववाले, भयंकर रूपवाले, सर्पों के आभूषण वाले, तीन नेत्रवाले, विविध शस्त्रों के जानने वाले चार मुखवाले पशुपति महादेव का ध्यान कर छः लाख मंत्र को जपे और उसका दशांश गोघृत से सुसंस्कृत अग्नि में हवन करे। फिर शैव पीठ पर अंगावरण सहित मातृगण और आयुध सहित लोकपालों की अर्चना करे। इस मन्त्र से जल को अभिमन्त्रित करके भूत ग्रस्त व्यक्ति के मुख में डालने से भूत छोड़ देता है, ऐसा इस महामन्त्र का प्रभाव है। जो नर संग्राम में इस मन्त्र से बाणों को अभिमन्त्रित करके शत्रुओं पर छोड़ता है, वह क्षणभर में इस तरह विजय पा लेता है जैसे अर्जुन । वर्णों के अंतिम अक्षर बिंदु तथा प्रणव से युक्त अष्टाक्षर मंत्र क्षेत्रपाल का कहा गया है ॥१८६-१९१½॥ छह दीर्घ मात्राओं से शा०-१०८