सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 875, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 875

८५६ नारदीयपुराणम् नागभूषं जपवटीं शूलं ब्रह्मकपालकम् । खट्वांगं दधतं दोर्भित्रिनेत्रं चिंतयेद्धरम् ॥१५६॥ लक्षत्रयं जपेन्मंत्रं तद्दशांशं ससर्पिषा । हविषा जुहुयात्सम्यक्संस्कृते हव्यवाहने ॥१५७॥ शैवं पीठे यजेद्देवं नीलकंठं समाहितः । मृत्युंजयविधानेन विषद्वयविनाशनम् ॥१५८॥ अग्निः संवर्तकादित्यरानिलौ षष्टिर्बिंदुमान् । चिंतामणिरिति ख्यातं बीजं सर्वसमृद्धिदम् ॥१५९॥ कश्यपो मुनिश्र्ाख्यातश्छंदोऽनुष्टुबुदाहृतम् । अर्धनारीश्वरः प्रोक्तो देवता जगतां पतिः ॥१६०॥ रेफादिव्यंजनैः षड्भिः कुर्यादंगानि षट् क्रमात् । त्रिनेत्रं नीलमणिभं शूलपाशं कपालकम् ॥१६१॥ रक्तोत्पलं च हस्ताब्जैर्दधतं चारुभूषणम् । बालेंदुबद्धमुकुटमर्धनारीश्वरं स्मरेत् ॥१६२॥ एकलक्षं जपेन्मंत्रं त्रिंशतं मधुराप्लुतैः । तिलैहुनेद्यजेत्पीठे शैवेगावरणैः सह ॥१६३॥ वृषाद्यैर्मातृभिः पश्चाल्लोकपालैस्तदायुधैः । प्रासादाद्यं जपेन्मंत्रमयुतं रोगशांतये ॥१६४॥ स्वाहावृत्तमिदं बीजं विगलत्परमामृतम् । चंद्रबिम्बस्थितं मूर्ध्नि ध्यातं श्लेष्मगदापहम् ॥१६५॥ प्रतिलोमस्वराढ्या च बीजं वह्निगृहे स्थितम् । रेफादिव्यंजनोल्लासिषट्कोणाभिवृतं बहिः ॥१६६॥ भूतार्तस्य स्मृतं मूर्ध्नि भूतमाशु विनाशयेत् । पीडितांगे स्मृतं तत्तत्पीडां शमयति ध्रुवम् ॥१६७॥ प्रणवो हृदयं पश्चान् ड़ेन्तः पशुपतिः पुनः । तारो नमो भूतपदं ततोऽधिपतये ध्रुवम् ॥१६८॥ नमो रुद्राय युगलं खड्गरावण शब्दतः । विहरद्वितयं पश्चान्नरीनृत्ययुगं पृथक् ॥१६९॥ श्मशानभस्माचितांते शरण्याय ततः परम् । घंटाकपालमालाविधरायति पदं पुनः ॥१७०॥ व्याघ्रचर्मपदस्यांते परिधानाय तत्परम् । शशांककृतशब्दांते शेखराय ततः परम् ॥१७१॥ कृष्णसर्पपदात्पश्चाद्वेद्येत्युपवीतिने । बलयुग्मं चलायुग्ममनिर्वर्तकपालिने ॥१७२॥ हनुयुग्मं ततो भूतास्त्रासयद्वितयं पुनः । भूयो मंडलमध्ये स्यात्कटयुग्मं ततः परम् ॥१७३॥ रुद्रांकुशेन शमय प्रवेशययुगं ततः । आवेशययुगं पश्चाच्चंडासिपदमीरयेत् ॥१७४॥

सुसंस्कृत अग्नि में हवन करे । सावधान होकर शैव पीठ पर नीलकंठ देव की अर्चना करे । दोनों प्रकार के विष नष्ट करने वाले शंकर की मृत्युंजय मंत्र से पूजा करनी चाहिये ॥१५०-१५८॥ "अग्निः · · · · · ·चिंतामणिः" --यह बीज मन्त्र है । इसके मुनि कश्यप हैं । छंद अनुष्टुप् है और देवता अर्धनारीश्वर जगत्पति शंकर हैं । रेफ आदि छह व्यंजनों से क्रमशः षडंगन्यास करके तीन नेत्र वाले, नीलमणि के समान आभावाले, करकमलों में त्रिशूल, पाश, कपाल तथा रक्तकमल धारण करने वाले, सुन्दर आभूषण पहननेवाले, बालचंद्र से संबद्ध मुकुटवाले अर्धनारीश्वर शंकर का ध्यान करे । पश्चात् एक लाख मन्त्र जप और तीन सौ बार मधुरयुक्त तिलों से हवन करे ॥१५९-१६३॥ फिर शैव पीठ पर अंगावरणों के साथ शंकर का पूजन कर मातृगण, आयुध सहित लोकपाल तथा नंदी आदि देवों की अर्चना करे । इस मंत्र के दश हजार जप करने से रोगशान्ति होती है । यह बीज मन्त्र स्वाहा से आवृत है, परम अमृत रूप है । मस्तक पर इसका ऐसा ध्यान करे कि यह चंद्रबिंब में अवस्थित है । इस तरह करने से कफरोग का नाश होता है । प्रति लोमस्वरसंपन्न बीज मंत्र वह्निगृह में संस्थित होता है । उसके छह कोण रेफ आदि व्यंजनों से सुशोभित हैं । जो भूतपीड़ा से दुःखी हो, उसके शिर को इस मंत्र से अभिमन्त्रित कर देने पर भूत शीघ्र नष्ट हो जाता है । अंगों में चाहे किसी प्रकार की पीड़ा हो, इसके जप से तुरन्त शान्त हो जाती है । "प्रणवः · · · · · ·" यहाँ से लेकर "अग्निसुन्दरी · · · · · ·" पर्यन्त पदों को जोड़ने से सौ से